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रक्षा मंत्री सीतारमण और पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी में झूठा कौन ?

रक्षा मंत्री सीतारमण और पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी में झूठा कौन है? रक्षा मंत्री एके एंटनी की छवि एक ईमानदार नेता की रही है। एंटनी पर पूरे जीवन किसी घोटाले या हेरा फेरी का आरोप नहीं रहा है। पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी ने मंगलवार 18 सितंबर को संवाददाता सम्मेलन में एक-एक करके निर्मला सीतारमण के सभी आरोपों को खारिज कर दिया।


सीतारमण पर तथ्यों को तोड़ मरोडक़र पेश करने का आरोप लगाया। एंटनी ने यहां तक कहा कि देश की एक रक्षा मंत्री ऐसे स्तरहीन बयान आखिर कैसे दे सकती हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर देश की सुरक्षा से गंभीर खिलवाड़ करने भी आरोप लगाया है। अमर उजाला ने इस बाबत एक पड़ताल की है।

हमारी पड़ताल में पूर्व वायुसेनाध्यक्ष का स्पष्टीकरण, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और यूपीए सरकार के समय में राफेल डील पर आपत्ति उठाने वाले यशवंत सिन्हा का जवाब, पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी द्वारा बताए गए तथ्य, निर्मला सीतारमण के आरोप, सफाई, बयान शामित हैं। पेश है रिपोर्ट-

एके एंटनी द्वारा रखे गए तथ्य
1. वायुसेना को कारगिल युद्ध के बाद सन् 2000 में 126 बहुउद्देश्यीय मध्यम लड़ाकू विमानों (एमएमआरसीए) की आवश्यकता थी। यह आवश्यकता चीन और पाकिस्तान से सटे सीमा क्षेत्र में बढ़ रही चुनौतियों के कारण थी। वायुसेना की इस जरूरत के आधार पर रक्षा मंत्री की अध्यक्षता वाली रक्षा खरीद परिषद, जिसमें तीनों सेनाओं के प्रमुख, रक्षा सचिव, रक्षा उत्पादन सचिव, डीआरडीओ प्रमुख होते हैं, ने 126 एमएमआरसीए की खरीद का निर्णय लिया था।

इसी आधार पर 2007 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्ताव आमंत्रित किए गए थे। वायुसेना द्वारा परीक्षण करके दो विमानों यूरोफाइटर टाइफून और फ्रांस की डास्सो एवियेशन का राफेल उपयुक्त बताया गया था।

2012 में अंतरराष्ट्रीय निविदा को खेले जाने के बाद लाइफ साइकिल कास्ट(जीवन-चक्र वैल्यू, रख-रखाव भी शामिल), तकनीकी हस्तांतरण तथा देश में ही उत्पादन का लाइसेंस देने की शर्त के साथ राफेल एल वन(सबसे कम कीमत) रहा।

2. डास्सो एवियेशन और भारत की 74 वर्षों ने हवाई जहाज निर्माणन क्षेत्र की कंपनी एचएएल(जिसने चार हजार से अधिक लड़ाकू विमान(सुखोई, मिग-21, मिग-27 समेत अन्य), हेलीकॉप्टर आदि बनाने में भूमिका निभाई है) के बीच 2013 में सहमति बनी।

3. मेक इन इंडिया की अवधारणा यूपीए सरकार की थी। 2012 में हम इसे एमएमआरसीए के सौदे के साथ अस्तित्व में लाए थे। इस सौदे में लाइफ साइकिल कास्ट, तकनीकी हस्तांतरण, देश में ही विमान को बनाए जाने का लाइसेंस देने का प्रावधान तथा सौदे में विमान की मूल लागत का आधा भारत में ही रक्षा क्षेत्र में निवेश करने का प्रावधान शामिल था। यह होने पर एचएएल की तकनीशियनों, डिजाइनरों, विशेषज्ञों को स्टेट आफ आर्ट तकनीक सीखने का अवसर मिलता। एचएएल भी सार्वजनिक क्षेत्र की आर्थिक रूप से संपन्न कंपनी बनी रहती।

4. एचएएल ही देश की एक मात्र कंपनी है, जिसके पास विमान निर्माणन क्षेत्र में अनुभव है।

5. 126 चौथी पीढ़ी के मध्यम और बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों की आवश्कता वायुसेना की 42 स्क्वाड्रन (दस्ता) की क्षमता बनाए रखने के लिए थी और मौजूदा समय में खतरा बढ़ा है, लेकिन वायुसेना की क्षमता नहीं बढ़ पाई। यह 31 स्क्वाड्रॉन के करीब है।

6. यूपीए सरकार इस सौदे को अंतिम रूप देने के बहुत करीब थी, लेकिन हमारे पास समय नहीं था। 2014 में मोदी सरकार सत्ता में आई और हमने नूल्य निर्धारण समेत सभी शर्तों का निर्धारण करके निर्णय अगली सरकार पर छोड़ दिया था।

