Sabarimala – सोना घोटाले के आरोपी मुरारी बाबू का हुआ निधन
Sabarimala – केरल के बहुचर्चित सबरीमाला सोना घोटाले से जुड़े प्रमुख आरोपियों में शामिल त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) के पूर्व प्रशासनिक अधिकारी मुरारी बाबू का शनिवार को निधन हो गया। वह लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे थे और कोच्चि के एक निजी अस्पताल में उनका उपचार चल रहा था। उनकी मृत्यु ऐसे समय हुई है जब सबरीमाला मंदिर से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं और सोने की परत वाले पैनलों के मामले की जांच विभिन्न स्तरों पर जारी है।

क्या था पूरा मामला
सबरीमाला मंदिर परिसर में स्थापित कुछ संरचनाओं और द्वारपालक प्रतिमाओं पर लगे सोने की परत वाले पैनलों को हटाए जाने के बाद इस मामले ने तूल पकड़ा था। आरोप लगाए गए थे कि इन पैनलों के रखरखाव और रिकॉर्ड से जुड़ी प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुईं। जांच एजेंसियों ने इस मामले में कई पहलुओं की पड़ताल शुरू की थी, जिसमें सोने से संबंधित अभिलेखों और प्रशासनिक निर्णयों की समीक्षा भी शामिल थी।
जांच में मुरारी बाबू की भूमिका
मुरारी बाबू को इस मामले में दूसरे आरोपी के रूप में नामित किया गया था। पूछताछ के दौरान उन्होंने दावा किया था कि संबंधित पैनलों की प्रविष्टियों में किए गए बदलाव मंदिर प्रशासन को प्राप्त एक पत्र के आधार पर किए गए थे। हालांकि जांच एजेंसियां उनके दावों और दस्तावेजों की सत्यता की अलग से जांच कर रही थीं। मामला वर्षों से कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है।
अन्य आरोपों में भी आया था नाम
विजिलेंस जांच के दौरान मुरारी बाबू का नाम केवल सोना घोटाले तक सीमित नहीं रहा। उन पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोप भी लगे थे। जांच अधिकारियों ने उनके स्वामित्व वाली कुछ संपत्तियों और वित्तीय लेनदेन की भी पड़ताल की थी। इसके अलावा मंदिरों से जुड़े कुछ ठेकों, प्रशासनिक निर्णयों और धार्मिक संस्थानों की संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर भी उनके कार्यकाल पर सवाल उठाए गए थे।
नियुक्ति को लेकर भी हुआ था विवाद
सबरीमाला में उनकी नियुक्ति को लेकर भी विवाद सामने आया था। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया था कि उनके खिलाफ पहले से जांच चलने के बावजूद उन्हें महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इस मुद्दे ने उस समय धार्मिक संस्थानों में नियुक्तियों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर बहस को जन्म दिया था। जांच एजेंसियों ने कुछ निर्णयों की वैधता और प्रक्रिया की भी समीक्षा की थी।
पुलिस सेवा से देवस्वोम बोर्ड तक का सफर
मुरारी बाबू ने अपने करियर की शुरुआत पुलिस सेवा से करने का प्रयास किया था। वर्ष 1994 में उनका चयन पुलिस कांस्टेबल के रूप में हुआ था, लेकिन प्रशिक्षण अवधि के दौरान उन्होंने यह सेवा छोड़ दी। बाद में 1997 में वह त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड से जुड़े और धीरे-धीरे विभिन्न मंदिर प्रशासनिक इकाइयों में जिम्मेदारियां संभालते हुए वरिष्ठ पदों तक पहुंचे। एट्टुमानूर, वाइकोम और थिरुनक्कारा जैसे प्रमुख मंदिरों में भी उन्होंने प्रशासनिक दायित्व निभाए थे।
जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी
मुरारी बाबू के निधन के बावजूद सबरीमाला सोना घोटाले से जुड़ी जांच समाप्त नहीं हुई है। संबंधित एजेंसियां अभी भी मामले से जुड़े दस्तावेजों, वित्तीय रिकॉर्ड और अन्य आरोपियों की भूमिका की जांच कर रही हैं। कानूनी प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है और भविष्य में जांच रिपोर्ट के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जा सकती है।
पारदर्शिता पर बनी हुई है बहस
यह मामला केरल में धार्मिक संस्थानों के प्रशासन, वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर लंबे समय से चर्चा का केंद्र रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच संस्थानों में जनविश्वास बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होती है। फिलहाल सभी की नजर जांच एजेंसियों की आगे की कार्रवाई और अदालतों में चल रही प्रक्रियाओं पर बनी हुई है।