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राजस्थान में चुनाव की घोषणा के साथ सक्रिय दलित संगठन ने ‘दलित घोषणा-पत्र’ किया जारी

 राजस्थान में चुनाव की घोषणा के साथ हीं राज्य में सक्रिय दलित संगठन अपनी अनेक मांगों के साथ राज्य के सियासी दलों के पास पहुंचने जा रहे हैं गुरुवार को दलित संगठनों ने समाज के इस वंचित समुदाय से जुड़े मुद्दों को लेकर एक ‘दलित घोषणा-पत्र’ को मीडिया के समक्ष जयपुर में जारी किया है इस मांग-पत्र को वे राज्य की सियासत में सक्रिय सारे दलों को भेजकर अपनी चुनावी घोषणा-पत्र में शामिल करनें को कहेंगे

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10 पेज की इस घोषणा-पत्र को अखिल इंडियन दलित महिला अधिकार मंच ने तैयार किया है इस घोषणा लेटर में दलित उत्थान  सरोकार से जुड़े सारे मुद्दों को शामिल किया गया है दलितों से जुड़े सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक ,शैक्षणिक मुद्दों को लेकर तैयार किए गए इस मांग-पत्र के माध्यम से दलित समाज से जुड़े मुद्दे पर राजनीतिक दलों को अपना दृष्टिकोण भी बताना पड़ेगा

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फिलहाल चुनाव के पहले जारी इस दलित घोषणा लेटर के माध्यम से समाज के दलित समुदाय के अतिरिक्त घूमंतु समुदाय,आदिवासी  स्त्रियों के अधिकार से जुड़े मांगों को भी शामिल किया गया है इस घोषणा लेटर में छुआछुत को समाप्त करना, एससी -एसटी एक्ट 1989 को पूरी तरह लागू करना, मैला उठाने के कार्य में लगे सफाईकर्मियों का पुर्नवास, डायन-प्रथा के विरूद्ध सशक्त कानून दलित समुदाय के लोगों को मुफ्त एजुकेशन देने जैसे मुद्दों को शामिल किया गया है

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दलित महिला अधिकार मंच की राजस्थान की समन्वयक सुमन देवथिया के अनुसार, ‘ इस बार सत्ता में आने वाला दल गवर्नमेंट बनने के बाद उत्पीड़न के शिकार दलितों को आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराए साथ हीं राजस्थान के जिन भागों से इस तरह के ज्यादातर मामलें सामने आते हैं, उन इलाकों को संवेदनशील घोषित किया जाए ‘

देवथिया का यह भी कहना है कि, ‘सिर पर मैला ढोने की प्रथा को स्थायी रूप से खत्म किया जाना चाहिए  इस कार्य में लगे सफाईकर्मियों का पुनर्वास भी किया जाना चाहिए वहीं उनके पुर्नवास के लिए गवर्नमेंट को आर्थिक सहायता के साथ स्थायी जॉब भी देनी चाहिए ‘

दलित समुदाय के इस घोषणा-पत्र में दलितों के लिए लागू राजस्थान सिलिंग एक्ट के तहत दलित समुदाय के लोगों को जमीन के समान वितरण की भी मांग की गई है इसके अतिरिक्त दलित संगठनों ने राजनीतिक दलों से अनारक्षित सीटों पर दलित स्त्रियों को चुनाव में टिकट देने की भी मांग की है

वैसे राज्य की आबादी में 17 फीसदी वाले सुप्रीम कोर्ट समुदाय को आए दिन जातिगत उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है राजस्थान में 5 दलितों की डांगावास कांड में हुई हत्या, राज्य के कई इलाको में ऊंची जाति के लोगों का दलितों को विवाह के वक्त घोड़ी पर ना चढ़ने देना जैसी घटनाएं सामने आती हो लेकिन दलितों के साथ होने वाले अत्याचार के मामले,अब तक राजस्थान की पॉलिटिक्स में चुनावी मुद्दा बन कर नहीं उभर सकी हैं

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