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Sriram Raghavan Ikkis Movie Casting: अधूरी रह गई वरुण धवन की जिद, आखिर क्यों 21 साल के ‘शहीद’ को मिल गया मौका…

Sriram Raghavan Ikkis Movie Casting: बॉलीवुड के धुरंधर निर्देशक श्रीराम राघवन की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘इक्कीस’ इन दिनों चर्चा के केंद्र में है। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान निर्देशक ने खुलासा किया कि सुपरस्टार वरुण धवन इस प्रोजेक्ट को लेकर बेहद उत्साहित थे और फिल्म में मुख्य भूमिका निभाना चाहते थे। वरुण और श्रीराम ने इस पर काम भी शुरू कर दिया था, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। (Scripting Journey) के दौरान जैसे ही शुरुआती ड्राफ्ट तैयार हुआ, देश में कोविड-19 की लहर आ गई, जिसने फिल्म के पूरे प्रोडक्शन शेड्यूल और कास्टिंग की योजना को पूरी तरह से बदलकर रख दिया।

Sriram Raghavan Ikkis Movie Casting
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उम्र का वह कांटा जिसने बदल दी पूरी कहानी

श्रीराम राघवन ने बताया कि जैसे-जैसे कहानी कागजों पर आकार लेने लगी, उन्हें एहसास हुआ कि यह किरदार वरुण धवन के कद और वर्तमान उम्र से मेल नहीं खा रहा है। फिल्म की पटकथा की मांग थी कि नायक (Character Age Factor) के रूप में बेहद कम उम्र का दिखाई दे। कहानी के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों में नायक अरुण खेत्रपाल की उम्र मात्र 19 साल है। निर्देशक का मानना था कि पर्दे पर वरुण धवन की परिपक्वता उस 19-21 साल की मासूमियत को पूरी तरह से न्याय नहीं दे पाती, जो एक वीर सैनिक की इस बायोपिक के लिए अनिवार्य थी।

नए चेहरे की तलाश और अगस्त्य नंदा की एंट्री

जब वरुण धवन के साथ बात नहीं बनी, तो निर्देशक ने एक ऐसे नए चेहरे की तलाश शुरू की जो एक सैनिक के जज्बे के साथ-साथ एक किशोर की कोमलता को भी समेटे हुए हो। इसी दौरान अगस्त्य नंदा का नाम सामने आया। श्रीराम राघवन बताते हैं कि जब अगस्त्य को इस (Casting Process) के जरिए चुना गया, तब वह ठीक 21 साल के थे। उनकी उम्र और व्यक्तित्व फिल्म के शीर्षक और नायक अरुण खेत्रपाल की वास्तविक आयु के साथ बिल्कुल सटीक बैठ रहे थे, जिससे निर्देशक का काम काफी आसान हो गया।

वह खास बात जिसने अगस्त्य को बनाया श्रीराम की पसंद

किसी भी एक्टर को चुनने के पीछे निर्देशक की अपनी एक दृष्टि होती है। श्रीराम राघवन को अगस्त्य नंदा में वह खास बात मिल गई जो उन्हें वरुण धवन में नहीं दिख रही थी। उन्होंने बताया कि अगस्त्य की आँखों में एक अजीब सी मासूमियत और सच्चाई है। (Actor Performance) के लिए तकनीक से ज्यादा जरूरी भावनाओं का सही चित्रण होता है। राघवन को लगा कि अगस्त्य की वह ‘इनोसेंस’ पर्दे पर एक युवा शहीद की वीरता को और अधिक प्रभावशाली बना देगी, जो दर्शकों के दिलों को सीधे झकझोरने में सक्षम होगी।

21 साल की उम्र और सर्वोच्च बलिदान की गाथा

फिल्म ‘इक्कीस’ की कहानी किसी काल्पनिक नायक की नहीं, बल्कि भारत के जांबाज सपूत अरुण खेत्रपाल की है। महज 21 साल की छोटी सी आयु में उन्होंने युद्ध के मैदान में (Military Heroism) की वो दास्तां लिखी, जिसे आज भी सैन्य अकादमियों में पढ़ाया जाता है। फिल्म उनकी वीरता, उनके संघर्ष और देश के प्रति उनके अटूट प्रेम को जीवंत करने का एक ईमानदार प्रयास है। यह फिल्म उन युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा साबित होने वाली है जो सेना में जाकर देश सेवा का जज्बा रखते हैं।

