Delimitation – परिसीमन नीति को लेकर दक्षिण में बढ़ी नाराज़गी, स्टालिन का केंद्र पर हमला
Delimitation – दक्षिण भारत में प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक माहौल धीरे-धीरे गर्म होता जा रहा है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी को सीधे तौर पर घेरते हुए कहा कि यह कदम क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकता है। उनका मानना है कि इस तरह की नीति देश के संघीय ढांचे के लिए चुनौती बन सकती है और इससे दक्षिणी राज्यों में असंतोष बढ़ रहा है।

परिसीमन को लेकर उठ रहे सवाल
स्टालिन ने अपने बयान में कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया यदि वर्तमान जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर लागू की जाती है, तो इससे उन राज्यों को नुकसान होगा जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। उनका तर्क है कि दक्षिण भारत के कई राज्यों ने दशकों तक योजनाबद्ध तरीके से जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया, लेकिन अब उन्हें ही राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने इस स्थिति को “अन्यायपूर्ण” करार देते हुए कहा कि यह नीति संतुलित नहीं लगती।
भाजपा पर ‘आग से खेलने’ का आरोप
मुख्यमंत्री ने भाजपा पर तीखा हमला करते हुए कहा कि पार्टी इस संवेदनशील मुद्दे पर “आग से खेल रही है”। उनका कहना है कि इस तरह के फैसले देश की एकता और अखंडता को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर केंद्र सरकार ने राज्यों की चिंताओं को नजरअंदाज किया, तो यह मामला और गंभीर हो सकता है। स्टालिन ने यह भी कहा कि इस विषय पर व्यापक चर्चा और सहमति जरूरी है।
टीएमसी ने भी जताई चिंता
केवल दक्षिण भारत ही नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने भी इस मुद्दे पर अपनी शंकाएं व्यक्त की हैं। पार्टी का कहना है कि परिसीमन प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता की कमी है और इससे राजनीतिक संतुलन बिगड़ सकता है। टीएमसी नेताओं का मानना है कि इस तरह के बड़े फैसले बिना सभी राज्यों को भरोसे में लिए नहीं किए जाने चाहिए।
संघीय ढांचे पर असर की आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि परिसीमन केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि इसका सीधा असर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर पड़ता है। अगर सीटों का पुनर्विन्यास असंतुलित तरीके से किया गया, तो इससे क्षेत्रीय असमानताएं बढ़ सकती हैं। कई राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस मुद्दे पर केंद्र और राज्यों के बीच संवाद बेहद जरूरी है, ताकि किसी भी तरह का टकराव टाला जा सके।
आगे की राह पर नजर
फिलहाल इस विषय पर कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक बयानबाजी से साफ है कि आने वाले समय में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है। विभिन्न दलों की प्रतिक्रियाओं को देखते हुए यह संकेत मिल रहा है कि परिसीमन को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो सकती है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है और राज्यों की चिंताओं को किस तरह संबोधित करती है