Sleep Deprivation Effects: 50 साल से नहीं सोया यह बुजुर्ग, क्या यह कुदरत का करिश्मा है या कोई दिमागी खेल…
Sleep Deprivation Effects: अच्छी सेहत के लिए जितना जरूरी संतुलित आहार है, उतनी ही जरूरी सुकून की नींद भी है। लेकिन मध्य प्रदेश के रीवा जिले से आई एक खबर ने चिकित्सा विज्ञान के तमाम दावों को चुनौती दे दी है। यहां रहने वाले 75 वर्षीय मोहनलाल द्विवेदी का दावा है कि उन्होंने (healthy sleep cycle) के बिना पिछले 50 साल गुजार दिए हैं। उनका कहना है कि साल 1973 के बाद से उनकी आंखों में कभी नींद नहीं उतरी, जो सुनने में किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता है।

मोहनलाल की अनोखी दास्तां और डॉक्टरों की हैरानी
मोहनलाल बताते हैं कि शुरुआत में जब उन्हें नींद नहीं आई, तो उन्हें लगा कि यह कुछ दिनों की समस्या है। उन्होंने इसके लिए दिल्ली और मुंबई के बड़े डॉक्टरों से संपर्क किया, लेकिन जांच में सब कुछ सामान्य निकला। डॉक्टरों का कहना था कि जब कोई (medical sleep disorder) शरीर में है ही नहीं, तो इलाज किस चीज का किया जाए। हैरानी की बात यह है कि बिना सोए भी उन्हें कभी थकान, सिरदर्द या आंखों में भारीपन महसूस नहीं हुआ।
रात भर बिस्तर पर लेटे रहने के बाद भी दिमाग रहता है चौकन्ना
अक्सर लोग थककर बिस्तर पर गिरते ही सो जाते हैं, लेकिन मोहनलाल की कहानी अलग है। वे बताते हैं कि वे रात भर बिस्तर पर लेटते हैं, आंखें भी बंद करते हैं, लेकिन उनका (active brain state) पूरी रात बना रहता है। उन्होंने अपनी इस स्थिति को सुधारने के लिए झाड़-फूंक का सहारा भी लिया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। अब उन्हें इस स्थिति की आदत हो गई है और वे इसे अपने जीवन का एक सामान्य हिस्सा मान चुके हैं।
विज्ञान की नजर में नींद की अहमियत और शरीर पर इसके प्रभाव
मेडिकल साइंस के अनुसार, नींद इंसान की एक मौलिक जरूरत है जिसे टाला नहीं जा सकता। यदि कोई व्यक्ति एक रात भी ठीक से नहीं सोता, तो अगले दिन उसकी (daily productivity) बुरी तरह प्रभावित होती है। लंबे समय तक नींद की कमी से हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और गंभीर मानसिक बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में 50 साल तक बिना सोए रहने का दावा जैविक रूप से नामुमकिन नजर आता है।
क्या कहते हैं वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी?
इस रहस्यमयी मामले पर वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी का कहना है कि यह खबर जितनी दिलचस्प है, उतनी ही चिंताजनक भी। उनका तर्क है कि कोई भी मनुष्य (biological necessity) के रूप में नींद को दशकों तक नजरअंदाज नहीं कर सकता। हमारा मस्तिष्क एक समय के बाद खुद को ‘शटडाउन’ मोड में ले जाता है ताकि शरीर को जरूरी आराम मिल सके। विज्ञान के अनुसार, नींद न मिलने पर व्यक्ति भ्रम का शिकार हो सकता है।
नींद का न होना या नींद को महसूस न कर पाना?
डॉक्टरों का मानना है कि ऐसे मामलों में अक्सर मरीज ‘पैराडॉक्सिकल इंसोमनिया’ का शिकार होते हैं। इसमें व्यक्ति सोता तो है, लेकिन उसकी (deep sleep quality) इतनी कम होती है कि उसे लगता है वह पूरी रात जाग रहा था। हल्की नींद और बार-बार टूटने वाली तंद्रा के कारण दिमाग को यह महसूस ही नहीं होता कि शरीर सो चुका है। चिंता, तनाव या किसी पुरानी मानसिक स्थिति के कारण अक्सर लोग ऐसा महसूस करने लगते हैं कि वे सोए नहीं हैं।
दावों की हकीकत और डॉक्टरी जांच का सही तरीका
चिकित्सकीय दृष्टि से मोहनलाल के दावों को न तो पूरी तरह नकारा जा सकता है और न ही बिना जांच के स्वीकार किया जा सकता है। ऐसे मामलों में (clinical sleep study) और मानसिक स्थिति का मूल्यांकन बेहद जरूरी होता है। अक्सर स्लीप लैब में भर्ती करने के बाद पता चलता है कि मरीज असल में सो रहा है, लेकिन उसका सचेत मन उसे स्वीकार नहीं कर पा रहा। यह मामला विज्ञान और विश्वास के बीच की एक धुंधली लकीर जैसा है।



