झारखण्ड

BriberyCase – जमशेदपुर में रिश्वत लेते प्रधान लिपिक और दलाल गिरफ्तार

BriberyCase – झारखंड के जमशेदपुर में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अहम कार्रवाई सामने आई है, जहां भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने सरायकेला-खरसावां जिला भू-अर्जन कार्यालय से जुड़े दो लोगों को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया है। इस कार्रवाई में प्रधान लिपिक प्रितम आचार्य और उनके सहयोगी विनय कुमार तिवारी को पकड़ा गया है। दोनों पर आरोप है कि उन्होंने जमीन अधिग्रहण से जुड़े मुआवजे के भुगतान के बदले बड़ी रकम की मांग की थी।

शिकायत के आधार पर शुरू हुई जांच

यह कार्रवाई चौका थाना क्षेत्र के धुनाबुरू गांव निवासी गुचरण सिंह सरदार की शिकायत के बाद की गई। उन्होंने ACB को दी अपनी शिकायत में बताया था कि उनकी जमीन का अधिग्रहण चांडिल अंचल में हुआ था, जिसके बदले उन्हें करीब 1 करोड़ 48 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा मिलना था। आरोप है कि इस राशि के भुगतान को आगे बढ़ाने के लिए प्रधान लिपिक ने उनसे 40 लाख रुपये की रिश्वत मांगी थी और इसके लिए अपने एक परिचित के माध्यम से संपर्क करने को कहा गया था।

सत्यापन में सही पाए गए आरोप

ACB अधिकारियों ने शिकायत मिलने के बाद मामले की प्राथमिक जांच कराई, जिसमें लगाए गए आरोपों की पुष्टि हुई। इसके बाद 22 मार्च 2026 को भ्रष्टाचार निरोधक कानून की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। जांच के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि रिश्वत की मांग सुनियोजित तरीके से की गई थी और इसमें एक दलाल की भी भूमिका थी।

ट्रैप टीम ने की योजनाबद्ध कार्रवाई

मामले की गंभीरता को देखते हुए ACB ने एक विशेष टीम का गठन किया और पूरी योजना के साथ कार्रवाई को अंजाम दिया। 23 मार्च 2026 को तय रणनीति के अनुसार पहली किस्त के रूप में 5 लाख रुपये की रिश्वत लेते समय दोनों आरोपियों को रंगे हाथ पकड़ लिया गया। इस दौरान स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में पूरी प्रक्रिया पूरी की गई और रिश्वत की रकम भी बरामद कर ली गई।

पूछताछ और आगे की कार्रवाई जारी

गिरफ्तारी के बाद दोनों आरोपियों से पूछताछ की जा रही है, ताकि इस मामले से जुड़े अन्य पहलुओं की जानकारी मिल सके। अधिकारियों का कहना है कि पूरे प्रकरण की गहराई से जांच की जा रही है और यदि अन्य लोगों की संलिप्तता सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।

इस कार्रवाई को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है। जमीन अधिग्रहण और मुआवजे से जुड़े मामलों में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए इस तरह की कार्रवाई को अहम माना जा रहा है।

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