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LithiumDeal – चिली के साथ समझौता भारत की संसाधन सुरक्षा मजबूत करेगा

LithiumDeal – वैश्विक व्यापार की चर्चाओं में अक्सर भारत के बड़े समझौते अमेरिका, ब्रिटेन या यूरोपीय संघ के साथ जुड़ते दिखाई देते हैं, लेकिन इन सुर्खियों से दूर नई दिल्ली एक ऐसा आर्थिक और रणनीतिक दांव चल रही है, जिसकी अहमियत आने वाले दशकों में कहीं ज्यादा महसूस होगी। दक्षिण अमेरिका के प्रमुख खनिज-समृद्ध देश चिली के साथ मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में बढ़ते कदम केवल कारोबार का विस्तार नहीं, बल्कि भारत की औद्योगिक और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दूरगामी पहल माने जा रहे हैं।

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समझौते की असल अहमियत क्या है

यह पहल पारंपरिक व्यापार सौदे से अलग इसलिए है क्योंकि इसका केंद्र बाजार नहीं, बल्कि भविष्य के संसाधन हैं। इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए जिन खनिजों की जरूरत पड़ती है, उनमें लिथियम, तांबा और कोबाल्ट बेहद महत्वपूर्ण हैं। चिली के पास इन खनिजों के विशाल भंडार हैं और वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में प्रमुख खिलाड़ी है। भारत यदि अपनी विनिर्माण क्षमता को बढ़ाना चाहता है, तो उसे इन संसाधनों तक भरोसेमंद पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। इसी नजरिए से यह समझौता भारत को केवल कारोबारी साझेदार नहीं, बल्कि एक रणनीतिक साझेदार भी बनाता है।

बातचीत की मौजूदा स्थिति

दोनों देशों के बीच बातचीत उन्नत चरण में बताई जा रही है। वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, जल्द ही इसे अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है। हालांकि भारत और चिली के बीच 2006 से ही एक तरजीही व्यापार समझौता मौजूद है, लेकिन अब जिस व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते पर चर्चा हो रही है, उसका दायरा कहीं बड़ा है। इसमें वस्तुओं के व्यापार के साथ-साथ डिजिटल सेवाएं, निवेश और खनिज क्षेत्र में सहयोग को भी शामिल किया जा रहा है।

भारतीय कंपनियों की सक्रियता

सरकारी स्तर पर बातचीत के साथ-साथ भारतीय कंपनियां भी चिली में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की कोल इंडिया ने लिथियम और तांबे के खनन परियोजनाओं के लिए वहां एक पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी बनाने की मंजूरी दी है। वहीं अदाणी समूह ने चिली की सरकारी खनन कंपनी कोडेल्को के साथ तांबे से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर सहयोग समझौता किया है। इन कदमों से साफ है कि भारत इस साझेदारी को दीर्घकालिक नजरिए से देख रहा है।

व्यापार संतुलन और भारत की जरूरतें

वित्त वर्ष 2024-25 में चिली से भारत का आयात 72 प्रतिशत बढ़कर 2.60 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि भारत का निर्यात घटकर 1.15 अरब डॉलर रह गया। यह अंतर दर्शाता है कि भारतीय उद्योगों को चिली के कच्चे माल पर बढ़ती निर्भरता है। मुक्त व्यापार समझौते के बाद भारत न केवल जरूरी खनिजों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित कर सकेगा, बल्कि अपनी मूल्यवर्धित वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात बढ़ाकर व्यापार संतुलन भी सुधार सकता है।

रणनीतिक बढ़त क्यों जरूरी है

आज की वैश्विक राजनीति में आपूर्ति श्रृंखलाएं महज आर्थिक साधन नहीं रहीं, बल्कि रणनीतिक हथियार बन चुकी हैं। ऐसे में भारत के लिए संसाधनों के मामले में आत्मनिर्भरता और विविधता बेहद जरूरी है। चिली के साथ यह समझौता भारत को एक सुरक्षित और भरोसेमंद खनिज आपूर्ति मार्ग देगा, जिससे वह किसी एक देश पर निर्भरता कम कर सकेगा।

मेक इन इंडिया और हरित ऊर्जा का आधार

यह साझेदारी भारत की ‘मेक इन इंडिया’ और हरित ऊर्जा परिवर्तन की योजनाओं के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी, सोलर पैनल और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए जिन कच्चे माल की जरूरत पड़ती है, उनकी उपलब्धता सुनिश्चित होने से घरेलू विनिर्माण को बड़ा बढ़ावा मिलेगा।

भविष्य की तस्वीर

भले ही यह समझौता बड़े राजनीतिक विमर्श का हिस्सा न बना हो, लेकिन इसकी रणनीतिक और आर्थिक अहमियत दूरगामी है। यदि इसे सही तरीके से लागू किया गया, तो भारत संसाधन आयातक देश से उन्नत विनिर्माण शक्ति बनने की दिशा में एक मजबूत कदम बढ़ा सकता है।

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