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वनवासी कल्याण आश्रम: आरएसएस की एक सेवा प्रकल्प

डा.राधेश्याम द्विवेदी

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संघ का परोपकारी सेवा प्रकल्प :- 1925 में दशहरे के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। इसे लोग सांप्रदायिक हिंदूवादी, फासीवादी और इसी तरह के अन्य शब्दों से पुकारते रहे हैं। इस तरह का आलोचना सहते और सुनते हुए भी संघ 92 साल हो गये हैं। बिना किसी आधार के दुनिया में शायद ही किसी संगठन की इतनी आलोचना की गई होगी। स्वतंत्र भारत में आरएसएस ही ऐसा संगठन है जो इतने दुष्प्रचार और हमलों के बावजूद निरंतर राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगा हुआ है। वर्षो से राष्ट्र के नाम जीवन अर्पण कर कार्य करने वाले राष्ट्र भक्तो का सही मूल्यांकन न करके उल्टे उन्हे विघटनकारी ताकते ठहरा दिया जाता है। आरएसएस एक ऐसा महासागर है जिसके अन्दर शिव जैसी सभी आरोप तथा दुष्प्रचार का जहर निगल सकने की क्षमता है।

राष्ट्रीय सेवा भारती की सह संस्था : – राष्ट्रीय सेवा भारतीे द्वारा देशभर में चलाये जा रहे सेवा कार्यों का एक संख्यात्मक आलेख तथा उल्लेखनीय आयामों का शब्दचित्र पुणे स्थित सेवा वर्धिनी के सहयोग से 1995 में प्रथम बार एक देशव्यापी सर्वेक्षण के आधार पर प्रस्तुत किया गया था। उसके बाद 1997,2004, और अभी 2009 में प्रकाशित ‘सेवा दिशा’, देशभर में फैल रहे सेवाकार्यों की वृद्धि को नापने का एक अद्भुत प्रयास रहा है। राष्ट्रीय सेवा भारती के साथ-साथ वनवासी कल्याण आश्रम, विश्व हिन्दु परिषद, भारत विकास परिषद, राष्ट्र सेविका समिति, विद्या भारती, दीनदयाल शोध संस्थान, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद आदि संगठनों के द्वारा प्रेरित अलग-अलग सेवा संस्थाओं के सेवा कार्यों को भी इस में संकलित किया जाता है। भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना इसी क्रम का परिणाम है। 1971 में ओडिशा में आए भयंकर चंक्रवात से लेकर भोपाल की गैस त्रासदी तक, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों से लेकर गुजरात के भूकंप, सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा तक – संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया है. भारत में ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका और सुमात्रा तक में अपने सेवा प्रकल्पों से मानव मात्र की सहायता किया है।

वनवासी का अभिप्राय :- उस वनवासी से नहीं है जो मर्यादा पुरुषोत्तम राम की भाँति वन में वास करने के लिए चला जाता है अथवा अपना घर बार छोड़कर संन्यास ग्रहण कर वनों में जाकर तपस्या करता है।‘वनवासी’ ऐसी वन्य जाति की कहानी है जो आदिकाल से वनों में वास करते आ रहे हैं। उनके अपने रीति-रिवाज हैं, परम्परायें हैं। वे बड़े ही सरल चित्त प्राणी हैं। जिस काल की यह कहानी है उस काल में उनमें इतना अन्तर अवश्य आ गया था कि अपनी उपज को वे निकट के नगरों और उपनगरों में ले जाकर बेचने लगे थे। इससे वे अपनी उन आवश्यकताओं की पूर्ति करने लगे थे जो शहरी सभ्यता के सम्पर्क में आकर उन्होंने अपना ली थी।

अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम का गठन :- आजीवन वनवासी बांधवों की सेवा करनेवाले ‘ठक्कर बाप्पा’ का सन 1950 में निधन हो गया। इससे वनवासी क्षेत्र में बहुत बड़ा खालीपन निर्माण हुआ था। उसका फायदा विदेशी धर्मसंस्थाएँ उठाना चाह रही थीं। गुरुजी ने इस विषय पर विचारमंथन कर, वनवासी क्षेत्र में काम करने के लिए स्वयंसेवकों को भेजने का निर्णय लिया। महाराष्ट्र के स्वयंसेवक ‘रमाकांत केशव देशपांडे’ यानी ‘बाळासाहब देशपांडे को विद्यमान छत्तीसगढ़ में रहनेवाले जशपूर के वनवासी क्षेत्र में काम करने के निर्देश गुरुजी ने दिये। बाळासाहेब देशपांडे एडवोकेट थे। ‘वकालत जारी रखकर, वनवासी बांधवों की सेवा का भी कार्य करो’ ऐसा मार्गदर्शन श्रीगुरुजी ने किया था। ‘प्रचारक रहनेवाले मोरुभाऊ केतकर को गुरुजी ने बाळासाहब की सहायता के लिए भेज दिया। जशपूर जाकर बाळासाहब देशपांडे ने वहाँ की सारी परिस्थिति जान ली। जशपूर के राजा श्री विजयभूषण सिंह से मुलाकात कर बाळासाहब ने अपने कार्य की रूपरेखा प्रस्तुत की। उसे सुनकर विजयभूषण सिंह इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना पुराना राजमहल इस सत्कार्य के लिए दे दिया। इस राजमहल के सामने बहुत बड़ा मैदान था। यहीं पर 26  दिसम्बर 1952  को ‘वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की गयी। संयोगवश् यह बाळासाहब देशपांडे का जन्मदिन भी था। राजा श्री विजयभूषण सिंह ने ‘वनवासी कल्याण आश्रम को 125 एकड़ जमीन दान की। सत्कार्य हेतु मिलीं बातों का यदि यथोचित विनियोग नहीं हुआ, तो चाहें कितनी भी बड़ीं बातें क्यों न मिलीं हों, उसका उपयोग नहीं होता। इसीलिए बाळासाहब देशपांडे और मोरूभाऊ केतकर ने इस भूमि पर ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के विभिन्न प्रकल्प शुरू किये। इन वनवासी बांधवों के पास अनेक विधि की कलाएँ थीं। कुछ लोग मिट्टी के बेहतरीन बर्तन बनाया करते थे। कुछ लोग बढ़िया चित्रकार थे। यदि अवसर मिला और मार्गदर्शन प्राप्त हो सका, तो ये वनवासी बांधव आसानी से अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं, इस बात का यकीन बाळासाहब को हो गया। उन्होंने उस दिशा में प्रयास शुरू किये।

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कल्याण आश्रम की प्रमुख गतिविधियां :- भारत के वनो मे बसने वाले 8 करोड वनवासियों के सर्वांगीण विकास हेतु कार्य में संलग्न संस्था है। आश्रम वनवासियों के विकास के लिये सुदूर जनजातीय गांवों के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिये तरह-तरह के कार्यक्रम चलाता रहता है। पूरे भारत में इसकी शाखाएँ हैं। इसका मुख्यालय जमशेदपुर (झारखण्ड में है। इसका ध्येयवाक्य है – ‘नगरवासी, ग्रामवासी, वनवासी  हम सभी हैं भारतवासी‘ वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना सन् 1952 में बालासाहेब देशपाण्डे ने की थी। जिसका कार्य छत्तीसगढ़ के जशपुर नगर में स्व. बाला साहब देशपांडे ने 1952 में एक आवासीय विद्यालय से प्रारम्भ किया था। 1952 से 1977 तक यह कार्य जशपुर तक ही सीमित था। 1977 में कल्याण आश्रम की रजत जयंती मनाई गई थी। इसके बाद कल्याण आश्रम को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया गया। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार छात्रावास, विद्यालय, बालवाड़ी आदि प्रकल्प प्रारम्भ किए गए। 1978 से लेकर 2003 तक कार्य का इतना विस्तार हुआ है कि आज लक्षद्वीप और गोवा को छोड़कर देश के सभी जनजातीय बहुल प्रांतों में कार्य पहुंच गया है। कुल 1,43,358 वनवासी गांवों में से आज 37,710 गांव कल्याण आश्रम के सम्पर्क में हैं। 10,057 गांवों में समितियां बनी हुई हैं। कुल 1,206 पूर्णकालिक कार्यकर्ता (प्रचारक) इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, जिनमें से 700 कार्यकर्ता जनजातीय समाज के हैं। देशभर में 8,292 गांवों में सेवा व संस्कार के 10,991 प्रकल्प चलाए जा रहे हैं। यह सारा कार्य आर्थिक दृष्टि से समाज पर आधारित है अर्थात् समाज ही इन प्रकल्पों का आर्थिक व्यय वहन करता है। इस प्रकार इन 25 वर्षों में कार्य देशभर में फैला है। कल्याण आश्रम का कार्य वनवासी समाज की अस्मिता-जागरण के लिए प्रारम्भ हुआ था। उनमें स्वधर्म के प्रति स्वाभिमान का भाव जाग्रत हो और उनकी परम्परा व विश्वास के भारतीय संस्कृति के साथ एकरूप होने और राष्ट्र के साथ एकात्मता का उन्हें अनुभव हो, यह भी कल्याण आश्रम का उद्देश्य है। नगरवासियों और वनवासियों के बीच समरसता भी इसका उद्देश्य है।

