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Laapataa Ladies – छोटे बजट की फिल्मों ने भारतीय सिनेमा को दी नई दिशा

Laapataa Ladies – भारतीय फिल्म और राजनीति की दुनिया में समान सक्रियता रखने वाले अभिनेता रवि किशन इन दिनों अपनी आगामी फिल्म ‘भाभीजी घर पर हैं! फन ऑन द रन’ को लेकर चर्चा में हैं। हालिया बातचीत में उन्होंने सिर्फ अपनी फिल्म नहीं, बल्कि पूरे भारतीय सिनेमा के बदलते स्वरूप पर विस्तार से बात की। उनके अनुसार, हाल के वर्षों में जिस तरह की कहानियाँ सामने आ रही हैं, वे इस धारणा को मजबूत कर रही हैं कि फिल्म का प्रभाव उसके बजट से नहीं, बल्कि उसकी संवेदना और कथ्य से तय होता है। उन्होंने विशेष रूप से किरण राव निर्देशित फिल्म ‘लापता लेडीज’ का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसी फिल्मों ने वैश्विक मंच पर भारतीय सिनेमा के लिए नई उम्मीदें पैदा की हैं। यह फिल्म भारत की आधिकारिक ऑस्कर एंट्री भी रही, जिसने छोटे बजट की फिल्मों की क्षमता पर गंभीर बहस छेड़ दी।

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छोटे और बड़े सिनेमा की नई बहस

रवि किशन ने उद्योग के भीतर चल रही बजट बनाम कंटेंट की बहस पर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि यदि उनकी फिल्म तय तारीख तक दर्शकों की पकड़ बना लेती है, तो यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि लगभग पाँच करोड़ रुपये में बनी ‘लापता लेडीज’ का ऑस्कर तक पहुँचना इस बात का प्रमाण है कि सीमित संसाधनों में भी प्रभावशाली सिनेमा बनाया जा सकता है। उनके अनुसार, जहाँ एक ओर ‘धुरंधर’ और ‘बॉर्डर 2’ जैसी भव्य बजट वाली फिल्में बन रही हैं, वहीं दूसरी ओर छोटी, सरल और जमीनी कहानियों वाली फिल्में भी दर्शकों का दिल जीत रही हैं। यह संतुलन फिल्म उद्योग को अधिक समावेशी और रचनात्मक बनाता है, जिससे हर तरह के फिल्मकारों को अपनी जगह मिलती है।

इतिहास से जुड़ी समानताएँ

रवि किशन ने भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम दौर को याद करते हुए कहा कि विविधता हमेशा से इस उद्योग की पहचान रही है। उन्होंने बासु चटर्जी और ऋषिकेश मुखर्जी जैसे निर्देशकों का जिक्र किया, जिनकी संवेदनशील और आम जीवन से जुड़ी कहानियाँ, यश चोपड़ा, राज खोसला और मनमोहन देसाई जैसे दिग्गजों की भव्य फिल्मों के साथ समानांतर रूप से चलती थीं। उस दौर में बड़े प्रोडक्शन हाउस की चमक-दमक वाली फिल्में भी सफल होती थीं और अमोल पालेकर जैसे कलाकारों की सादगी भरी कहानियाँ भी दर्शकों को प्रभावित करती थीं। उनके मुताबिक, आज का दौर फिर उसी संतुलन की ओर लौट रहा है, जहाँ अलग-अलग तरह की फिल्मों के लिए जगह है।

किरण राव की फिल्म क्यों खास रही

‘लापता लेडीज’ अपने सीमित बजट के बावजूद चर्चा का विषय बनी, क्योंकि इसकी कहानी ग्रामीण भारत की वास्तविकता को बेहद मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है। स्पर्श श्रीवास्तव, नितांशी गोयल, प्रतिभा रांटा और छाया कदम जैसे कलाकारों ने अपने सहज अभिनय से फिल्म को जीवंत बनाया। रवि किशन ने इसमें सब-इंस्पेक्टर श्याम मनोहर की भूमिका निभाई, जो कानून के कठोर चेहरे के बजाय सहानुभूति और समझदारी का पक्ष दिखाता है। उनका किरदार दर्शाता है कि व्यवस्था के भीतर भी मानवीय संवेदना बनी रह सकती है। फिल्म ने यह साबित किया कि मजबूत कहानी और ईमानदार प्रस्तुति बड़े पैमाने की फिल्मों को भी पीछे छोड़ सकती है।

उद्योग के लिए संकेत

रवि किशन का मानना है कि इस तरह की फिल्मों की सफलता भारतीय फिल्म उद्योग के लिए सकारात्मक संकेत है। इससे नए और स्वतंत्र फिल्मकारों को हौसला मिलता है कि वे बिना भारी निवेश के भी अपनी बात दर्शकों तक पहुँचा सकते हैं। साथ ही, यह दर्शकों की बदलती पसंद को भी दर्शाता है, जो अब केवल ग्लैमर और एक्शन नहीं, बल्कि सार्थक कहानियाँ देखना चाहते हैं। उनके अनुसार, यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो भारतीय सिनेमा आने वाले वर्षों में और अधिक विविध, संतुलित और वैश्विक स्तर पर सम्मानित होगा।

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