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Madras High Court Ruling on Religious Events: धार्मिक आस्था और कानून के बीच उलझी थिरुपरनकुंद्रम की पहाड़ी, मद्रास हाईकोर्ट का वो फैसला जिसने थमा दी मदुरै की सांसें…

Madras High Court Ruling on Religious Events: मदुरै की प्रसिद्ध थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार वजह धार्मिक उल्लास नहीं बल्कि न्यायपालिका का एक कड़ा निर्देश है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने हजरत सुल्तान सिकंदर बदुशा दरगाह में होने वाले कार्यक्रमों को लेकर स्पष्ट सीमाएं तय कर दी हैं। अदालत ने (legal guidelines) का हवाला देते हुए साफ कर दिया है कि यहाँ केवल संथानकूडू उर्स पर्व का आयोजन ही संभव होगा। यह फैसला उस समय आया है जब क्षेत्र में धार्मिक भावनाओं का ज्वार उफान पर है और प्रशासन शांति बनाए रखने की हरसंभव कोशिश कर रहा है।

Madras High Court Ruling on Religious Events
Madras High Court Ruling on Religious Events

सीमित संख्या और उर्स की अनुमति का गणित

सुनवाई के दौरान अदालत ने न केवल कार्यक्रम के प्रकार बल्कि उसमें शामिल होने वाले लोगों की संख्या पर भी अंकुश लगा दिया है। सरकारी दलीलों को सुनने के बाद यह तय किया गया कि आगामी (santhanakoodu urs festival) में अधिकतम 50 लोग ही हिस्सा ले पाएंगे। तमिलनाडु सरकार ने अदालत को भरोसा दिलाया है कि 6 जनवरी को होने वाले इस आयोजन के लिए वैसी ही व्यवस्थाएं की जाएंगी जैसी वर्ष 2023 में की गई थीं। साथ ही, सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इस दौरान कंधूरी महोत्सव के आयोजन की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी जाएगी।

पवित्रता बनाए रखने के लिए पशु बलि पर पूर्ण प्रतिबंध

थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत ने आयोजन के स्वरूप पर भी कुछ कड़े नियम थोप दिए हैं। कोर्ट ने आदेश दिया है कि दरगाह परिसर या पहाड़ी क्षेत्र में किसी भी प्रकार की (animal sacrifice) की अनुमति नहीं होगी। इसके साथ ही वहां मांस ले जाने, मांसाहारी भोजन पकाने या उसके वितरण पर भी पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। अदालत का यह रुख स्पष्ट करता है कि वह किसी भी कीमत पर क्षेत्र की शांति और स्वच्छता से समझौता नहीं करना चाहती, और इस मामले की अगली गंभीरता 20 जनवरी की सुनवाई में तय होगी।

कार्तिगई दीपम को लेकर भड़की विरोध की चिंगारी

इस पूरे विवाद की जड़ें पिछले महीने हुए उन विरोध प्रदर्शनों में छिपी हैं जिन्होंने मदुरै की शांति को हिलाकर रख दिया था। स्थानीय लोग मांग कर रहे थे कि तमिल माह कार्तिगई के दौरान पहाड़ी पर (karthigai deepam ritual) संपन्न किया जाए, जैसा कि परंपराओं में वर्णित है। हालांकि, हाईकोर्ट द्वारा दीप स्तंभ पर प्रज्ज्वलन के पिछले आदेश के बाद दो समुदायों के बीच स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी। हालात इस कदर बिगड़े कि झड़पें शुरू हो गई और राज्य सरकार को कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए अदालती आदेश को चुनौती देनी पड़ी।

एक आत्मदाह जिसने हिला दिया पूरे तमिलनाडु का दिल

विवाद ने उस समय एक बेहद दर्दनाक और भयावह रूप ले लिया जब एक 40 वर्षीय व्यक्ति ने खुद को आग के हवाले कर दिया। कार्तिगई दीपम न जलाए जाने के फैसले से आहत होकर किए गए इस (self immolation act) ने पूरे राज्य को स्तब्ध कर दिया। इस घटना के बाद मामला केवल धार्मिक नहीं रहा, बल्कि एक अत्यंत संवेदनशील मानवीय मुद्दा बन गया। इस आत्मघाती कदम ने प्रशासन की नींद उड़ा दी और थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी के आसपास सुरक्षा का घेरा कई गुना सख्त करना पड़ा ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके।

भाजपा का कड़ा रुख और डीएमके सरकार पर प्रहार

इस धार्मिक विवाद ने बहुत जल्द ही एक बड़े राजनीतिक संग्राम का रूप ले लिया है, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने इस पूरे घटनाक्रम की तीव्र निंदा की है और सत्तारूढ़ (political ideology) पर हिंदू विरोधी होने का गंभीर आरोप लगाया है। अन्नामलाई का तर्क है कि सरकार बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को कुचलने का काम कर रही है। इन आरोपों ने राज्य की राजनीति में एक नया उबाल ला दिया है, जिससे आगामी चुनावों के समीकरण भी प्रभावित होने की संभावना नजर आ रही है।

न्यायपालिका और विधायिका के बीच बढ़ता टकराव

यह विवाद केवल सड़क और दरगाह तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब यह देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद तक पहुंच चुका है। डीएमके और इंडिया गठबंधन के अन्य दलों ने हाईकोर्ट के माननीय न्यायाधीश के खिलाफ (impeachment motion) पेश कर हलचल मचा दी है। यह कदम न्यायपालिका के एक विशेष आदेश के विरोध में उठाया गया है, जो यह दर्शाता है कि थिरुपरनकुंद्रम का मुद्दा अब संवैधानिक और कानूनी मर्यादाओं की एक नई बहस को जन्म दे चुका है।

भविष्य की राह और सामाजिक सद्भाव की चुनौती

फिलहाल थिरुपरनकुंद्रम की पहाड़ियों पर एक खामोश तनाव पसरा हुआ है, जहाँ पुलिस के बूटों की आवाज आस्था की गूंज पर भारी पड़ रही है। समाज के प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि (communal harmony) को बनाए रखने के लिए दोनों पक्षों को लचीला रुख अपनाना होगा। 20 जनवरी की तारीख अब मील का पत्थर साबित होगी, क्योंकि उसी दिन यह तय होगा कि कानून की चौखट पर आस्था को कितनी जगह मिलती है और क्या मदुरै के लोग फिर से भाईचारे के साथ अपने त्यौहार मना पाएंगे।

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