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वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना होकर 65 साल की कालावधि बीत चुकी है। इस कालखंड में आश्रम के काम ने बहुत तेज रफ्तार पकड़ ली। आज ‘वनवासी कल्याण आश्रम’का कार्य देश के विभिन्न राज्यों में शुरू है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का चरमसीमा का विरोध करनेवाले भी, संघ के द्वारा ही स्थापन किये गये ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के कार्य की दाद देते हैं। ईशान्य इलाके के राज्यों में ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के कई छात्रालय हैं। यहाँ पर छात्रों को विनाशुल्क रखा जाता है। झारखंड, छत्तीसगड, मध्य प्रदेश, बिहार इन राज्यों में माओवादियों के कारनामें शुरू हैं, ऐसा हम सुनते हैं। लेकिन  इन राज्यों में ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ का कार्य शुरू है। उसे उत्तम प्रतिसाद मिल रहा है।

हॉस्टेलों का खोला जाना :- वनवासी छात्रों के लिए हॉस्टेल की जरूरत थी। उनके लिए छात्रवास का निर्माण किया गया। शुरू शुरू में केवल 13 छात्र आए। लेकिन धीरे धीरे छात्रों की संख्या बढ़ती गयी। इन छात्रों का विभिन्न स्कूलों में दाखिला कराने का काम ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के द्वारा किया जाने लगा। वनवासी क्षेत्र के वीरपुरुषों की कथाएँ बताकर वनवासी बांधवों में स्वाभिमान एवं आत्मविश्वा्स जागृत करने का महत्त्वपूर्ण कार्य हाथ में लिया गया। ‘सह्याद्री का शेर’ के नाम से जाने जानेवाले ‘राघोजी भांग्रे, नाग्या कातकरी, बिरसा मुंडा, गोंड रानी दुर्गावती, भागोजी नाईक इनके साथ साथ, वनक्षेत्र में औषधियों पर अनुसंधान करनेवाले आवारे गुरुजी इन सबकी जानकारी वनवासी क्षेत्र के बांधवों को आग्रहपूर्वक दी जाने लगी। स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता, व्यसनमुक्ति, शिक्षा का महत्त्व ये सारीं बातें वनवासी बांधवों में अंकुरित होने लगीं। पढ़ाई करनेवालें वनवासी क्षेत्र के बच्चें अपने माँबाप की गलत रहनेवाली बातों का विरोध करने लगे।

श्री हरी सत्संग समिति का गठन- रामायण, महाभारत ये हमारे देश के महाकाव्य हैं। उनकी जानकारी वनवासी क्षेत्र के लोगों तक पहुँच पायें, इसके लिए उन महाकाव्यों को उन्हीं की भाषा में उनतक पहुँचाना जरूरी था। इस हेतु ‘श्री हरी सत्संग समिति’ की स्थापना की गयी। इसके जरिये वनवासी क्षेत्र के कथाकारों का निर्माण होने लगा। जनजागरण के लिए, राष्ट्रभावना को जगाने के लिए इसका बहुत बड़ा लाभ हुआ। पाँच साल पहले ‘श्री हरी सत्संग समिति’  ने मुंबई में ‘वनवासी कुंभ’ आयोजित किया था। उसमें दस हजार वनवासी बांधव उपस्थित थे।

आगरा महानगर शाखा का वार्षिक उत्सव 17 दिसम्बर को:- वनवासी कल्याण आश्रम का वार्षिक उत्सव 17 दिसम्बर 2017 दिन रविवार को सायं 4 बजे, स्थान सूरसदन प्रेक्षागृह में होना है । वार्षिक उत्सव के कार्ड का विमोचन दिनांक 13 दिसम्बर 2017 को नवीन मंघरानी बालिका वनवासी छात्रावास, सुल्तान गंज की पुलिया के पास हुआ। वनवासी कल्याण आश्रम के आगरा महानगर शाखा के प्रतिनिधि श्री अजय अवस्थी की सूचनानुसार आगरा महानगर शाखा वर्ष 2017 का वार्षिकोत्सव कार्यक्रम की अध्यक्षता समाजसेवी श्री पूरन डाबर, मुख्य अतिथि डा. नवीन बलूनी, विशेष अतिथि डा. रवि सब्बरवाल व श्री मती नीलम सिंह, विशेष सानिध्य श्री अतुल कृष्ण भारद्वाज, मुख्य वक्ता प्रमोद पेटकर होंगे। आश्रम के बच्चे सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत करेंगे। कार्यक्रम के अन्त में प्रसाद स्वरुप प्रीतिभोज का भी आयोजन किया गया है।

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