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फेसबुक पर 3 करोड़ मरे हुए लोगों से हम क्यों कर रहे हैं बातें?

फेसबुक पर आप भी एक्टिव होंगे। आए दिन आप नए-नए फ्रेंड भी बना रहे होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं इस समय फेसबुक पर 30 मिलियन ऐसे लोगों की प्रोफाइल है जो मर चुके हैं। गौर करने वाली बात यह है कि फेसबुक पर प्रत्येक दिन मरे हुए लोगों की प्रोफाइल की संख्या में 8,000 की वृद्धि हो रही है। इस तरह आंकड़ों की बात करें तो साल 2060 तक फेसबुक पर मरे हुए लोगों की संख्या जिंदा लोगों की संख्या से ज्यादा हो जाएगी। ऐसे में आने वाले समय में फेसबुक किसी कब्रिस्तान से कम नहीं होगा।

ऐसे में हम एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं जहां हम मृतकों से बातचीत कर रहे हैं। इसे एक घटना के जरिए समझने की कोशिश करें तो पिछले महीने ही साहित्य का नोबल पुरस्कार जीतने वाले भारतीय मूल के प्रसिद्ध लेखक वीएस नायपॉल का निधन हो गया और इसी महीने यानि सितंबर में ही अमेरिकन सिंगर अरेथा फ्रैंकलिन का 76 साल की उम्र में निधन हो गया। इन दोनों हस्तियों के निधन के बाद सैकड़ों लेखकों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने अपने-अपने तरीके से अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल पर दुःख जाहिर किया। यहां एक सार्वजनिक बदलाव साफ-साफ नजर आ रहा है कि हम मरे हुए लोगों से बात करने की प्रथा की ओर फिर से बढ़ रहे हैं।

मनोवैज्ञानिक जूलियन जेंस के मुताबिक भगवान की पहली अवधारणा तब उत्पन्न हुई जब प्राचीन काल में लोगों ने एक राजा और रानी की लाशों की पूजा करनी शुरू कर दी। बाद में राजा को उनकी झोपड़ी में दफना दिया गया था। इसके बाद किसी दिन किसी ने उस राजा की आवाज सुनी जिसमें वे कोई आदेश दे रहे थे। इसके बाद से ही मरे हुए लोगों की पूजा शुरू हो गई। दरअसल सभी धर्मों के लोग अपने-अपने तरीके से मरे हुए लोगों से बातें कर रहे हैं। यह एक तरह से मरे हुए लोगों के प्रति प्यार व्यक्त करने या फिर उनके जाने के नुकसान को स्वीकार करने जैसा है।

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इस तरह से हम एक नए बदलाव की ओर बढ़ रहे हैं और इस बदलाव के साथ हम उन लोगों से बातें कर रहे हैं जो अब इस धरती पर हैं ही नहीं। ऐसा ही कुछ द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुआ था जब यूरोपभर के कुछ आध्यात्मिक ने दावा किया था कि उन्होंने रेडियो तरंगों के जरिए मृतकों की “मनोवैज्ञानिक” आवाजें सुनी हैं।

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ऐसे में यह कहा जा सकता है कि इंटरनेट भी एक तरह से कोई मंदिर या धार्मिक स्थल बनता जा रहा है जहां हम अपने चाहने वालों से बात करें रहे हैं। वैसे तो अभी तक धर्म किताबों तक सिमटा हुआ है लेकिन जल्द ही यह डिजिटल होने वाला है और ऐसे में इंटरनेट ही एक धर्म के रूप में विकसित हो सकता है और ऐसा भी संभव है कि इंटरनेट को ही लोग मोक्ष समझ बैठें।

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