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तेईस सितंबर के बाद मालदीव में क्या होगा?

उत्तरप्रदेश के झांसी से भी आबादी में छोटे एक देश ने भारत की नींद उड़ाने वाली स्थिति पैदा कर दी है। मालदीव से लोकतांत्रिक हवा के झोंके फिलहाल बंद हैं। देश राष्ट्रपति यामीन की तानाशाही की अत्यंत डरावनी तस्वीर देख रहा है। वहां पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल गयूम अस्सी साल की उम्र में जेल की सलाखों के पीछे हैं। गयूम तीस साल तक राष्ट्रपति रहे हैं और यामीन के सौतेले भाई हैं।

विडंबना है कि वे ही यामीन को राजनीति में लाए थे, जिन्होंने उन्हें जेल में डाला। देश में नया संविधान लाने वाले पूर्व राष्ट्रपति नशीद 13 साल की सजा पा चुके हैं। वे इलाज के बहाने लंदन पहुंचे। वहां से श्रीलंका में शरण पाकर निर्वासित जिंदगी बिता रहे हैं। जिस दिन मालदीव पहुंचेंगे, जेल में होंगे। तीन साल से उनकी पत्नी-बेटी लंदन में निर्वासित जिंदगी बिता रही हैं। आपको याद होगा कि नशीद ने ग्लोबल वार्मिंग पर ध्यान खींचने के लिए अपनी कैबिनेट मीटिंग समुद्र के भीतर स्कूबा डाइविंग के जरिए की थी।

मालदीव के सभी एक हजार से ज्यादा दीव समुद्र से सिर्फ छह फीट ऊंचे हैं। इस नाते मालदीव का विनाश निश्चित है। कब होगा कोई नहीं जानता। एक पूर्व उपराष्ट्रपति अहमद अदीब जेल में हैं। अदालत पार्टी के प्रमुख शेख इमरान और उनके सांसद फरीस मैमून तथा नौ अन्य सांसद जेल के भीतर हैं। फरीस अब्दुल गयूम के बेटे हैं। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अब्दुल्ला सईद और एक अन्य न्यायाधीश अली हामिद जेल में हैं। दो पूर्व रक्षामंत्री, दो पुलिस प्रमुख, मुल्क के प्रोसिक्यूटर जनरल भी जेल में हैं। इनके अलावा अनगिनत सरकारी अधिकारी और राजनेता कैद में हैं।

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इन सभी पर आरोप हास्यास्पद हैं। चार्जशीट में कहा गया है कि वे आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं और राष्ट्रद्रोही गतिविधियों में संलग्न हैं। किसी पर विस्फोट का आरोप है तो किसी पर हथियार रखने का। विरोधियों को जेल में डालने से पहले यामीन ने देश में आपातकाल लगा दिया था। जेल में डालने का यह समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 23 सितंबर को वहां नए राष्ट्रपति का चुनाव होने जा रहा है। मगर इन परिस्थितियों में वहां अब लोकतांत्रिक बयार बहेगी – नामुमकिन सा है।

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मौजूदा राष्ट्रपति के इरादे पद संभालने के बाद से ही संदेहास्पद थे। पांच बरस पहले उन्होंने सत्ता संभाली थी। चूंकि नशीद और गयूम हमेशा भारत समर्थक रहे हैं इसलिए यामीन ने प्रारंभ से ही चीन समर्थक रवैया अपनाया। सत्ता संभालने के अगले साल ही उन्होंने चीन के साथ सिल्क रूट और वन बेल्ट वन रोड पर समझौता किया।

दो बरस पहले उन्होंने मालदीव का एक द्वीप पचास साल की लीज पर 40 लाख डॉलर में चीन को दे दिया था। इसके बाद चीन ने दबाव डालकर यामीन से मालदीव के संविधान में संशोधन कराया। वहां के वित्त कानून और निवेश कानून में अपने अनुकूल परिवर्तन कराए और मुक्त व्यापार संधि भी दोनों देशों के बीच हुई। इसके लिए तो संसद में चर्चा की जरूरत भी यामीन ने नहीं समझी। मेरीटाइम सिल्क रूट और वन बेल्ट वन रोड पर संधि कर ली।

चीनी राष्ट्रपति शी जिन पिंग भारत आने से पहले मालदीव और फिर श्रीलंका गए थे। ताजा स्थिति यह है कि चीन ने मालदीव को 2.5 बिलियन डॉलर का कर्ज दिया है, जो देश के कुल कर्ज का आधे से अधिक है। मालदीव को 2020 तक 750 मिलियन डॉलर चीन को चुकाना है, जो संभव नहीं। पूर्व राष्ट्रपति नशीद के मुताबिक चीन ने मालदीव में 300 मिलियन डॉलर का ठेका लिया है।

यह डेढ़ किलोमीटर लंबा पुल बनाने का है। यह काम 75 मिलियन डॉलर से अधिक नहीं है। इतनी बड़ी रकम यामीन सरकार के लिए अगला चुनाव लड़ने के लिए काफी है। नशीद कहते हैं कि एक भी गोली चलाए बिना चीन ने ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह मालदीव पर कब्जा कर लिया है। आखिर कोई एक देश दूसरे को अपनी जमीन गिरवी कैसे रख सकता है। यह मालदीव की संप्रभुता का उल्लंघन है।

