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Raat Akeli Hai The Bansal Murders Review: खौफ, खून और कानपुर का वह काला सच, खुल गई रहस्यों की खूनी परतें…

Raat Akeli Hai The Bansal Murders Review: भारतीय सिनेमा के पर्दे पर जब ‘रात अकेली है’ पहली बार आई थी, तो उसने मर्डर मिस्ट्री की परिभाषा को ही बदल कर रख दिया था। करीब पांच साल के लंबे इंतजार के बाद यह कहानी एक बेहद खौफनाक मोड़ के साथ वापस लौटी है। फिल्म ‘रात अकेली है: द बंसल मर्डर्स’ सिर्फ एक सामान्य (Crime Thriller Sequel) के रूप में नहीं देखी जा सकती, बल्कि यह सत्ता, आस्था और इंसानी फितरत के उन अंधेरे कोनों की पड़ताल करती है जहाँ रोशनी अक्सर पहुँचने से डरती है। यह फिल्म दर्शकों के सामने यह तीखा सवाल छोड़ती है कि आखिर सच तक पहुँचने का रास्ता इतना जटिल और धुंधला क्यों होता है।

Raat Akeli Hai The Bansal Murders Review
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कानपुर की वह काली रात और छह रहस्यमयी मौतें

कहानी की पृष्ठभूमि उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर पर आधारित है, जहाँ के एक रसूखदार और प्रभावशाली बंसल परिवार में मौत का तांडव मचता है। एक ही रात में परिवार के छह सदस्यों की निर्मम हत्या पूरे शहर को सुन्न कर देती है। मामला हाई प्रोफाइल होने के कारण (Police Investigation Mystery) का दबाव सीधे इंस्पेक्टर जटिल यादव के कंधों पर आता है। जैसे-जैसे जटिल यादव इस केस की गहराई में उतरते हैं, उन्हें अहसास होता है कि यह केवल एक पारिवारिक रंजिश नहीं है। यह मामला जल्द ही अंधविश्वास, काला जादू और गुरु मां के इर्द-गिर्द घूमने वाले आध्यात्मिक रहस्यों में तब्दील हो जाता है, जहाँ राजनीति और धर्म का एक घातक मेल दिखाई देता है।

नवाजुद्दीन सिद्दीकी: जटिल यादव का ठहराव और ईमानदारी

अभिनय के मोर्चे पर नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उन्हें ‘एक्टिंग का पावरहाउस’ क्यों कहा जाता है। वह जटिल यादव के किरदार को इतनी सूक्ष्मता से जीते हैं कि उनका (Character Performance Depth) दर्शकों को फिल्म के हर सीन से जोड़कर रखता है। नवाजुद्दीन ने यहाँ किसी सुपरकॉप जैसी कृत्रिम वीरता नहीं दिखाई है, बल्कि वह एक थके हुए, अकेले और सच के प्यासे पुलिस वाले के रूप में नजर आते हैं। उनके चेहरे की खामोशी और आंखों की गहराई फिल्म के माहौल को और भी गंभीर बना देती है, जो एक बेहतरीन अभिनेता की पहचान है।

राधिका आप्टे और चित्रांगदा सिंह का प्रभावशाली संगम

फिल्म में राधिका आप्टे का कैमियो रोल है, जो जटिल यादव की लव इंटरेस्ट के रूप में स्क्रीन पर नजर आती हैं। उनका किरदार भले ही छोटा हो, लेकिन (Emotional Narrative Support) के तौर पर वह कहानी में एक जरूरी ठहराव लेकर आती हैं। वहीं, चित्रांगदा सिंह ने ‘मीरा’ के किरदार में अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया है। वह एक ऐसी रहस्यमयी और संवेदनशील महिला के रूप में सामने आती हैं, जो कहानी में संदेह और सहानुभूति दोनों का संचार करती हैं। उनके किरदार की परतें दर्शकों को अंत तक उलझाए रखने में सफल साबित होती हैं।

आध्यात्मिक गुरु के रूप में दीप्ति नवल का खौफनाक शांत चेहरा

दीप्ति नवल ने फिल्म में एक आध्यात्मिक गुरु की भूमिका निभाई है और उनका अभिनय रोंगटे खड़े कर देने वाला है। उनकी शांत आवाज और स्थिर हाव-भाव (Antagonistic Spiritual Influence) को एक नया आयाम देते हैं, जिससे उनका किरदार डरावना लगने लगता है। इसके साथ ही, रेवती ने एक फॉरेंसिक डॉक्टर के रूप में विज्ञान और तर्क की आवाज को मजबूती दी है। रजत कपूर और संजय कपूर ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है। इला अरुण ने जटिल की मां के रूप में कहानी में वह जरूरी भावनात्मक कोमलता डाली है, जो एक डार्क थ्रिलर के लिए अनिवार्य होती है।

हनी त्रेहन का निर्देशन और संयमित स्क्रीनप्ले

निर्देशक हनी त्रेहन ने इस फिल्म के जरिए यह साबित किया है कि वे सस्पेंस बुनने की कला में माहिर हैं। उन्होंने फिल्म में अनावश्यक ट्विस्ट डालने के बजाय (Atmospheric Direction Style) पर अधिक ध्यान दिया है। कैमरा वर्क इतना सधा हुआ है कि कानपुर की गलियों का अंधेरा और बंसल हवेली का सन्नाटा दर्शकों के मन में घर कर जाता है। फिल्म की रफ्तार धीमी जरूर है, लेकिन यह निर्देशक की एक सोची-समझी रणनीति लगती है, ताकि दर्शक हर सबूत और हर बयान का बारीकी से विश्लेषण कर सकें।

कहानी की कुछ कमजोर कड़ियां और धीमी रफ्तार

फिल्म अपनी खूबियों के बावजूद कुछ मोर्चों पर कमजोर नजर आती है। कुछ सीन जरूरत से ज्यादा लंबे खींचे गए हैं, जैसे अपराध स्थल पर छह लाशों का बार-बार दिखाया जाना। यह (Slow Pace Screenplay) कहानी की निरंतरता को कहीं-कहीं बाधित करता है। नवाजुद्दीन और राधिका के रिश्ते को भी बहुत ही सीमित दायरे में रखा गया है, जिसे अगर थोड़ा और विस्तार दिया जाता तो कहानी भावनात्मक रूप से और अधिक समृद्ध हो सकती थी। संजय कपूर जैसे कद्दावर अभिनेता के किरदार को और अधिक गहराई दी जा सकती थी, जो अंत तक थोड़ा अधूरा सा महसूस होता है।

निष्कर्ष: क्या आपको यह फिल्म देखनी चाहिए?

‘रात अकेली है: द बंसल मर्डर्स’ एक ऐसी फिल्म है जो केवल मनोरंजन के लिए नहीं बनी है, बल्कि यह समाज के खोखलेपन और सिस्टम की विफलता को उजागर करती है। अगर आप (Quality Cinema Recommendation) की तलाश में हैं, जहाँ अभिनय और सस्पेंस का बेहतरीन तालमेल हो, तो यह फिल्म आपके लिए ही है। हालांकि, जो दर्शक बहुत तेज रफ्तार और एक्शन से भरपूर फिल्में पसंद करते हैं, उन्हें यह फिल्म थोड़ी भारी और लंबी लग सकती है। लेकिन एक परिपक्व क्राइम थ्रिलर के शौकीनों के लिए यह साल की सबसे बेहतरीन पेशकशों में से एक है।

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