CGHSSystem – बढ़ती मरीज संख्या के बीच डॉक्टरों की कमी से जूझती स्वास्थ्य योजना
CGHSSystem – केंद्र सरकार की स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) इन दिनों बढ़ते लाभार्थियों और घटती चिकित्सा संसाधनों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती का सामना कर रही है। हालिया जानकारी के अनुसार, अगस्त 2025 तक इस योजना से जुड़े लाभार्थियों की संख्या करीब 48 लाख तक पहुंच चुकी है और हर साल इसमें लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है। दूसरी ओर, स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता लगातार कम हो रही है, जिससे सेवाओं की गुणवत्ता और पहुंच दोनों प्रभावित हो रही हैं।

लाभार्थियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी
सीजीएचएस का दायरा पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए बनाई गई इस योजना में हर साल बड़ी संख्या में नए लाभार्थी जुड़ रहे हैं। ‘कॉन्फेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लाइज एंड वर्कर्स’ के अनुसार, पिछले दशक में इस योजना का विस्तार उल्लेखनीय रहा है।
हालांकि, लाभार्थियों की बढ़ती संख्या के अनुपात में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार उतनी तेजी से नहीं हो पाया है। पिछले तीन वर्षों में 38 नए एलोपैथिक स्वास्थ्य केंद्रों को मंजूरी जरूर दी गई, लेकिन बढ़ती मांग के मुकाबले यह संख्या पर्याप्त नहीं मानी जा रही। इससे कई शहरों में मरीजों पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
मंजूरी के बावजूद शुरू नहीं हो सके कई केंद्र
सरकारी आदेशों के तहत देशभर में 22 अतिरिक्त सीजीएचएस स्वास्थ्य केंद्रों को स्वीकृति दी गई थी। इन केंद्रों के लिए कुल 88 पदों के सृजन की भी अनुमति दी गई। बावजूद इसके, एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी ये केंद्र शुरू नहीं हो पाए हैं।
इस देरी का सीधा असर उन कर्मचारियों और पेंशनभोगियों पर पड़ रहा है, जिन्हें इन केंद्रों से चिकित्सा सुविधा मिलने की उम्मीद थी। कई क्षेत्रों में मरीजों को लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है या पहले से ही दबाव झेल रहे केंद्रों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
मानकों के अनुसार नियुक्तियों की कमी
स्वास्थ्य सेवाओं के संचालन के लिए मानक निरीक्षण इकाई (एसआईयू) ने स्पष्ट दिशानिर्देश तय किए हैं। इनके अनुसार, प्रत्येक केंद्र पर चार जनरल ड्यूटी मेडिकल ऑफिसर और तीन फार्मासिस्ट होने चाहिए। लेकिन मौजूदा स्थिति में अधिकांश केंद्र इन मानकों से काफी पीछे हैं।
वर्तमान में कई केंद्रों पर केवल एक डॉक्टर और एक फार्मासिस्ट के सहारे काम चलाया जा रहा है। ऐसी स्थिति में एक डॉक्टर पर 15,000 से 25,000 लाभार्थियों का भार आ जाता है, जो व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है। इससे न केवल मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता, बल्कि डॉक्टरों पर भी अत्यधिक दबाव बनता है।
अवकाश के दौरान सेवाएं हो जाती हैं प्रभावित
डॉक्टरों और फार्मासिस्ट की कमी का एक और गंभीर पहलू तब सामने आता है, जब कोई कर्मचारी अवकाश पर चला जाता है। ऐसी स्थिति में कई स्वास्थ्य केंद्र अस्थायी रूप से बंद हो जाते हैं या सेवाएं सीमित कर दी जाती हैं।
आमतौर पर एक डॉक्टर एक दिन में 55 से 65 मरीजों का ही प्रभावी इलाज कर सकता है। लेकिन जब मरीजों की संख्या इससे कहीं अधिक हो जाती है, तो सेवा की गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है। इसका सीधा असर मरीजों के इलाज और संतुष्टि पर पड़ता है।
नीति स्तर पर हस्तक्षेप की मांग
इन समस्याओं को देखते हुए ‘कॉन्फेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लाइज एंड वर्कर्स’ ने वित्त मंत्री और स्वास्थ्य मंत्री से इस मुद्दे पर तत्काल ध्यान देने का अनुरोध किया है। संगठन का कहना है कि नए स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना के साथ-साथ आवश्यक पदों की भर्ती भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
संसदीय समिति ने भी डॉक्टर-लाभार्थी अनुपात को सुधारने की जरूरत पर जोर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।
व्यवस्था में सुधार की जरूरत
सीजीएचएस जैसी महत्वपूर्ण योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि लाभार्थियों को समय पर और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाएं मिलें। इसके लिए जरूरी है कि न केवल नए केंद्र खोले जाएं, बल्कि वहां पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित डॉक्टर और फार्मासिस्ट भी नियुक्त किए जाएं।
साथ ही, एक्सटेंशन काउंटरों को भी उचित संसाधन और स्टाफ उपलब्ध कराना जरूरी है, ताकि वे प्रभावी तरीके से काम कर सकें। वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि केवल योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके क्रियान्वयन पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है।



