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SabarimalaCase – पूजा अधिकार और परंपरा पर सुप्रीम कोर्ट में जारी है गहन बहस

SabarimalaCase – सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान संविधान और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन को लेकर अहम सवाल उठे। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने यह टिप्पणी की कि यदि कोई श्रद्धालु अपनी आस्था के तहत देवता के करीब जाना चाहता है, लेकिन उसे रोका जाता है, तो क्या ऐसी स्थिति में संविधान उसकी रक्षा के लिए आगे नहीं आएगा? यह सवाल उस बहस के बीच उठा, जिसमें यह तय किया जा रहा है कि क्या किसी व्यक्ति को जन्म, परंपरा या धार्मिक मान्यताओं के आधार पर पूजा-अधिकार से वंचित किया जा सकता है।

परंपराओं को लेकर मंदिर पक्ष की दलील

मामले में मंदिर के प्रमुख पुजारी की ओर से अदालत में यह पक्ष रखा गया कि पूजा-पद्धतियां और धार्मिक अनुष्ठान किसी भी धर्म का मूल आधार होते हैं। उनके अनुसार, इन परंपराओं को केवल सामाजिक प्रथा नहीं, बल्कि धार्मिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जब कोई भक्त मंदिर में प्रवेश करता है, तो उसे वहां की स्थापित मान्यताओं और नियमों को स्वीकार करना होता है। पुजारी पक्ष का मानना है कि इन परंपराओं में बदलाव धार्मिक ढांचे को प्रभावित कर सकता है, इसलिए इन्हें संरक्षित रखना जरूरी है।

धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक मुद्दों पर भी नजर

सबरीमाला विवाद की सुनवाई केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए अदालत कई अन्य संवेदनशील विषयों पर भी विचार कर रही है। इनमें मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों और दरगाहों में प्रवेश के अधिकार, पारसी समुदाय में अंतरधार्मिक विवाह के बाद महिलाओं के अग्नि मंदिर में प्रवेश से जुड़े सवाल, सामाजिक बहिष्कार की प्रथाओं की वैधता और दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला जननांग विकृति जैसे मुद्दे शामिल हैं। ये सभी मामले संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और उसके दायरे को स्पष्ट करने से जुड़े हैं।

समयसीमा को लेकर अदालत का सख्त रुख

सुनवाई के पहले दिन ही संविधान पीठ ने स्पष्ट कर दिया कि सभी पक्षों को तय समयसीमा के भीतर अपनी दलीलें पूरी करनी होंगी। अदालत ने यह भी कहा कि देश के सर्वोच्च न्यायालय में कई महत्वपूर्ण मामले लंबित हैं, इसलिए किसी भी पक्ष को अतिरिक्त समय देने की गुंजाइश नहीं है। सभी वकीलों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने तर्क और दस्तावेज निर्धारित समय में ही प्रस्तुत करें, ताकि सुनवाई तय कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ सके।

सुनवाई का विस्तृत कार्यक्रम पहले से तय

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने इस मामले की सुनवाई का पूरा कार्यक्रम पहले ही निर्धारित कर दिया था। तय कार्यक्रम के अनुसार, समीक्षा याचिकाओं के समर्थन में दलीलें 7 से 9 अप्रैल के बीच सुनी गईं। इसके बाद विरोधी पक्ष ने 14 से 16 अप्रैल तक अपने तर्क रखे। 21 अप्रैल को जवाबी दलीलें पेश की जानी हैं, जबकि एमिकस क्यूरी की ओर से अंतिम बहस 22 अप्रैल तक पूरी होने की संभावना है। इस सुनवाई को लेकर सभी पक्षों की तैयारियां पहले से ही निर्धारित समयरेखा के अनुसार चल रही हैं।

केंद्र सरकार और अन्य पक्षों का रुख

मामले में त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने अदालत से यह आग्रह किया है कि धर्म को व्यक्तिगत अधिकार के बजाय समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोण से देखा जाए। उनका मानना है कि धार्मिक परंपराओं को समझने के लिए सामुदायिक मान्यताओं को महत्व देना जरूरी है। वहीं, केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार इन समीक्षा याचिकाओं के समर्थन में है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इस मामले में विभिन्न पक्षों के विचार अलग-अलग हैं, और अदालत को सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए संतुलित निर्णय देना होगा।

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