Black fungus:चेरनोबिल की दीवारों पर उग रहा काला कवक जो विकिरण को खाकर जिंदा रहता है
Black fungus: यूक्रेन के चेरनोबिल परमाणु संयंत्र में 1986 की भयावह दुर्घटना को लगभग चार दशक बीत चुके हैं। जहाँ इंसान आज भी उस क्षेत्र में कदम रखने से डरता है, वहीं प्रकृति ने वहाँ एक अनोखा जीवन चक्र शुरू कर दिया है। वैज्ञानिकों को परित्यक्त रिएक्टर की अंदरूनी दीवारों पर एक गहरे काले रंग का कवक मिला है जो न सिर्फ़ घातक विकिरण में जीवित रहता है, बल्कि उसे अपना भोजन बनाकर तेज़ी से बढ़ता भी है। इस कवक का नाम है क्लैडोस्पोरियम स्फेरोस्पर्मम। यह खोज दुनिया भर के वैज्ञानिकों को हैरान कर रही है क्योंकि यह जीव विकिरण को ऊर्जा में बदलने की अद्भुत क्षमता रखता है।

विकिरण को भोजन बनाने वाला अनोखा जीव
सामान्य पौधे सूरज की रोशनी से प्रकाश संश्लेषण करके अपना भोजन बनाते हैं, ठीक वैसे ही यह काला कवक गामा किरणों का इस्तेमाल करके रासायनिक ऊर्जा पैदा करता है। शोधकर्ताओं ने इसे रेडियोसिंथेसिस नाम दिया है। चेरनोबिल के अत्यधिक रेडियोधर्मी क्षेत्र में किए गए परीक्षणों में पाया गया कि जहाँ दूसरे जीव मिनटों में नष्ट हो जाते हैं, वहीं यह कवक विकिरण की मात्रा जितनी ज़्यादा होती है, उतनी ही तेज़ी से बढ़ता है। कुछ प्रजातियाँ तो सामान्य स्थिति की तुलना में 20 गुना से भी ज़्यादा तेज़ी से फैलती दिखीं।
मेलेनिन की वजह से मिली यह खास ताकत
इस कवक की सबसे बड़ी खूबी उसमें मौजूद मेलेनिन नाम का रंगद्रव्य है। यही मेलेनिन हमारी त्वचा में भी होता है जो सूरज की पराबैंगनी किरणों से बचाता है। चेरनोबिल के इस कवक में मेलेनिन की मात्रा सामान्य कवकों से कई गुना ज़्यादा है। जब गामा किरणें इस मेलेनिन से टकराती हैं तो उसके इलेक्ट्रॉन उत्तेजित हो जाते हैं और एक तरह की रासायनिक ऊर्जा पैदा करते हैं जिसे कवक अपनी वृद्धि और डीएनए की मरम्मत के लिए इस्तेमाल कर लेता है। यही वजह है कि यह कवक रेडियोधर्मी कणों को फंसाकर उन्हें निष्क्रिय भी कर देता है।
अंतरिक्ष मिशनों के लिए नई उम्मीद
नासा और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियाँ इस कवक को भविष्य के चंद्रमा और मंगल मिशनों के लिए बहुत उपयोगी मान रही हैं। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर किए गए प्रयोगों में यह कवक अंतरिक्ष की कठोर विकिरण में भी न सिर्फ़ जीवित रहा बल्कि तेज़ी से फैला और अपने आसपास की सतहों को विकिरण से बचाने में कामयाब रहा। वैज्ञानिक अब इससे फंगल ईंटें बनाने की तकनीक विकसित कर रहे हैं। ये ईंटें हल्की होंगी, खुद को रिपेयर कर सकेंगी और चंद्रमा की सतह पर मौजूद सामग्री से ही बनाई जा सकेंगी। सबसे बड़ी बात यह कि ये भारी सीसे की ढालों से कई गुना बेहतर विकिरण सुरक्षा देंगी।
पृथ्वी पर भी होगा बड़ा फायदा
चेरनोबिल ही नहीं, फुकुशिमा जैसे अन्य रेडियोधर्मी अपशिष्ट स्थलों की सफाई में भी इस कवक का इस्तेमाल होने की संभावना है। यह कवक रेडियोधर्मी तत्वों को अवशोषित करके उन्हें निष्क्रिय कर सकता है। इससे दशकों से बंद पड़े परमाणु अपशिष्ट क्षेत्रों को धीरे-धीरे सुरक्षित बनाया जा सकता है। कुछ वैज्ञानिक तो यहाँ तक मानते हैं कि लंबे समय तक यह कवक उन क्षेत्रों को फिर से रहने लायक बना सकता है।
1986 की वह भयावह रात फिर याद आती है
26 अप्रैल 1986 की रात चेरनोबिल परमाणु संयंत्र के रिएक्टर नंबर 4 में परीक्षण के दौरान भयानक विस्फोट हुआ था। इससे इतनी बड़ी मात्रा में रेडियोधर्मी पदार्थ वातावरण में फैला कि यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी परमाणु दुर्घटना बन गई। प्रिपियात शहर को पूरी तरह खाली कराना पड़ा। आज भी 2600 वर्ग किलोमीटर का चेरनोबिल अपवर्जन क्षेत्र आम लोगों के लिए प्रतिबंधित है। लेकिन इसी प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रकृति ने यह दिखा दिया है कि जीवन सबसे कठिन परिस्थितियों में भी अपना रास्ता ढूंढ लेता है।
आज जब हम चेरनोबिल को सिर्फ़ एक दुर्घटना के रूप में याद करते हैं, वहीं वहाँ उग रहा यह साधारण सा दिखने वाला काला कवक हमें बता रहा है कि प्रकृति की ताकत और उसकी अनुकूलन क्षमता हमारी कल्पना से कहीं ज़्यादा है। शायद आने वाले दिनों में यही कवक इंसान को चाँद-मंगल तक सुरक्षित पहुँचाने और पृथ्वी के ज़ख्मों को भरने में सबसे बड़ा साथी बने।