धर्मेंद्र की मौजूदगी और फिल्म का भावनात्मक पक्ष

इस फिल्म में न केवल युवा जोश है, बल्कि अनुभव की गहराई भी है। दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र ने फिल्म में अरुण खेत्रपाल के पिता की भूमिका निभाई है। (Emotional Narrative) को मजबूती देने में धर्मेंद्र का किरदार काफी अहम है। एक पिता के रूप में उनके भाव और अपने बेटे को खोने का दर्द फिल्म को एक अलग स्तर पर ले जाता है। यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि पर्दे पर पिता और पुत्र के बीच के उन गौरवशाली और मार्मिक क्षणों को श्रीराम राघवन ने किस तरह से बुना है।

धर्मेंद्र के अभिनय सफर का अंतिम पड़ाव

सिनेमा प्रेमियों के लिए यह खबर काफी भावुक करने वाली है कि ‘इक्कीस’ महान अभिनेता धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म होने वाली है। उनके (Cinematic Legacy) का यह अंतिम अध्याय काफी शक्तिशाली बताया जा रहा है। धर्मेंद्र ने अपने दशकों लंबे करियर में कई यादगार रोल निभाए हैं, लेकिन एक शहीद के पिता के रूप में उनका यह किरदार उनके करियर को एक गरिमामयी विदाई देने का काम करेगा। यही वजह है कि दर्शक इस फिल्म का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

क्यों अलग है श्रीराम राघवन की यह फिल्म

श्रीराम राघवन अपनी थ्रिलर और डार्क फिल्मों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन ‘इक्कीस’ उनकी पिछली फिल्मों से काफी अलग होने वाली है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह ‘धुरंधर’ जैसी मसाला फिल्में बनाने में यकीन नहीं रखते। इस बार उनका ध्यान (Biographical Drama) के माध्यम से वास्तविकता और संवेदनशीलता पर अधिक है। वे फिल्म को किसी बॉलीवुड कमर्शियल फिल्म की तरह पेश करने के बजाय, उसे एक सच्ची श्रद्धांजलि के रूप में दिखाना चाहते हैं, जिसमें सादगी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत होगी।

युद्ध के दृश्यों का सजीव चित्रण और तकनीकी बारीकियां

श्रीराम राघवन ने फिल्म के युद्ध दृश्यों और सैन्य परिवेश को यथार्थवादी बनाने के लिए काफी शोध किया है। (Visual Storytelling) के जरिए वे दर्शकों को उस दौर में ले जाना चाहते हैं जब अरुण खेत्रपाल ने वीरता के झंडे गाड़े थे। टैकल और टैंक वॉरफेयर जैसे कठिन दृश्यों को फिल्माने के लिए अत्याधुनिक तकनीक का सहारा लिया गया है, ताकि कहीं से भी फिल्म बनावटी न लगे। निर्देशक की कोशिश है कि फिल्म देखते समय दर्शकों को महसूस हो कि वे खुद युद्ध के मैदान का हिस्सा हैं।

विदाई की बेला और एक नया सितारा

‘इक्कीस’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के दो अलग-अलग छोरों का मिलन है—जहाँ एक तरफ धर्मेंद्र जैसे महानायक की विदाई है, वहीं अगस्त्य नंदा जैसे (Emerging Star) का उदय है। फिल्म की रिलीज के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि वरुण धवन को रिजेक्ट कर अगस्त्य को चुनना कितना सही फैसला था। लेकिन निर्देशक के आत्मविश्वास और कहानी की गहराई को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि ‘इक्कीस’ भारतीय युद्ध फिल्मों के इतिहास में एक नया मील का पत्थर साबित होगी।

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