Ventilator Crisis – लखनऊ के सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी से मरीजों की परेशानी
Ventilator Crisis – राजधानी लखनऊ के सरकारी अस्पतालों में गंभीर मरीजों के इलाज से जुड़ी व्यवस्थाओं पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। गोरखपुर से रेफर होकर आए देवरिया के एक मरीज को समय पर वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं हो सका, जिसके चलते उसकी मौत हो गई। यह घटना न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि जरूरी संसाधनों की कमी किस तरह मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो रही है।

वेंटिलेटर की उपलब्धता और उपयोग में बड़ा अंतर
विशेषज्ञों का कहना है कि राजधानी के कई सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर मशीनें तो मौजूद हैं, लेकिन उन्हें संचालित करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। यही वजह है कि उपलब्ध वेंटिलेटर भी पूरी क्षमता से उपयोग में नहीं आ पा रहे हैं। गंभीर मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक ले जाने की मजबूरी बन जाती है, जिससे समय की देरी उनके जीवन पर भारी पड़ती है।
लोकबंधु अस्पताल में सीमित सेवाएं
300 बेड वाले लोकबंधु अस्पताल में कुल 40 वेंटिलेटर हैं, लेकिन इनमें से केवल 10 पर ही मरीजों का इलाज हो पा रहा है। शेष वेंटिलेटर लंबे समय से बंद पड़े हैं। इसकी एक बड़ी वजह पिछले वर्ष हुई आग की घटना के बाद आईसीयू का निर्माण कार्य अधूरा रहना बताया जा रहा है। ऐसे में अस्पताल की क्षमता होते हुए भी मरीजों को पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है।
बलरामपुर अस्पताल में मैनपावर की कमी
बलरामपुर अस्पताल में 60 वेंटिलेटर बेड उपलब्ध हैं, लेकिन इनमें से केवल 28 ही सक्रिय हैं। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, प्रशिक्षित कर्मचारियों और विशेषज्ञों की कमी के कारण सभी वेंटिलेटर बेड का संचालन संभव नहीं हो पा रहा है। इससे गंभीर मरीजों को समय पर उपचार मिलने में कठिनाई हो रही है।
अन्य अस्पतालों में भी यही स्थिति
ठाकुरगंज अस्पताल में दो और रानी लक्ष्मीबाई अस्पताल में पांच वेंटिलेटर मौजूद हैं, लेकिन इनका भी नियमित उपयोग नहीं हो पा रहा है। इन अस्पतालों में भी विशेषज्ञ डॉक्टरों और जरूरी संसाधनों की कमी एक बड़ी बाधा बनी हुई है। नतीजतन, मरीजों को अपेक्षित चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती।
मेडिकल संस्थानों पर बढ़ता दबाव
पीजीआई और अन्य बड़े चिकित्सा संस्थानों में करीब 500 वेंटिलेटर उपलब्ध हैं, लेकिन यहां पूरे प्रदेश के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों से भी मरीज पहुंचते हैं। मरीजों की अधिक संख्या के कारण इन संस्थानों पर भारी दबाव रहता है, जिससे जरूरतमंद मरीजों को तुरंत वेंटिलेटर मिलना मुश्किल हो जाता है।
सरकारी बनाम निजी इलाज का अंतर
सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर पर इलाज आमतौर पर निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है, जो आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए राहत की बात है। वहीं, केजीएमयू, पीजीआई और लोहिया संस्थान जैसे बड़े संस्थानों में इस सुविधा पर प्रतिदिन 10 से 20 हजार रुपये तक का खर्च आता है। निजी अस्पतालों में यह खर्च और अधिक होकर एक से डेढ़ लाख रुपये प्रतिदिन तक पहुंच जाता है। ऐसे में अधिकांश मरीजों के लिए सरकारी अस्पताल ही एकमात्र विकल्प बचते हैं।
व्यवस्था सुधार की जरूरत पर जोर
लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं संकेत देती हैं कि केवल उपकरण उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन और बुनियादी ढांचे की भी उतनी ही आवश्यकता है। स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए इन पहलुओं पर गंभीरता से काम किए जाने की जरूरत महसूस की जा रही है।