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इस मामले में भारतीय स्वास्थ्य बीमा कंपनियां सबसे आगे

देश में निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य बीमा कंपनियों से दावे का भुगतान निकलवाना उपभोक्ता के लिए किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं। यह कंपनियां इस मामले में नीतिगत खामियों का सबसे ज्यादा फायदा उठा रही हैं। राष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त एवं नीति संस्थान (एनआईपीएफपी) के भारतीय स्वास्थ्य बीमा पर किए गए अध्ययन फेयर प्ले में यह सामने आया है।

अध्ययनकर्ता शेफाली मल्होत्रा के मुताबिक सरकार 10 करोड़ गरीब परिवारों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना आयुष्मान भारत शुरू करने जा रही है। इसमें पूरी कैशलेस व्यवस्था है और भुगतान की जिम्मेदारी कंपनी या ट्रस्ट पर होगी। जबकि व्यक्तिगत या परिवार के लिए बीमा लेने वालों के सामने सबसे बड़ी परेशानी उस समय आती है जब गैरसूचीबद्ध अस्पताल में लोग इलाज कराते हैं, क्योंकि ऐसे में स्वास्थ्य बीमा कंपनियां उन्हें भुगतान करने में आनाकानी करती हैं।

शेफाली के मुताबिक अध्ययन में दुनिया के कई देशों की स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र की नीति और व्यवस्था पर गौर किया गया। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य की तुलना में भारत में दावों को लेकर स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र में शिकायतों की दर उच्चतम है। यह उत्पाद और सेवाओं की खराब गुणवत्ता को लेकर हैं।

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शेफाली का कहना है कि कंपनियां बीमा की बिक्त्रस्ी के दौरान सबसे बेहतर सेवाएं देने का दावा करती हैं, लेकिन बाद में दावों में खामियां निकालकर उन्हें अस्वीकार करती हैं। अध्ययन में यह निष्कर्ष सामने आया कि स्वास्थ्य बीमा के मामले में उपभोक्ता संरक्षण का स्तर बहुत खराब है। शेफाली के मुताबिक निजी कंपनियों के खिलाफ दावे का भुगतान करने पर उपभोक्ता फोरम द्वारा लगाए गए जुर्माने भी समुचित नहीं होते। ऐसे में स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र में सरकार को दावों के निपटारे और देरी को लेकर सख्त नीति तैयार करनी चाहिए।

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अध्ययन के मुताबिक स्वास्थ्य बीमा दावों का अनुपात या कुल प्रीमियम की तुलना में दावों के निपटारे का प्रतिशत लगातार गिर रहा है। उपभोक्ता संरक्षण के मद्देनजर यह चिंता का विषय है कि निजी स्वास्थ्य बीमा कंपनियों दावे के निपटारे में बचने के हथकंडे इस्तेमाल कर रही हैं। यही वजह है कि 2013 से 2016 के बीच दावों का निपटारा 67 से 58 प्रतिशत पर पहुंच गया है।

वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो अमेरिका में निजी कंपनियों के लिए दावों का भुगतान करना अनिवार्य है। अगर दावों का अनुपात न्यूनतम स्तर से कम है, जबकि भारत में ऐसा कोई प्रावधान मौजूद नहीं है। अमेरिका के कई राज्यों में न्यूनतम दावा अनुपात विस्तार 65 से 80 प्रतिशत है। दावों के निपटारे इसके नीचे रहने पर बीमा कंपनियों को उपभोक्ता के प्रीमियम का पैसा लौटाना पड़ता है।

अध्ययनकर्ता शेफाली ने बताया कि हमने यह भी पाया कि सरकार द्वारा समर्थित बीमा कंपनियों का दावा अनुपात लगातार बढ़ा है। यह 2013-14 में 106 प्रतिशत था जो 2015-16 में बढ़कर 117 प्रतिशत हो गया। जिसकी पूर्ति यह कंपनियां अपने अन्य व्यवसाय से करती हैं, अन्यथा कई दिवालिया होने की कगार पर हैं।

