Nuclear Liability Law Controversy: परमाणु शक्ति की आड़ में हुई दोस्ती, शांति बिल पर कांग्रेस ने लगाया विस्फोटक आरोप…
Nuclear Liability Law Controversy: भारतीय राजनीति के गलियारों में परमाणु ऊर्जा और जवाबदेही को लेकर एक नया संग्राम छिड़ गया है। कांग्रेस पार्टी ने शनिवार को केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि विवादास्पद परमाणु विधेयक ‘शांति बिल’ (SHANTI Bill Parliament Debate) को लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर संसद में पारित कराया गया है। विपक्ष का दावा है कि इस विधेयक को जिस हड़बड़ी और दबाव में पास किया गया, वह देश की सुरक्षा और कानूनी ढांचे पर कई सवालिया निशान खड़े करता है।

निजी रिश्तों के खातिर बदला गया देश का कानून?
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इस मामले में एक बेहद गंभीर और भावनात्मक आरोप लगाया है। उन्होंने संकेत दिया कि इस बिल को सदन में जबरन आगे बढ़ाने के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपने एक ‘पुराने मित्र’ (Political Cronyism Allegations) के साथ संबंधों को सुधारने की मंशा छिपी हो सकती है। हालांकि उन्होंने खुलकर किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके इस इशारे ने देश की राजनीतिक हवाओं में कयासों और चर्चाओं का दौर तेज कर दिया है कि क्या राष्ट्रीय नीतियों का निर्धारण व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर हो रहा है।
परमाणु क्षति कानून के सुरक्षा कवच पर बड़ा प्रहार
जयराम रमेश के अनुसार, यह नया शांति बिल ‘सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट’ के उन मूलभूत प्रावधानों को पूरी तरह खत्म कर देता है जो किसी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में कंपनियों की जवाबदेही तय करते थे। विपक्ष का तर्क है कि इस (Nuclear Liability Clause Dilution) के कारण अब बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को किसी भी संभावित आपदा की जिम्मेदारी से मुक्ति मिल जाएगी। यह बदलाव न केवल पर्यावरण के लिए खतरनाक साबित हो सकता है, बल्कि प्रभावित होने वाले नागरिकों के न्याय पाने के अधिकार को भी कमजोर करता है।
अमेरिकी कानून की चिंताओं ने बढ़ाई भारत की मुश्किल
इस पूरे विवाद में एक नया मोड़ तब आया जब कांग्रेस ने अंतरराष्ट्रीय दस्तावेजों का हवाला देना शुरू किया। पार्टी का आरोप है कि केवल भारत में ही नहीं, बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका के ‘नेशनल डिफेंस ऑथराइजेशन एक्ट 2026’ (US Defense Policy Impact) में भी इस विधेयक के प्रावधानों को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की गई हैं। यदि वैश्विक स्तर पर भी इस कानून को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है, तो यह भारत की परमाणु नीति की साख पर एक बड़ा धब्बा साबित हो सकता है।
नागरिकों की सुरक्षा और कॉरपोरेट लाभ के बीच जंग
शांति बिल को लेकर उठ रहे सवालों के केंद्र में सबसे बड़ी चिंता आम जनता की सुरक्षा है। विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु संयंत्रों के संचालन में किसी भी तरह की चूक विनाशकारी हो सकती है, ऐसे में जवाबदेही के कानून को लचीला बनाना (Public Safety Compromise) जैसा आत्मघाती कदम हो सकता है। कांग्रेस का कहना है कि सरकार आम जनता के हितों की रक्षा करने के बजाय विशिष्ट व्यापारिक हितों को साधने में जुटी है, जो भविष्य के लिए एक डरावनी स्थिति पैदा कर सकता है।
क्या दबाव में आकर झुकी भारत की संप्रभुता?
विपक्ष इस बिल को भारत की संप्रभुता से जोड़कर भी देख रहा है। जयराम रमेश का मानना है कि विदेशी कंपनियों को परमाणु क्षेत्र में निवेश के लिए आकर्षित करने के नाम पर सुरक्षा मानकों (National Sovereignty Concerns) के साथ समझौता किया जा रहा है। कांग्रेस ने मांग की है कि इस विधेयक की फिर से गहन समीक्षा की जानी चाहिए और इसमें उन कड़े प्रावधानों को दोबारा शामिल करना चाहिए जो किसी भी हादसे की स्थिति में ऑपरेटरों और सप्लायरों को दंड का भागी बनाते थे।
संसद की कार्यवाही और विपक्ष की अनसुनी आवाज
शांति बिल के पारित होने की प्रक्रिया पर भी सवालिया निशान लगाए जा रहे हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण और संवेदनशील विधेयक पर विस्तृत चर्चा और संसदीय समिति की जांच की आवश्यकता थी। लेकिन सरकार ने अपनी बहुमत की शक्ति का उपयोग करते हुए (Legislative Process Violation) के माध्यम से इसे कानून का रूप दे दिया। विपक्ष इसे ‘संसदीय लोकतंत्र की हत्या’ करार दे रहा है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे को सड़क से संसद तक ले जाने की चेतावनी दी है।
भविष्य की आहट और परमाणु सुरक्षा की अनिश्चितता
जैसे-जैसे यह विवाद गहरा रहा है, देश के ऊर्जा भविष्य और सुरक्षा ढांचे पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। शांति बिल को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच की यह वैचारिक खाई (Nuclear Policy Gridlock) पैदा कर सकती है, जो भारत के बढ़ते परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों के लिए शुभ संकेत नहीं है। जनता अब इस सवाल का जवाब चाहती है कि क्या यह बिल वास्तव में ‘शांति’ और प्रगति लाएगा या यह केवल कुछ प्रभावशाली हस्तियों के निजी स्वार्थों की पूर्ति का जरिया बनकर रह जाएगा।



