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भारत, रूस, चीन की सराहनीय पहल

भारतीय संसद पर हमले की 16वीं बरसी पर यह देखना भला लगा कि आपसी मतभेदों को किनारे कर कुछ देर के लिए ही सही, पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के तमाम नेता शहीदों को सम्मान देने एकजुट हुए हैं। मुश्किल पलों की यह एकता लोकतंत्र को मजबूती देती है। आतंकवाद का रोग है ही ऐसा कि उससे लड़ने के लिए एक होना ही पड़ेगा। भारत में बुधवार सुबह जो एकता दिखाई दी, वही दो दिन पहले भारत, रूस और चीन के विदेशमंत्रियों की बैठक में दिखाई दी। करीब 15 साल पहले भारत, रूस और चीन ने रिक का गठन किया था, जो बाद में ब्राजील और द.अफ्रीका के जुड़नेे से ब्रिक्स बन गया। ब्रिक्स की अपनी अहमियत है, लेकिन इससे रिक की महत्ता कम नहींहोती। भारत के लिए रूस सबसे भरोसेमंद और पुराना दोस्त रहा है, उधर चीन पड़ोसी है, जिसके साथ तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद संबंध निभाने ही होंगे। बीते कुछ समय से हालांकि चीन के साथ भारत की तनातनी काफी बढ़ गई है और डोकलाम ने तो लड़ाई की तलवार ही लटका दी। इधर आर्थिक, सामरिक, कूटनीतिक कारणों से भारत का झुकाव अमेरिका की ओर बढ़ा तो उसके और रूस की मित्रता पर भी संदेह के बादल छा रहे थे। हाल के दिनों में जिस तरह से भारत ने जापान, आस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ एक चैतरफा गठबंधन बनाने पर बातचीत शुरु की है उससे भारत की स्वतंत्र विदेश नीति पर सवाल उठाये जा रहे हैं। लेकिन अमेरिका के दो विरोधी देशों चीन और रूस के साथ सालाना बैठक आयोजित कर भारत ने कूटनीतिक स्तर पर अपना संदेश दे दिया है। सोमवार को तीनों देशों के विदेश मंत्री जब एक साथ मिल बैठे, तो यही संदेश गया कि छिटपुट तनावों के बावजूद रिश्तों को आगे बढ़ाना ही समझदारी है। इस बैठक में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और चीन के विदेशमंत्री वांग यी ने यूं तो आपसी व्यापार पर चर्चा की, लेकिन इसमें एक अहम मुद्दा आतंकवाद का रहा। भारत को वैश्विक मंचों पर आतंकवाद से निपटने में रूस का साथ मिलता रहा है, लेकिन चीन ने हमेशा पाकिस्तान का साथ देखकर हमारी दुखती रग पर हाथ रखा है। जैश ए मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को चीन आतंकवादी नहीं मानता है। पिछले महीने ब्रिक्स घोषणापत्र में जैश ए मोहम्मद को आतंकी संगठनों की सूची में रखने के बावजूद चीन ने मसूद अजहर को आतंकवादी नहीं माना और यह भारत के लिए बड़ा झटका था। भारत के पिछले अनुभव यही बताते हैं कि चाहे सार्क हो या ब्रिक्स, आतंकवाद से लड़ने की बात सारे देश करते हैं, लेकिन जब उसे अमलीजामा पहनाना होता है, तो पाकिस्तान को चीन का साथ मिल जाता है। लेकिन इस बार रिक की साझा विज्ञप्ति में कहा गया है कि आतंकवाद को अंजाम देने, संगठित करने, भड़काने या समर्थन देने वालों को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। उनसे इंसाफ किया जाना चाहिए। दुनिया में आतंकवाद के कई चेहरे हैं और उन्हें गढ़नेे वाले देश कौन से हैं, यह भी अब किसी से छिपा नहीं है। पाकिस्तान का आतंकवाद से पीड़ित होने के बावजूद आतंकी संगठनों के प्रति दोहरा रवैया भी जगजाहिर है। अभी ज्यादा वक्त नहीं हुआ, जब हाफिज सईद को सबूतों के अभाव में अदालत से रिहाई मिल गई। ऐसे में रिक देशों का आतंकवाद से लडने के लिए साझा बयान जारी करना, उम्मीद बंधाता है कि आतंकवाद के लिए वैश्विक ताकतें एक होंगी। फिलहाल सबकी निगाहें चीन पर रहेंगी, क्योंकि वह पाकिस्तान का सामरिक मददगार रहा है। अगर वह चाहेगा तो पाकिस्तान में पनपते आतंकी संगठनों को घुटने टेकने पड़ेंगे। जहां तक सवाल रिक, ब्रिक्स, सार्क या जी 20 जैसे वैश्विक मंचों की उपयोगिता का है, तो एक बात तय है कि दुनिया में सभी देशों के हित एक-दूसरे से जुड़े हैं, चाहे विश्व शांति का सवाल हो, या आतंकवाद के खात्मे का या आर्थिक विकास का, साथ मिलने से ही आगे बढ़ा जा सकता है। भारत, रूस और चीन की इस दिशा में पहल सराहनीय है।

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