हर देश की जमीन पहले गिरवी रखवाओ, उस पर कर्ज दो, भारी भरकम शर्तें लादो और न चुका पाए तो कब्जा कर लो। चीन को दरअसल कठपुतली देश चाहिए। यामीन के विरोधियों को जेल में डालने की वजहें साफ हैं कि चुनाव में यामीन अपने विरोधियों का सफाया कर देना चाहते हैं। मालदीव के मुख्य चुनाव आयुक्त अहमद शरीफ ने हालाँकि बार बार कहा है कि तेईस सितंबर को राष्ट्रपति चुनाव पारदर्शी और निष्पक्ष होंगे लेकिन उन पर कोई यकीन नहीं करता।

यामीन के खिलाफ मैदान में उतरने वाले जेल में या देश के बाहर हैं। ऐसे में उनका विरोध करने की हिम्मत कौन करेगा? इसके अलावा अहमद शरीफ मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले पहले राष्ट्रपति यामीन के चुनाव प्रचार की कमान संभाल चुके हैं। विपक्ष ने उस समय यामीन की कड़ी आलोचना की थी। आयोग ने चुनाव पर नजर रखने के लिए आठ देशों के पर्यवेक्षक, योरपीय यूनियन और इस्लामिक देशों के संगठन के प्रतिनिधि को आमंत्रित किया है। जाहिर है भारत इसमें शामिल नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकार दल को चुनाव के दौरान भेजने का प्रस्ताव मालदीव पहले ही ठुकरा चुका है।

मालदीव का घटनाक्रम आने वाले समय में भारत के लिए गंभीर चेतावनी दे रहा है। बीते दिनों बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी ने एक ट्वीट के जरिए यह कहकर बवाल खड़ा कर दिया था कि चुनाव में धांधली हो तो भारत को फौजी कार्रवाई करना चाहिए। अक्सर हमारे नेता अपने बड़बोलेपन से देश की कूटनीतिक और रणनीतिक योजनाओं पर पानी फेर देते हैं। इस ट्वीट के बाद मालदीव खफा हो गया।

उसके विदेश सचिव ने भारतीय उच्चायुक्त अखिलेश मिश्रा को बुलाकर अप्रसन्नता जताई। भारत को इस बयान से अपने आप को अलग करना पड़ा। उसने भारत से उपहार में मिले दो सैनिक हेलीकॉप्टर तत्काल वापस बुलाने का निर्देश दिया है। अब भारत बगलें झांक रहा है। एक बयान ने उसके अनेक कदमों को पीछे हटने पर बाध्य कर दिया है। मालदीव में भारतीयों की हालत बदतर हो रही है।

दो तीन साल पहले मालदीव में पीने के पानी का गंभीर संकट पैदा हो गया था। तब भारत ने वहां पेयजल की गंगा बहा दी थी। हाल ही में सुब्रमण्यन स्वामी श्रीलंका गए थे। नशीद से भी उनकी मुलाकात हुई थी। इसके अलावा वे पूर्व राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे से भी मिले थे, मगर वर्तमान राष्ट्रपति सिरिसेना से उनकी भेंट संभवतः नहीं हुई। भारतीय वैदेशिक नीति में संतुलन का बिंदु हमेशा ताकतवर रहा है। राजपक्षे तो हमेशा चीन समर्थक रहे हैं।

अलबत्ता सिरिसेना भारत के प्रति सहानुभूति रखते हैं। अब इस तरह भारत के सत्ताधारी दल के एक सांसद की मुलाकातें हों और उनका प्रचार भी हो तो किसका नुकसान होता है? नहीं भूलना चाहिए कि तीस बरस पहले श्रीलंका में सक्रिय लिट्टे की मदद से मालदीव में अब्दुल गयूम की तख्तापलट की कोशिश हुई थी।

गयूम ने भारत से मदद मांगी और केवल नौ घंटे में भारत की सेना ने ऑपरेशन कैक्टस के जरिए तख्ता पलट की साजिश नाकाम कर दी थी। तब से लेकर आज तक स्थिति एकदम बदली हुई है। हमने अपने हाथों ही मालदीव में अपनी छवि बिगाड़ ली है। आज चीन से पूछे बिना यामीन एक कदम नहीं बढ़ाते। ताजा खबरें हैं कि चीन ने अपने युद्धपोत मालदीव रवाना कर दिए हैं। उसने चेतावनी दी है कि किसी देश को मालदीव के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए।

चीन से गोपनीय समझौते के तहत पाकिस्तान के भी युद्धपोतों को मालदीव के समुद्री तटों की रक्षा का निर्देश दिया गया है। गणित यह है कि यामीन ने दस-पंद्रह सांसदों को संसद से हटा दिया है। इन सांसदों ने अदालत में हटाए जाने को चुनौती दी है। अगर सांसद बहाल हो गए तो यामीन अल्पमत में आ जाएंगे।

आज की तारीख में बहुमत यामीन के पास न के बराबर है। मालदीव की जनता के बीच वे लोकप्रिय नहीं हैं। साम, दाम, दंड, भेद चारों तरीके उन्होंने अपनाए हैं। चीन की मदद से दोबारा चुने जाएंगे, इसके आसार अधिक हैं। भारत को अब अपनी भूमिका का नए सिरे से कूटनीतिक निर्धारण करना होगा।

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