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बदली कार्य संस्कृति से लड़ाई में लौटी कांग्रेस

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे जो भी हों लेकिन कांग्रेस हर राज्य में लड़ती हुई दिख रही है। इससे पहले गुजरात और कर्नाटक के चुनाव में भी कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी। जबकि साढ़े चार साल पहले हुए लोकसभा चुनाव की 543 सीटों में से उसे 499 पर हार का सामना करना पड़ा था। इसकी वजह कांग्रेस पार्टी में हुआ नेतृत्व परिवर्तन ही नहीं बल्कि समूची कार्य संस्कृति में आया आमूलचूल बदलाव है।

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी में युवा नेताओं को ज्यादा जिम्मेदारियां तो दी हीं हैं लेकिन उससे भी ज्यादा फर्क पड़ा पार्टी के नेताओं की उन तक सीधी पहुंच बनने से। बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पार्टी के आम कार्यकर्ता तो दूर वरिष्ठ नेताओं को भी सुलभ नहीं थीं।

उनके पास तक अपनी बात पहुंचाने के लिए या तो उनसे मुलाकात का समय लेना होता था, जो कि अत्यंत कठिन था या फिर उनके आसपास रहने वाले लोगों को जरिया बनाया जाता था। लेकिन राहुल ने मोबाइल के बेहतर इस्तेमाल से यह दूरी खत्म कर दी है। वे भले ही फोन पर सभी से बात न कर पाएं लेकिन जरूरी सूचनाओं को मैसेज या व्हाट्सएप के जरिए पढ़ते और जवाब देते हैं।

वह दूसरा बड़ा बदलाव युवा नेताओं की बड़ी फौज खड़ी कर और उसे जिम्मेदारियां देकर लाए। हर राज्य के प्रभारी के साथ चार-चार राष्ट्रीय सचिवों को भी चुनाव की जिम्मेदारी दी है। ये लोग स्थानीय संगठन के काम में दखलंदाजी करने के बजाए सिर्फ जरूरी जानकारी एकत्र कर रहे हैं। उनकी जिम्मेदारी चुनाव की जमीनी हकीकत की जानकारी राहुल तक सीधे भेजने की है।

इसमें चुनावी मुद्दे, जातीय समीकरण, विपक्ष की सीटवार रणनीति, चुनाव के नारे और मीडिया प्रबंधन से लेकर संसाधनों की उपलब्धता जैसे विषय शामिल हैं। इन सचिवों और प्रभारियों की रिपोर्ट के आधार पर राहुल ने हस्तक्षेप कर अंतिम समय पर कई टिकट बदलवा दिए। पार्टी का फोकस कुछ अप्रासंगिक मुद्दों से हटाकर ज्वलंत मुद्दों पर लाए।

ऐसे लिए बड़े फैसले

छत्तीसगढ़ में पार्टी के वरिष्ठ नेता भूपेश बघेल और केंद्रीय प्रभारी पीएल पुनिया के बीच कुछ उम्मीदवारों के नाम पर मतभेद होने पर राहुल ने खुद बीचबचाव कर अंतिम फैसला किया। उनके फैसले में बड़ी भूमिका इन सचिवों से प्राप्त जानकारी की थी।

इसी तरह राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट को चुनाव लड़ाने के फैसले में भी सचिवों की रिपोर्ट काम आई। जानकार सूत्रों के अनुसार, मध्य प्रदेश चुनाव में दिग्विजय सिंह की भूमिका निर्धारित करने में भी सचिवों का खास रोल था।

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