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पांच साल से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है मसला

देश की प्रीमियम जांच एजेंसी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की कानूनी वैधता पर पहली बार सवाल नहीं उठे हैं। उच्चपदस्थ सरकारी सूत्रों ने अमर उजाला को बताया कि डीएसपीई के तहत सीबीआई के गठन और कामकाज पर पहले भी कई बार केंद्र सरकार को बचाव करना पड़ चुका है। गुवाहाटी हाईकोर्ट तो 7 नवंबर 2013 को अपने एक फैसले में सीबीआई के गठन और इसके कामकाज को ही असंवैधानिक करार दे चुका है।
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हालांकि सीबीआई का कहना है कि इस मामले का आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के उस फैसले से कोई संबंध नहीं है, जिसमें एजेंसी को आंध्र प्रदेश में बिना अनुमति के कोई कामकाज करने से रोका गया है। हालांकि नायडू ने भी दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैबलिस्मेंट एक्ट (डीएसपीई) के प्रावधानों के तहत ही यह अधिसूचना जारी की है, जिसके तहत सीबीआई का गठन हुआ था।

यह कहा था गुवाहाटी हाईकोर्ट ने

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता नवेन्द्र कुमार के रिट याचिका पर सुनवाई के बाद सीबीआई के गठन को असंवैधानिक बताया था। अने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा था कि अदालत 1 अप्रैल 1963 के उस प्रस्ताव को खारिज करती है, जिसके तहत सीबीआई का गठन किया गया था। सीबीआई डीएसपीई का हिस्सा या अंग नहीं है।

सीबीआई को किसी भी लिहाज से डीएसपीई एक्ट 1946 के तहत पुलिस संस्था नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि सीबीआई के गठन को लेकर गृहमंत्रालय का प्रस्ताव न तो कैबिनेट का फैसला है और न ही राष्ट्रपति के कार्यकारी आदेश का हिस्सा। यह एक विभागीय आदेश है, जिसे कानून नहीं माना जा सकता।

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गुवाहाटी हाईकोर्ट के सनसनीखेज फैसले के खिलाफ दो दिन बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी। केंद्र की अपील पर तत्कालीन चीफ जस्टिस ने अपने निवास पर ही सुनवाई की थी और हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी। पिछले पांच साल से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
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