गुजरात चुनाव त्वरित विश्लेषण: ‘अस्मिता कार्ड’ और अमित शाह के प्रबंधन से भारी पड़ी भाजपा कांग्रेस पर

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव नतीजों ने जहां भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुकून दिया है वहीं कांग्रेस और उसके नव निर्वाचित अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इन नतीजों का असर 2018 में होने वाले कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ समेत कुल सात राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों पर भी असर पड़ेगा।Image result for नरेंद्र मोदी अमित शाह
गुजरात में जिस तरह कांग्रेस और पाटीदार आंदोलन की चुनौती के बावजूद भाजपा अपनी सरकार बचाने में अगर सफल रही तो उसकी सिर्फ दो ही वजह है- पहली नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और उनका गुजराती अस्मिता कार्ड और अमित शाह का चुनाव प्रबंधन।

मोदी के गुजराती अस्मिता के जवाब में राहुल गांधी ने गुजराती असंतोष को मुद्दा बनाया। चुनाव प्रचार और जन सभाओं में राहुल को लोगों की उत्साहजनक प्रतिक्रिया भी मिली जिसने कांग्रेस में जीत की उम्मीद पैदा की। राहुल ने सोशल मीडिया के जरिये प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछकर भाजपा को गुजरात मॉडल और विकास पर घेरने की भरपूर कोशिश की।

उसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिली। लेकिन कपिल सिब्बल, मणिशंकर अय्यर, सलमान निजामी के बयानों ने मोदी को चुनाव का एजेंडा बदलने का मौका दे दिया। मोदी ने अपने भाषणों से राहुल के गुजरात असंतोष के मुद्दे को गुजरात अस्मिता के कार्ड से पीछे छोड़ दिया। मोदी ने पाकिस्तान और अहमद पटेल का आक्रामक तरीके से ज़िक्र करके उसमें हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का तड़का लगाकर सामाजिक ध्रुवीकरण को भी धार दे दी।

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वाघेला के बाहर हो जाने का नुकसान भी कांग्रेस को उठाना पड़ा

गुजरात में कांग्रेस एक प्रभावशाली गुजराती नेता के अभाव को तो दशकों से झेल रही है। शंकर सिंह वाघेला के बाहर हो जाने का नुकसान भी कांग्रेस को उठाना पड़ा। क्योंकि मोदी के मुकाबले वाघेला ही गुजरात मे सर्वमान्य चेहरा हो सकते थे जो बढ़ती उम्र के बावजूद कार्यकर्ताओं में जोश भर सकते थे और शाह-मोदी की जोड़ी के साथ शह मात का खेल-खेल सकते थे। लेकिन कांग्रेस उन्हें संभाल नहीं पाई। कांग्रेस पूरी तरह हार्दिक अल्पेश, जिग्नेश की ताकत पर निर्भर रही।

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जिग्नेश, अल्पेश खुद अपने चुनाव में फंस कर रह गए। हार्दिक ने जरूर जमकर मेहनत की। लेकिन हार्दिक की अगुआई में पाटीदारों के खुलकर सड़क पर आने से गैर पाटीदारों को गोलबंद करने में भाजपा ने कोई कसर नहीं छोड़ी। इनमें कांग्रेस के परंपरागत समर्थक वर्ग भी थे। कांग्रेस उनको कितना अपने साथ रख पाई ये भी बड़ा सवाल है।

भाजपा गुजरात में ये संदेश देने में भी कामयाब रही कि राज्य के विकास के लिए केंद्र और प्रदेश दोनों जगह भाजपा सरकार होना जरूरी है। इससे भी भाजपा के रूठे मतदाता वापस लौटे। लेकिन अगर लोकसभा चुनावों को मानदंड माने तो उन चुनावों में भाजपा राज्य की 165 सीटों पर आगे थी जो विधानसभा चुनावों में जबरदस्त  घट गई जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने 34 चुनावी सभाएं की और बेहद भावुक भाषण दिए। इस नाते भाजपा को भी आत्ममंथन करना होगा।

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