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Odisha Heart Touching Story: ओडिशा के इस बुजुर्ग ने पत्नी के लिए रिक्शा को बनाया एम्बुलेंस, पेश की प्यार की मिसाल…

Odisha Heart Touching Story: सच्चा प्यार केवल किताबों और फिल्मों में नहीं होता, बल्कि असल जिंदगी में भी कई बार ऐसी कहानियां सामने आती हैं जो दिल को झकझोर देती हैं। ओडिशा के संबलपुर जिले के रहने वाले 70 वर्षीय बुजुर्ग बाबू लोहार ने अपनी पत्नी के प्रति जो समर्पण दिखाया है, उसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। जब जेब में एक भी पैसा न हो और हमसफर की जान खतरे में हो, तो इंसान का हौसला ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन जाता है। बाबू लोहार ने अपनी बीमार पत्नी को अस्पताल पहुंचाने के लिए (Human Compassion and Resilience) का ऐसा उदाहरण पेश किया, जिसे सुनकर किसी की भी आंखें भर आएं। उन्होंने कड़ाके की ठंड में हार नहीं मानी और अपनी पत्नी को बचाने के लिए एक असंभव से लगने वाले सफर पर निकल पड़े।

Odisha Heart Touching Story
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एम्बुलेंस के पैसे नहीं थे तो रिक्शा को ही बनाया सहारा

बाबू लोहार की पत्नी ज्योति को बीते नवंबर महीने में अचानक स्ट्रोक आया था, जिसके बाद उनकी हालत काफी नाजुक हो गई थी। संबलपुर के स्थानीय डॉक्टरों ने उन्हें बेहतर इलाज के लिए कटक के सरकारी एससीबी मेडिकल कॉलेज जाने की सलाह दी। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि उनके पास एम्बुलेंस किराए पर लेने तक के पैसे नहीं थे। मजबूरी में बाबू लोहार ने अपने पुराने (Traditional Rickshaw Transformation) के जरिए एक जुगाड़ू एम्बुलेंस तैयार की। उन्होंने रिक्शा वैन के ऊपर पुरानी गद्दियां बिछाईं और अपनी पत्नी को उस पर लेटाकर कटक की ओर प्रस्थान किया।

300 किलोमीटर का सफर और 9 दिनों का कठिन संघर्ष

संबलपुर से कटक की दूरी लगभग 300 किलोमीटर है, जिसे तय करना एक 70 साल के बुजुर्ग के लिए शारीरिक रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण था। बाबू लोहार ने इस दूरी को 9 दिनों में पूरा किया, जिसमें वह प्रतिदिन करीब 30 किलोमीटर रिक्शा खींचते थे। रास्ते में आने वाली बाधाओं और कंपकपाती ठंड के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। रात के समय किसी दुकान के बाहर या सड़क किनारे (Wayside Shelter Resting) करना उनकी दिनचर्या बन गया था। वह अपनी पत्नी की सेवा भी करते और साथ ही रिक्शा चलाकर उन्हें गंतव्य तक पहुंचाने की कोशिश में जुटे रहते।

इलाज के बाद वापसी और रास्ते में हुआ हादसा

कटक के अस्पताल में करीब दो महीने तक चले लंबे इलाज के बाद 19 जनवरी को जब ज्योति की हालत में सुधार हुआ, तो बाबू लोहार ने वापस संबलपुर जाने का फैसला किया। वापसी के सफर के दौरान टांगी थाना क्षेत्र के पास एक छोटी दुर्घटना हो गई, जहां एक वाहन की टक्कर से ज्योति रिक्शा से नीचे गिर गईं। इस घटना के बाद स्थानीय पुलिस उनकी मदद के लिए आगे आई। पुलिस अधिकारियों ने उन्हें (Emergency Roadside Assistance) प्रदान करते हुए सरकारी गाड़ी से घर पहुंचाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन बाबू लोहार ने अपनी खुद्दारी और स्वाभिमान के कारण इसे स्वीकार करने से मना कर दिया।

पत्नी और रिक्शा के प्रति अटूट प्रेम और स्वाभिमान

जब टांगी थाना प्रभारी विकास सेठी ने उन्हें गाड़ी से घर छोड़ने की बात कही, तो बाबू लोहार का जवाब सुनकर हर कोई दंग रह गया। उन्होंने विनम्रता से कहा कि उनके जीवन में दो ही सबसे बड़े प्यार हैं—एक उनकी पत्नी और दूसरा उनका रिक्शा। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह इन दोनों में से किसी को भी बीच रास्ते में नहीं छोड़ सकते। उनकी (Unwavering Marital Devotion) देखकर पुलिसकर्मी भी भावुक हो गए। बाबू लोहार का मानना था कि जिस रिक्शे ने उनकी पत्नी की जान बचाने में मदद की, उसे लावारिस छोड़ देना गलत होगा।

पुलिस की मदद लेने से इंकार और सोशल मीडिया पर सराहना

थाना प्रभारी के बार-बार अनुरोध करने पर बाबू लोहार केवल रास्ते में खाने-पीने के लिए कुछ नकद राशि लेने को तैयार हुए। वह अपनी मेहनत और अपनी ‘वैन’ के भरोसे ही वापस संबलपुर पहुंचना चाहते थे। 70 साल की उम्र में 600 किलोमीटर (आने और जाने का सफर मिलाकर) का यह संघर्ष आज दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया है। सोशल मीडिया पर लोग उनकी इस बहादुरी और (Self Reliant Spirit) की जमकर तारीफ कर रहे हैं। बाबू लोहार की यह कहानी साबित करती है कि संसाधनों की कमी हो सकती है, लेकिन अगर संकल्प मजबूत हो तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती

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