KumbhHeritage – हरिद्वार में कुंभ क्षेत्र के बदलते स्वरूप पर बढ़ी चिंता
KumbhHeritage – हरिद्वार की धार्मिक परंपराओं और कुंभ मेले की बदलती तस्वीर को लेकर चिंताएं सामने आ रही हैं। भूमा निकेतन के प्रबंधक राजेंद्र ने वर्षों के अनुभव के आधार पर बताया कि समय के साथ इस क्षेत्र का स्वरूप काफी बदल गया है। उनका कहना है कि पहले जहां साधना और आध्यात्म का वातावरण प्रमुख होता था, वहीं अब भौतिक विकास और संरचनाओं का विस्तार अधिक दिखाई देता है।

पुराने कुंभ मेले की सादगी और आध्यात्म
राजेंद्र के अनुसार, उन्होंने पहली बार 1980 में कुंभ मेले को करीब से देखा था। उस समय व्यवस्थाएं सीमित थीं, लेकिन धार्मिक भावना और साधना का माहौल बेहद गहरा होता था। संत रेत के टीलों पर मचान बनाकर साधना करते थे और श्रद्धालुओं को धर्म के प्रति जागरूक करते थे। संसाधन कम होने के बावजूद आध्यात्मिक ऊर्जा स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती थी।
समय के साथ बढ़ी भव्यता, बदला स्वरूप
उन्होंने बताया कि समय के साथ कुंभ मेले का दायरा और व्यवस्थाएं दोनों बढ़ी हैं। अब संतों और अखाड़ों को अलग-अलग स्थानों पर भूमि आवंटित की जाती है, जिससे आयोजन अधिक व्यवस्थित हो गया है। हालांकि, उनके अनुसार इस विस्तार के साथ कुछ नई चुनौतियां भी सामने आई हैं, जिन पर ध्यान देना जरूरी है।
आवंटित भूमि के उपयोग पर उठे सवाल
राजेंद्र ने यह भी कहा कि पहले जिन अखाड़ों और संतों को भूमि दी गई थी, उसका उपयोग समय के साथ बदलता गया। उनका आरोप है कि कई स्थानों पर मूल उद्देश्य से हटकर निर्माण कार्य हुए हैं। इससे पारंपरिक स्वरूप प्रभावित हुआ है। उनका मानना है कि इस विषय पर समय रहते उचित निगरानी की आवश्यकता थी।
नदी किनारों पर बढ़ता निर्माण चिंता का कारण
उन्होंने सप्तऋषि क्षेत्र का उदाहरण देते हुए बताया कि पहले नदी के किनारे खुले और प्राकृतिक रहते थे, लेकिन अब वहां निर्माण कार्य बढ़ गए हैं। इससे पर्यावरण और धार्मिक महत्व दोनों पर असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसे बदलावों को संतुलित तरीके से देखना जरूरी है, ताकि प्राकृतिक स्वरूप बना रहे।
प्रशासन और समाज से संरक्षण की अपील
राजेंद्र ने शासन-प्रशासन और संत समाज से अपील की कि वे मिलकर इस ऐतिहासिक और धार्मिक क्षेत्र के संरक्षण के लिए प्रयास करें। उनका कहना है कि विकास आवश्यक है, लेकिन इसके साथ परंपरा और मूल पहचान को बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
धार्मिक विरासत को बचाने की जरूरत
उन्होंने अंत में कहा कि हरिद्वार केवल एक शहर नहीं, बल्कि आस्था और संस्कृति का केंद्र है। ऐसे में इसके स्वरूप को सुरक्षित रखना सभी की जिम्मेदारी है। यदि समय रहते संतुलन नहीं बनाया गया, तो आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र की पहचान प्रभावित हो सकती है।



