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गुजरातः हिमाचल की हार का राहुल पर क्या असर होगा

जय प्रकाश पाण्डेय
राहुल गांधी ने ऐसे समय देश की सबसे पुरानी पार्टी की बागडोर संभाली है, जब पार्टी इतिहास के सबसे खराब दौर से गुजर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को मजबूती देना है। 2014 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस के हाथ से लगातार एक के बाद एक राज्यों की सत्ता निकलती गई। लोकसभा में उसके सदस्यों की गिनती 50 से नीचे है, तो केंद्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी के साथ पार्टी केवल छह राज्यों तक सिमटकर रह गई है। लगातार हार से कार्यकर्ताओं का मनोबल तो घट ही रहा,पार्टी को फंड की भी कमी पड़ रही। ऐसे में पार्टी को सत्ता में लाने के साथ ही संगठन को दोबारा खड़ा करने की जिम्मेदारी भी राहुल के कंधों पर ही है। राहुल गांधी अंततः कांग्रेस अध्यक्ष बन तो गए, पर उन्हें पहला तोहफा गुजरात और हिमाचल प्रदेश में पार्टी की हार से मिला है। इन राज्यों में उन्होंने खूब मेहनत की थी। पर क्या इससे राहुल के सियासी भविष्य पर कोई असर पड़ेगा। शायद नहीं। अगर वह मेहनत करेंगे तो एक बड़े नेता के तौर पर उभर सकते हैं। विपक्ष में रहने से उन्हें जनता की बात उठाने के ऐसे तमाम मौके मिलेंगे, जो शायद सत्ता में रहने से नहीं मिलते। राहुल गांधी, ऐसा नेता हैं, जिन्हें शोहरत और सियासत मिली तो विरासत में, पर जिसने उसे कभी पसंद नहीं किया। राहुल की राजनीतिक यात्रा में सियासत से उनकी अरुचि जब-तब दिख ही जाती है। जब वह सांसद बने, और जब उनकी पार्टी को बहुमत था, तब भी उन्होंने सरकार में कोई पद स्वीकार नहीं किया। वह जब तब कहते भी हैं कि राजनीति सेवा का माध्यम है सत्ता पाने का नहीं। इस मामले में वह अपने पूर्वजों मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से इतर और अपने पिता राजीव गांधी और मां सोनिया से ज्यादा नजदीक हैं, जिन्हें शुरुआती दौर में राजनीति नापसंद थी। पर अब जब वह कांग्रेस अध्यक्ष हैं तो उनके सामने कई चुनौतियां हैं। पहली तो यही कि उन पर उनके परिवार के वट-वृक्ष सरीखे पूर्वजों की तरह परिणाम देने का दबाव होगा। उन्हें उन सभी की छाया से मुक्त होकर अपनी एक पहचान बनानी होगी।
नेहरू-गांधी परिवार से कुल 6 लोग अब तक कांग्रेस अध्यक्ष बन चुके हैं। जिनमें पंडित मोतीलाल नेहरू, पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने सियासत को देश सेवा के रूप में सोच-समझ कर अपनाया था, जबकि राजीव, सोनिया और अब राहुल, तीनों ही नियती का शिकार हो राजनीति में आए। यही वजह है कि कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी राहुल गांधी को श्अनिच्छुक राजनीतिज्ञ्य कहते हैं। पर अब अनिच्छा से काम नहीं चलने वाला। राहुल गांधी ने ऐसे समय देश की सबसे पुरानी पार्टी की बागडोर संभाली है, जब पार्टी इतिहास के सबसे खराब दौर से गुजर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को मजबूती देना है। 2014 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस के हाथ से लगातार एक के बाद एक राज्यों की सत्ता निकलती गई। लोकसभा में उसके सदस्यों की गिनती 50 से नीचे है, तो केंद्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी के साथ पार्टी केवल छह राज्यों तक सिमटकर रह गई है। लगातार हार से कार्यकर्ताओं का मनोबल तो घट ही रहा, पार्टी को फंड की भी कमी पड़ रही। ऐसे में पार्टी को सत्ता में लाने के साथ ही संगठन को दोबारा खड़ा करने की जिम्मेदारी भी राहुल के कंधों पर ही है। जाहिर है राहुल गांधी को पार्टी में नई जान डालने के साथ ही खुद के अंतर्विरोधों से सामंजस्य बिठाना सीखना होगा। पार्टी के अंदर और बाहर उनके विरोधी मौजूद हैं। पार्टी में चापलूसी संस्कृति के चलते जनाधारविहीन नेता मलाईदार पदों पर बैठकर खुद तो मालदार बने, पर घुन की तरह पार्टी को कमजोर किया। राहुल को इस कुसंस्कृति से भी जूझना होगा। कांग्रेस पार्टी को जमीनी स्तर पर खड़ा करना भी राहुल गांधी के लिए बड़ी चुनौती है। कांग्रेस में नेता तो हैं, लेकिन कार्यकर्ता नहीं हैं। