VB G RAM G Bill Controversy: थरूर ने ‘राम’ के नाम पर सरकार को क्यों घेरा, मचेगा बड़ा राजनीतिक बवाल…
VB G RAM G Bill Controversy: भारतीय लोकतंत्र के मंदिर, लोकसभा में मंगलवार को एक ऐसी बहस छिड़ी जिसने देश की पुरानी राजनीतिक विरासत और वर्तमान सत्ता के संकल्पों को आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया। केरल के तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सरकार द्वारा मनरेगा का नाम बदलने के प्रस्ताव पर कड़ा विरोध जताते हुए इसे वैचारिक हमला करार दिया। थरूर ने सदन को संबोधित करते हुए कहा कि (Mahatma Gandhi Vision) का आधार कभी भी संकीर्ण राजनीति नहीं था, बल्कि वह देश के सबसे वंचित तबके के सामाजिक और आर्थिक उत्थान का एक पवित्र ब्लूप्रिंट था। उन्होंने स्पष्ट किया कि बापू का रामराज्य समावेशी था, जिसमें हर गरीब को काम का अधिकार मिलता था, न कि वह केवल नारों तक सीमित था।

राम के नाम पर सियासत और थरूर का बॉलीवुडिया अंदाज में तंज
शशि थरूर अपनी वाकपटुता के लिए जाने जाते हैं और इस बार उन्होंने सरकार पर निशाना साधने के लिए पुराने फिल्मी गीतों का सहारा लिया। उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए एक मशहूर गाने की पंक्तियाँ दोहराईं— ‘देखो ओ दीवानों ये काम मत करो, राम का नाम बदनाम मत करो’। उनका तर्क था कि (Political Branding in India) के फेर में सरकार एक ऐसी योजना की पहचान मिटा रही है जिसने करोड़ों परिवारों को भुखमरी से बचाया है। थरूर के अनुसार, मनरेगा का नाम बदलकर ‘VB-G RAM G’ करना केवल नाम का बदलाव नहीं है, बल्कि यह उस गरिमा का अपमान है जो गांधी जी के नाम के साथ जुड़ी हुई थी।
राजकोषीय संघवाद का उल्लंघन और राज्यों की स्वायत्तता पर संकट
शशि थरूर ने इस बिल के कानूनी और तकनीकी पहलुओं पर रोशनी डालते हुए इसे एक गंभीर संवैधानिक चूक बताया। उन्होंने सदन में जोर देकर कहा कि यह पूरी कवायद (Fiscal Federalism Principles) के खिलाफ है, जो केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय शक्तियों के स्पष्ट बंटवारे की वकालत करती है। थरूर का आरोप है कि केंद्र सरकार इस नए बिल के जरिए राज्यों के वित्तीय अधिकारों और उनकी प्रशासनिक स्वायत्तता में सीधे तौर पर हस्तक्षेप कर रही है। जब केंद्र राज्यों के संसाधनों पर अपना एकाधिकार जमाने की कोशिश करता है, तो इससे देश का संघीय ढांचा कमजोर होता है, जो लोकतंत्र के लिए एक चिंताजनक संकेत है।
प्रियंका गांधी का तीखा प्रहार और दो दशकों की सफलता का हवाला
इस बहस में कांग्रेस की फायरब्रांड नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी सरकार को जमकर घेरा और ‘VB-G RAM G’ बिल 2025 के खिलाफ अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने सदन को याद दिलाया कि (Rural Economy Development) के क्षेत्र में मनरेगा पिछले 20 वर्षों से एक रीढ़ की हड्डी की तरह काम कर रहा है। प्रियंका ने सवाल उठाया कि जब यह कानून दो दशकों से ग्रामीण भारत को रोजगार देने में सक्षम रहा है, तो अचानक इसे बदलने की सनक सरकार पर क्यों सवार है? उन्होंने इस कानून को एक क्रांतिकारी कदम बताया, जिसे कभी सदन के सभी दलों ने सर्वसम्मति से पारित किया था।
ग्रामीण भारत की संजीवनी और 100 दिन के रोजगार का अधिकार
प्रियंका गांधी ने मनरेगा की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह महज एक सरकारी स्कीम नहीं, बल्कि गरीब का कानूनी अधिकार है। उन्होंने कहा कि (Right to Employment) के तहत देश के सबसे गरीब व्यक्ति को 100 दिन का सुनिश्चित काम मिलता आया है, जिसने ग्रामीण इलाकों में क्रय शक्ति को बनाए रखा है। गांधी जी का नाम इस योजना से हटाना उस भावना को ठेस पहुँचाने जैसा है, जो ग्रामीण स्वावलंबन के लिए दी गई थी। विपक्ष का सामूहिक स्वर यही था कि सरकार को विकास के नाम पर इतिहास को मिटाने के बजाय मौजूदा ढांचे को और अधिक सुदृढ़ बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
विरासत बनाम नया मिशन: क्या बदलेगी गांवों की तस्वीर?
सरकार के इस नए मिशन और नाम बदलने की प्रक्रिया ने देश में एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या केवल नाम बदलने से जमीनी हकीकत बदल जाएगी। थरूर और प्रियंका दोनों ने ही इस बात पर जोर दिया कि (Public Welfare Schemes) का उद्देश्य जनसेवा होना चाहिए, न कि किसी खास विचारधारा का प्रचार। विपक्ष ने एकजुट होकर यह मांग की है कि महात्मा गांधी की विरासत को संजोकर रखा जाए और रामराज्य की उस मूल भावना को न कुचला जाए जो सामाजिक न्याय पर टिकी है। सदन के भीतर और बाहर इस मुद्दे पर चल रहा घमासान आने वाले दिनों में और तेज होने के संकेत दे रहा है।
सत्ता और विपक्ष के बीच बढ़ता टकराव और लोकतंत्र का भविष्य
लोकसभा में उठा यह विवाद केवल एक योजना के नाम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने वाला मामला बन गया है। जहां एक तरफ सरकार इसे विकसित भारत की ओर एक बड़ा कदम मान रही है, वहीं विपक्ष इसे (Constitutional Values Preservation) की लड़ाई के रूप में देख रहा है। थरूर ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि विरासत को खत्म करना आसान है, लेकिन उसे बनाना सदियों का काम होता है। अब देखना यह होगा कि जनभावनाओं और राजनीतिक तर्कों के बीच यह बिल किस स्वरूप में कानून की शक्ल लेता है और इसका ग्रामीण जनता पर क्या असर पड़ता है।



