Supreme Court SOP for Lawyers: न्याय की रफ्तार में आएगा क्रांतिकारी बदलाव, सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों की दलीलों पर लगाई लगाम
Supreme Court SOP for Lawyers: देश की सर्वोच्च अदालत ने न्याय वितरण प्रणाली को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने समक्ष पेश होने वाले वकीलों के लिए मौखिक दलीलें पेश करने और लिखित नोट जमा करने के संबंध में एक सख्त समय-सीमा निर्धारित कर दी है। इस नई (Judicial System Efficiency) को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी जारी की गई है। इस पहल का मुख्य लक्ष्य मुकदमों के बोझ को कम करना और सुनवाई की प्रक्रिया को गति देना है ताकि आम जनता को समय पर न्याय मिल सके।

सीजेआई सूर्यकांत और जजों की पीठ का अहम निर्णय
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और सुप्रीम कोर्ट के अन्य माननीय न्यायाधीशों ने सोमवार को एक आधिकारिक नोटिस जारी कर इस नई व्यवस्था की नींव रखी। इस नोटिस के माध्यम से सभी कानूनी मामलों में मौखिक दलीलों को एक निश्चित अवधि के भीतर पूरा करने के लिए कड़े (Standard Operating Procedure) तय किए गए हैं। अदालत का मानना है कि समय की बर्बादी को रोककर ही न्यायपालिका की गरिमा और उसकी कार्यक्षमता को नई ऊंचाइयों पर ले जाया जा सकता है। यह निर्णय तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है, जिससे वकीलों को अब अपनी तैयारी पहले से कहीं अधिक पुख्ता रखनी होगी।
वकीलों के लिए अनिवार्य हुए नए डिजिटल नियम
नई एसओपी के अनुसार, अब वरिष्ठ वकीलों और बहस करने वाले अधिवक्ताओं को अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा। सुनवाई शुरू होने से कम से कम एक दिन पहले, उन्हें अपनी मौखिक दलीलों के लिए आवश्यक समय-सीमा का विवरण अनिवार्य रूप से जमा करना होगा। यह प्रक्रिया पूरी तरह (Online Legal Portal) के माध्यम से संपन्न की जाएगी, जिसे ‘एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड’ के लिए विशेष रूप से उपलब्ध कराया गया है। इससे अदालत को पहले से पता होगा कि किस मामले में कितना समय लगने वाला है, जिससे दैनिक कार्यसूची का प्रबंधन करना आसान हो जाएगा।
लिखित दलीलों के लिए पन्नों की सीमा हुई तय
सुप्रीम कोर्ट ने न केवल मौखिक बहस बल्कि लिखित दस्तावेजों के विस्तार पर भी अंकुश लगा दिया है। अब किसी भी मामले में बहस करने वाले वकीलों को अधिकतम पांच पन्नों का संक्षिप्त लिखित नोट ही जमा करने की अनुमति होगी। इस (Legal Documentation Limit) का पालन करना अनिवार्य है ताकि जजों को लंबी-चौड़ी फाइलों के बजाय मुख्य बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करने में आसानी हो। यह नियम न केवल कोर्ट का समय बचाएगा बल्कि वकीलों को अपनी बात सटीक और प्रभावी ढंग से रखने के लिए प्रोत्साहित भी करेगा।
विपक्षी दल को सूचना देना अब कानूनी बाध्यता
न्याय प्रक्रिया में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए शीर्ष अदालत ने एक और महत्वपूर्ण शर्त जोड़ी है। वकीलों को अपनी लिखित दलीलों की एक प्रति सुनवाई की तारीख से कम से कम तीन दिन पहले दूसरे पक्ष को सौंपनी होगी। इस (Transparency in Litigation) को सुनिश्चित करने से दूसरे पक्ष को तैयारी का पर्याप्त समय मिलेगा और अदालत में अनावश्यक स्थगन की मांग कम होगी। इससे अदालती कार्यवाही के दौरान होने वाले अप्रत्याशित विलंब पर लगाम लगेगी और दोनों पक्षों के बीच दलीलों का आदान-प्रदान सुचारू रूप से हो सकेगा।
समय-सीमा का उल्लंघन अब नहीं होगा बर्दाश्त
नोटिस में स्पष्ट रूप से चेतावनी दी गई है कि सभी वकीलों को आवंटित समय-सीमा का सख्ती से पालन करना होगा। यदि किसी वकील को दलीलें पेश करने के लिए एक निश्चित समय दिया गया है, तो उसे उसी के भीतर अपनी बात समाप्त करनी होगी। इस (Strict Court Deadlines) का उल्लंघन करने पर अदालत कड़ा रुख अपना सकती है। सुप्रीम कोर्ट के चार रजिस्ट्रार द्वारा हस्ताक्षरित यह नोटिस यह संदेश देता है कि अब कानूनी दांव-पेच में समय का दुरुपयोग स्वीकार्य नहीं होगा।
भविष्य की न्याय प्रणाली का नया खाका
सुप्रीम कोर्ट के इस कदम को भविष्य की डिजिटल और तेज न्याय प्रणाली के आधार के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय से यह मांग उठ रही थी कि अदालतों में बहस की कोई सीमा तय होनी चाहिए ताकि सालों तक चलने वाले मुकदमों का निपटारा जल्दी हो सके। इस (Fast Track Justice India) की दिशा में बढ़ाया गया यह कदम वकीलों को अधिक पेशेवर और अनुशासित बनाएगा। इससे न केवल न्यायाधीशों को महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं पर विचार करने के लिए अधिक समय मिलेगा, बल्कि देश के कानून की साख भी मजबूत होगी



