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KeralaElections – कांग्रेस के लिए बढ़ती चुनौतियां, अंदरूनी कलह बनी चिंता की वजह

KeralaElections – केरल में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, राजनीतिक माहौल तेज होता जा रहा है और इसके साथ ही कांग्रेस की मुश्किलें भी खुलकर सामने आने लगी हैं। राज्य में नौ अप्रैल को मतदान होना है और इस बार का चुनाव कांग्रेस के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि पार्टी पिछले एक दशक से सत्ता से बाहर है। केरल की परंपरा रही है कि हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन होता है, लेकिन 2021 में वाम मोर्चे ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल कर इस क्रम को तोड़ दिया था। ऐसे में इस बार मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया है।

पार्टी के भीतर तालमेल की कमी साफ दिख रही
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी आंतरिक एकजुटता मानी जा रही है। वरिष्ठ नेताओं के बीच नेतृत्व को लेकर खींचतान जारी है और कई नेता खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मान रहे हैं। इससे पार्टी के भीतर स्पष्ट नेतृत्व की कमी महसूस हो रही है। हालांकि, केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य इकाई को सामूहिक नेतृत्व के साथ चुनाव लड़ने का निर्देश दिया है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह रणनीति पूरी तरह लागू होती नहीं दिख रही।

प्रदेश के कई नेताओं का मानना है कि यदि पार्टी सत्ता में आती है, तो अंतिम फैसला दिल्ली स्तर पर लिया जा सकता है। इस कारण कई नेता अपने-अपने क्षेत्र तक ही सीमित नजर आ रहे हैं, जिससे सामूहिक चुनावी रणनीति कमजोर पड़ती दिख रही है।

संगठनात्मक ढांचा भी कमजोर पड़ता नजर आया
राज्य में कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा भी इस समय चुनौती का सामना कर रहा है। वामपंथी दलों की तुलना में कांग्रेस का कैडर बेस उतना मजबूत नहीं है। एलडीएफ के पास बूथ स्तर तक सक्रिय कार्यकर्ता मौजूद हैं, जबकि कांग्रेस कई क्षेत्रों में इस मामले में पिछड़ती दिखाई देती है।

इसके अलावा, पार्टी के कई प्रमुख नेता खुद चुनाव मैदान में उतर गए हैं। प्रदेश अध्यक्ष, कार्यकारी अध्यक्ष, संगठन के प्रमुख पदाधिकारी और कई जिला अध्यक्ष चुनाव लड़ रहे हैं। इससे संगठन के संचालन में एक तरह का खालीपन महसूस हो रहा है, क्योंकि निर्णय लेने और समन्वय स्थापित करने के लिए पर्याप्त नेतृत्व उपलब्ध नहीं है।

सत्ताधारी मोर्चे की मजबूत पकड़
वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) ने पिछले कार्यकाल में कई कल्याणकारी योजनाओं और प्रशासनिक फैसलों के जरिए अपनी पकड़ मजबूत की है। सरकार की योजनाओं का असर जमीनी स्तर पर दिखाई देता है, जिससे मतदाताओं के बीच उसका आधार मजबूत बना हुआ है। ऐसे में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के लिए इस मजबूत स्थिति को चुनौती देना आसान नहीं माना जा रहा।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एलडीएफ का संगठित ढांचा और स्पष्ट नेतृत्व उसे चुनाव में बढ़त दिला सकता है, जबकि कांग्रेस को इन दोनों मोर्चों पर काम करने की जरूरत है।

सामाजिक समीकरण और भाजपा की मौजूदगी
केरल की राजनीति हमेशा से सामाजिक और सामुदायिक समीकरणों से प्रभावित रही है। ऐसे में कांग्रेस के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी पारंपरिक धर्मनिरपेक्ष छवि को बनाए रखते हुए विभिन्न समुदायों के बीच संतुलन स्थापित करे। यह काम आसान नहीं है, क्योंकि बदलते राजनीतिक माहौल में मतदाताओं की प्राथमिकताएं भी बदल रही हैं।

दूसरी ओर, भाजपा भले ही राज्य में प्रमुख ताकत नहीं बन पाई हो, लेकिन उसका वोट प्रतिशत धीरे-धीरे बढ़ रहा है। पिछले चुनाव में पार्टी को लगभग 11 प्रतिशत वोट मिले थे, जो यह संकेत देता है कि वह अपने आधार को विस्तार देने की कोशिश में लगी हुई है। इसका सीधा असर मुख्य मुकाबले पर पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, केरल चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ एक राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि अपनी संगठनात्मक क्षमता और एकजुटता को साबित करने की चुनौती भी है।

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