SpeedClaim – डिफेंडर कार की रफ्तार पर विवाद, कंपनी को रकम लौटाने का मिला आदेश…
SpeedClaim – महंगी और लग्जरी गाड़ियों को लेकर अक्सर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जब ये दावे वास्तविकता पर खरे नहीं उतरते, तो मामला सीधे उपभोक्ता अधिकारों तक पहुंच जाता है। ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जिसमें जगुआर लैंड रोवर की डिफेंडर कार को लेकर किए गए प्रदर्शन संबंधी दावों पर सवाल उठे और अंततः उपभोक्ता आयोग ने ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाया।

रफ्तार के दावे पर उठे सवाल
यह पूरा विवाद कार की रफ्तार को लेकर किए गए विज्ञापन से शुरू हुआ। कंपनी ने दावा किया था कि डिफेंडर कार 6.1 सेकेंड में 0 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की गति पकड़ सकती है। लेकिन जब ग्राहक ने वास्तविक परिस्थितियों में इस प्रदर्शन को जांचा, तो कार को इस स्पीड तक पहुंचने में 7 सेकेंड से अधिक समय लगा। यह अंतर मामूली नहीं माना गया और ग्राहक ने इसे भ्रामक जानकारी के रूप में उठाया।
कंपनी की ओर से सफाई दी गई कि इस तरह के आंकड़े नियंत्रित परीक्षण परिस्थितियों में प्राप्त होते हैं, न कि सामान्य सड़क पर। हालांकि आयोग ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि यदि यह जानकारी पहले स्पष्ट नहीं की गई थी, तो इसे उपभोक्ता के साथ गलत जानकारी साझा करना माना जाएगा।
अन्य तकनीकी खामियां भी आईं सामने
मामला सिर्फ रफ्तार तक सीमित नहीं रहा। ग्राहक ने कार में मौजूद अन्य खामियों की ओर भी ध्यान दिलाया। सबसे पहले, फ्यूल टैंक के ढक्कन से जुड़ी समस्या सामने आई, जो सेंट्रल लॉकिंग सिस्टम के साथ काम नहीं कर रहा था। ग्राहक का कहना था कि यह फीचर कार में होना चाहिए था, लेकिन वह मौजूद नहीं था।
इसके अलावा, वाहन के नीचे से अजीब आवाजें आने की शिकायत भी की गई। जब कार को डीलर के पास जांच के लिए ले जाया गया, तो पाया गया कि चेसिस में कटिंग और वेल्डिंग की गई थी। खास बात यह रही कि यह काम ग्राहक की अनुमति के बिना किया गया था, जिससे विवाद और गहरा गया।
चेसिस में बदलाव को माना गंभीर मामला
उपभोक्ता आयोग ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी भी वाहन का चेसिस उसकी मूल संरचना और मजबूती का आधार होता है। इसमें बिना अनुमति किए गए बदलाव वाहन की गुणवत्ता और सुरक्षा दोनों को प्रभावित कर सकते हैं। आयोग ने इस पहलू को गंभीर मानते हुए इसे एक महत्वपूर्ण दोष माना।
कंपनी ने यह कहकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की कि यह कार्य डीलर स्तर पर किया गया था। लेकिन आयोग ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि अंतिम जिम्मेदारी निर्माता कंपनी की ही होती है, क्योंकि उत्पाद उसी के नाम से बेचा जाता है।
आयोग का फैसला और मुआवजा
राज्य उपभोक्ता आयोग की पीठ, जिसकी अध्यक्षता कुमकुम रानी और सदस्य बीएस मनराल ने की, ने मामले की सुनवाई के बाद कंपनी को ग्राहक को पूरी राशि लौटाने का आदेश दिया। यह राशि 1.65 करोड़ रुपये है, जो कार की खरीद कीमत थी।
इसके साथ ही आयोग ने सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करने का निर्देश भी दिया। इतना ही नहीं, कंपनी को 50 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में भी अदा करने होंगे।
उपभोक्ताओं के अधिकारों पर महत्वपूर्ण संदेश
यह फैसला एक स्पष्ट संदेश देता है कि चाहे उत्पाद कितना भी महंगा या प्रतिष्ठित ब्रांड का क्यों न हो, उपभोक्ता के साथ किसी भी प्रकार की भ्रामक जानकारी या लापरवाही स्वीकार्य नहीं है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि कंपनियां अपने दायित्वों से बच नहीं सकतीं, खासकर तब जब मामला गुणवत्ता और पारदर्शिता से जुड़ा हो।
इस मामले ने यह भी दिखाया कि उपभोक्ता यदि अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें और सही मंच पर शिकायत दर्ज करें, तो उन्हें न्याय मिल सकता है।