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी दिक्कत बूथ लेबल पर पार्टी को खड़ा करने की है। मौजूदा दौर में कांग्रेस की हार की सबसे बड़ी वजह बूथ स्तर पर पार्टी का न होना है। दरअसल राहुल गांधी राजनीति में जिस शुचिता, साफगोई, सच्चरित्रता और ईमानदारी की बातें करते हैं, उस पर उनके साथ चलने वालों की गिनती न के बराबर है। शायद यही वजह है कि पार्टी उपाध्यक्ष के रूप में उनके तमाम प्रयासों की हवा यह कह कर निकाल दी गई कि राहुल जमीनी सच्चाई से दूर हैं, जबकि ऐसा नहीं था। कांग्रेस उपाध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी ने संगठन में लगातार प्रयोग किया। पार्टी टिकट हासिल करने के लिए पहली बार उन्होंने पार्टी के भीतर प्राइमरी चुनाव शुरू किए थे जिससे कई युवा नेता सामने आए। संगठन चुनावों में हारने वालों को भी एक-दूसरे से जोड़कर राहुल गांधी काफी हद तक युवाओं को अपने साथ जोड़ने में कामयाब रहे। उन्हें पार्टी के भीतर काफी मेहनत करने वाले नेता के रूप में देखा जाता है। चाहे हार हो या जीत अब वह डटे रहते हैं। उनके सामने एक चुनौती पार्टी के सीनियर और जूनियर नेताओं के बीच बेहतर तालमेल बैठाने की भी है। कई राज्यों में पार्टी के वरिष्ठ और युवा नेताओं के बीच राजनीतिक खींचतान जारी है। राजस्थान में अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट, एमपी में दिग्विजय सिंह बनाम ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिल्ली में शीला दीक्षित बनाम अजय माकन के बीच रिश्ते जगजाहिर हैं। राहुल गांधी साल 2004 से लगातार अमेठी से सांसद हैं। साल 2007 में वह कांग्रेस के महासचिव बने और 2013 में उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया। साल 2007 से हुए अब तक के लगभग सभी चुनावों में उन्होंने लगातार कई-कई दिन लंबी यात्राएं और जनसभाएं की हैं। गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनाव में भी वह एक अलग नेता के तौर पर उभरे हैं। राहुल गांधी की पढ़ाई भारत और अमेरिका में हुई है। प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के सेंट कोलम्बस स्कूल से पूरी हुई। फिर राहुल दून स्कूल पढ़ने चले गए। 1981-83 तक सुरक्षा कारणों से राहुल को घर से ही पढ़ाई करनी पड़ी। इसके बाद राहुल ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया। साल 1995 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज से एम.फिल. की उपाधि करने के बाद राहुल ने मैनेजमेंट गुरु माइकल पोर्टर की प्रबंधन परामर्श कंपनी मॉनीटर ग्रुप के साथ 3 साल तक रॉल विंसी के नाम से काम किया। इस दौरान उनकी कंपनी और सहकर्मी इस बात से पूरी तरह से अनजान थे कि वह किसके साथ काम कर रहे हैं।
सोशल मीडिया पर राहुल गांधी भले ही देर से एक्टिव हुए हैं, लेकिन अब उन्होंने मजबूती से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। राहुल गांधी मानते हैं कि शारीरिक मजूबती के लिए दिमागी मजबूती बेहद जरूरी है। टेक्नोलॉजी से लगाव रखने वाले राहुल के पास अपने पिता राजीव गांधी की तरह पायलेट का लाइसेंस हैं। इसके अलावा उन्हें तैराकी और दौड़ पसंद है। वे मेडिटेशन रोजाना करते हैं। राहुल अईकिडो में ब्लैकबेल्ट हैं। उन्होंने लंदन से ब्राजीलियन मार्शल आर्ट्स सीखा है। वह तलवारबाजी भी जानते हैं। राहुल गांधी ने अपने भाषणों में ऐसे देसी शब्दों और मुहावरों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, जो आम लोगों और गली-गली तक उनकी पहुंच को बढ़ाते हैं। अपने नए अवतार से उन्होंने खासा प्रभावित किया है, लेकिन पार्टी को नई दिशा और दृष्टिकोण देना सबसे बड़ी चुनौती है। राहुल गांधी का मुकाबला नरेंद्र मोदी जैसे हाल के दौर के उस चमत्कारी नेता है, जो जनता की नब्ज को बखूबी समझता है। यही नहीं, भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर उनके पास शासन, सत्ता और बेहतर पहुंच के संसाधन भी हैं। जाहिर है राहुल गांधी के ऊपर कांग्रेस का खोया आत्मविश्वास लौटाने के साथ-साथ जनाधार बढ़ाने की जिम्मेदारी भी है। यह अच्छी बात है कि राहुल को यह शिक्षा मां सोनिया गांधी की सियासती छतरी के नीचे हासिल हुई है। सोनिया गांधी के सामने भी कमोबेश ऐसी ही चुनौतियां थीं। पर उन्होंने वक्त के साथ अपनी उपयोगिता साबित की। राहुल के पास भी ऐसा कर दिखाने का भरपूर मौका है, अगर वह कर पाएं। हार बहुत कुछ सिखाती है, क्या पता राहुल के लिए भी यह हार अवसर में तब्दील हो जाए।
(लेखक ड्रीम प्रेस कंसल्टेंट्स लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।)

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