Tuesday , October 16 2018
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2022 तक पूरे देश में लागू होगा शून्य लागत खेती का मॉडल

पद्मश्री सुभाष पालेकर ने कहा कि प्रधानमंत्री किसानों की आय दोगुनी करने की बात कर रहे हैं, लेकिन रासायनिक खादों से होने वाली खेती व जैविक खेती से किसान की आय बढ़ने वाली नहीं है। कृषि वैज्ञानिकों ने भी इसे स्वीकार कर लिया है।

केवल शून्य लागत प्राकृतिक खेती से ही किसान की आय दोगुनी हो सकती है। यह बात नीति आयोग को समझ में आ गई है, इसलिए उसकी सहमति के बाद पांच राज्यों ने शून्य लागत खेती करना शुरू कर दिया है। बाकी राज्यों में 2022 तक शून्य लागत खेती होनी शुरू हो जाएगी। इससे न केवल किसान की आय दोगुनी होगी, बल्कि खेतों की उर्वरा शक्ति और बेहतर होगी।

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आज शुक्रवार से शुरू हो रहे छह दिवसीय शून्य लागत प्राकृतिक कृषि प्रशिक्षण शिविर में शामिल होने आए सुभाष पालेकर ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटका, छत्तीसगढ़ और मेघालय सरकार ने अपने-अपने प्रदेश में शून्य लागत खेती करने का आदेश जारी कर दिया है।

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हिमाचल प्रदेश में देशी गायों की कमी के कारण सौराष्ट्र से पांच हजार गायें मंगवाई जा रही हैं। 2022 तक पूरे देश में शून्य लागत प्राकृतिक खेती लागू हो जाएगी। इस खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशक की बिल्कुल जरूरत नहीं पड़ती। बल्कि एक देसी गाय से 30 एकड़ तक खेती होती है। गाय का 10 किलोग्राम गोबर एक महीने के लिए एक एकड़ के लिए पर्याप्त है। अभी देश भर के 50 लाख किसान शून्य लागत खेती कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि देश में खेती करने का इतिहास दस हजार साल पुराना है। इसमें से पांच हजार साल पहले गोबर की खाद का प्रयोग नहीं होता था, बल्कि शिफ्टिंग कल्चर (एक स्थान के जंगल काटकर खेती करना फिर दूसरे स्थान के जंगल काटना) से खेती होती थी। भगवान श्रीकृष्ण ने गोबर की खाद का प्रयोग बताया था, लेकिन आज के समय में यह प्रयोग सफल नहीं है। क्योंकि, इसके लिए देश भर में 350 करोड़ देसी गायों की जरूरत पड़ेगी, जबकि देश में कुल आठ करोड़ देसी गायें हैं।

देसी गाय का कृषि में महत्व

एक ग्राम देसी गाय के गोबर में 500 करोड़ तक सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं। गाय के गोबर में गुड़ डालने से सूक्ष्म जीवाणुओं (जीवामृत) की संख्या बढ़ जाती है। जब यह जीवामृत खेत में डाला जाता है तो करोड़ों सूक्ष्म जीवाणु भूमि में उपलब्ध तत्वों से पौधों का भोजन निर्माण करते हैं। इसलिए किसी खाद या पोषक तत्व की जरूरत नहीं पड़ती है।

मैं एक नया पैसा नहीं लेता

पद्मश्री सुभाष पालेकर ने बताया कि मैं एक नया पैसा नहीं लेता हूं। नीति आयोग के समक्ष भी मैंने यह बात रख दी है। सरकार को भी इस खेती में बजट का एक नया पैसा खर्च नहीं करना है, केवल किसानों को जागरूक करने की जरूरत है।

बुंदेलखंड में दूर होगी अन्ना प्रथा

बुंदेलखंड में किसान अपनी गायों को छुट्टा छोड़ देते हैं। जब किसान शून्य लागत प्राकृतिक खेती करने लगेंगे तो छुट्टा जानवरों की समस्या स्वत: समाप्त हो जाएगी। क्योंकि, इस खेती में देसी गाय का सर्वाधिक योगदान है।

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