अध्ययन में पाया गया कि निजी बीमा कंपनियां एजेंट कमीशन का भुगतान करने के लिए उपभोक्ताओं द्वारा भुगतान किए गए प्रीमियम का एक बड़ा भाग (2013-14 में 10 से 12 प्रतिशत तक) खर्च किया, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने 2013 में केवल 6.8 प्रतिशत का उपयोग किया।

कर्मचारियों के संरक्षण के लिए मुहैया कराए जाने वाले स्वास्थ्य बीमा देश की 4 प्रतिशत आबादी कवर है जबकि व्यक्तिगत स्तर पर 2 प्रतिशत से अधिक कवर की गई है। इसकी तुलना में सरकार द्वारा वित्त पोषित स्वास्थ्य बीमा योजना जीएफएचआईएस ने 2013-14 में 12 प्रतिशत और 2015-16 में 20 प्रतिशत से ज्यादा आबादी को कवर किया। आयुष्मान भारत इसका बड़ा रूप है जो गरीबों को निजी अस्पतालों में स्वास्थ्य बीमा का उपयोग करने में सक्षम बनाएगा।

शेफाली ने अध्ययन में पाया कि निजी कंपनी की तुलना में राज्य वित्त पोषित व्यक्तिगत बीमा दावों के निपटारे के मामले में बेहतर है। साथ ही यह देखा गया कि निजी कंपनियां उपभोक्ता की शिकायत दूर करने में विफल रही। ऐसे में देश में बड़े पैमाने पर मौजूद इन कंपनियों की गुणवत्ता और सेवाओं पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

कई देशों में स्वास्थ्य बीमा में सिर्फ अस्पताल में भर्ती होना ही नहीं, बल्कि क्लीनिकल विजिट, मेडिकेशन समेत अन्य कल्याणकारी देखभाल भी शामिल हैं। इन स्थितियों में ग्राहक असंतोष की संभावनाएं अधिक रहती हैं। इसके बावजूद देश में स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के खिलाफ शिकायत की दर बहुत अधिक है। नियमों की कमी की वजह से इस क्षेत्र में उचित प्रक्त्रिस्या नहीं है। अध्ययन में यह दर्ज किया गया है कि उपभोक्ता कष्ट निवारण दोषपूर्ण संस्थागत प्रारूप और कमजोर प्रवर्तन की वजह से नहीं है।

बीमा कंपनियां वैध दावों को खारिज कर देती हैं जब तक कि वह विवाद निपटारा तंत्र, जैसे ओम्बुड्समैन और उपभोक्ता फोरम में मामला हार नहीं जाएं। वैध दावों को खारिज करने को लेकर मौजदा नियमों में जुर्माने का कोई प्रावधन नहीं है, भले ही दावा अस्वीकार करने से नियमों का उल्लंघन हो रहा हो।

ऐसे कई मामले हैं जिनमें निपटारा प्रक्त्रिस्या के एक साल बाद बीमा कंपनियों ने बीमित राशि और वाद में खर्च हुई रकम तथा उत्पीड़न का मुआवजा दिया है। आमतौर पर उपभोक्ता द्वारा किए गए दावा और वक्त की कीमत से कम जुर्माना कंपनियों पर लगता है। इसके अलावा बीमा कंपनियों द्वारा खारिज किए गए दावे को पाने का और कोई सरल रास्ता नहीं है।

मंत्रालय विस्तृत जानकारी के बाद ही करेगा पक्ष स्पष्ट

वित्त मंत्रालय के महानिदेशक डीएस मलिक ने कहा कि स्वास्थ्य बीमा पर आए इस अध्ययन पर विस्तृत जानकारी मंगायी जा रही है। इसके बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी कि हकीकत क्या है। दूसरी ओर इरडा ने इस मामले में कोई भी जवाब देने से साफ इंकार किया।

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