7. एंटनी का दावा है कि यूपीए सरकार के समय में होने वाले 126 राफेल विमान(18 विमान तैयार हालत में और 108 विमान भारत में ही डास्सो एवियेशन के सहयोग से एचएएल में बनने थे) का प्रति विमान सौदा मोदी सरकार के समय में हुए 36 राफेल लड़ाकू विमानों के सौदे से काफी सस्ता, बेहतर, देश को विमान निर्माण की तकनीक देने वाला राष्ट्रीय हित में था।
ए के एंटनी के सवाल
1. प्रधानमंत्री या कोई कौन होते हैं? वह अकेले, अपने आप रक्षामंत्री की अध्यक्षता में होने वाली रक्षा खरीद परिषद के फैसले को बिना रद्द कराए और अंतरराष्ट्रीय स्तर की निविदा के जारी रहते हुए 36 लड़ाकू विमानों को लेने का फैसला करने वाले? एके एंटनी का कहना है कि 126 लड़ाकू विमानों की जरूरत वायुसेना ने सुरक्षा संबंधी खतरों, चुनौतियों को देखते हुए बताई थी। इस पर प्रक्रिया के तहत निर्णय लिया गया था। बिना प्रक्रिया की अनुपालना किए सरकार का कोई भी व्यक्ति अकेले इस पर कोई निर्मय नहीं ले सकता। चाहे वह प्रधानमंत्री ही क्यों न हों?

2. क्या प्रधानमंत्री ने ऐसा करके 2000 में वायुसेना द्वारा बताई जरूरत को दर किनार करके देश की सुरक्षा के साथ गंभीर खिलवाड़ नहीं किया है?

3. सार्वजनिक क्षेत्र की विमान निर्माता कंपनी एचएएल को नजरअंदाज करके किस आधार पर बिल्कुल नई, निर्माण का अनुभव न रखने वाली कंपनी को इस सौदे के माध्यम से वित्तीय लाभ पहुंचाने की कोशिश क्यों हुई? क्या ऐसा करके प्रधानमंत्री ने एचएल और देश के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, डिजाइनरों आदि को ऐसे बड़े अवसर से दूर नहीं कर दिया?

4. क्या इस सौदे के माध्यम से रक्षा खरीद नीति, रक्षा खरीद परिषद, रक्षा क्षेत्र में खरीद की पारदर्शिता, देश में रक्षा खरीद के लिए बने मानदंड का सीधे उल्लंघन नहीं हुआ है?

5. प्रधानमंत्री ने किस आधार पर अपरिहार्य जरूरत बताकर 36 लड़ाकू विमानों के सौदे को आगे बढ़ाया, क्योंकि इसके तहत पहला विमान सितंबर 2018 में आया और आखिरी लड़ाकू विमान 2022 में आएगा? क्या यह सुरक्षा से समझौता नहीं है, क्योंकि 126 लड़ाकू विमानों के सौदे में हमें पहले ही विमान मिल जाते?

6. आवश्यकता नहीं थी तो रक्षा मंत्रालय ने जुलाई 2018 में 110 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों को मेक इन इंडिया के तहत अंतरराष्ट्रीय प्रस्ताव मंगाने की पहल क्यों की है। अभी इन विमानों के लिए अंतरराष्ट्रीय निविदा भी जारी नहीं हुई है, परीक्षण भी नहीं हुए हैं?

7. एंटनी ने संभावना जताते हुए कहा कि इन 110 लड़ाकू विमानों के वायुसेना को 2030 तक मिल पाने की उम्मीद है। तबतक वायुसेना के सामने मौजूद चुनौतियों का अंदाजा लगाया जा सकता है। वायुसेना ने जिन विमानों की जरूरत 2000 में बताई थी, वे 30 साल बाद यानी 2030 तक मिल पाने की संभावना है। क्या यह देश की सुरक्षा से गंभीर खिलवाड़ नहीं है?

8 एंटनी ने कहा कि सरकार जिन 36 राफेल विमानों को ले रही है उसमें तकनीकी हस्तांतरण, लाइसेंस प्रोडक्शन जैसी कोई शर्त शामिल नहीं है। फिर मेक इन इंडिया कहा गया?
एक रक्षा मंत्री ऐसा कैसे बोल सकती हैं?
1. एके एंटनी का यह गंभीर सवाल है। उन्होंने कहा कि देश की एक रक्षा मंत्री इतना गैर जिम्मेदाराना बयान कैसे दे सकती हैं। एंटनी ने कहा कि रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने मेरे द्वारा 2013 में हस्तक्षेप करने की बात कही है। एंटनी ने कहा कि उन्हें फाइल में यह तथ्य दिखाना चाहिए। एंटनी ने कहा कि सीतारमण झूठा आरोप लगा रही हैं। यह एक रक्षा मंत्री के लिए उचित नहीं है। वह तथ्यों को मरोड़ रही हैं।

2. एंटनी ने कहा कि 2013 में वित्त मंत्रालय को 126 लड़ाकू विमानों के सौदे की फाइल लाइफ साइकिल कास्ट को शामिल करके भेजी गई थी। लाइफ साइकिल कास्ट एक नई चीज थी। इसमें विमान की एक निर्धारित आयु तक उसके रख-रखाव की शर्त शामिल थी। इस पर वित्त मंत्रालय ने आपत्ति उठाई थी। भाजपा के तत्कालीन वरिष्ठ सांसद(यशवंत सिन्हा, एंटनी ने नाम नहीं लिया) की आपत्ति शामिल थी। एंटनी ने कहा कि एक रक्षा मंत्री होने के नाते मैं वित्त मंत्रालय की आपत्ति को कैसे दरकिनार कर देते। इसलिए मैने फाइल पर लिखा था कि सौदे के लिए बातचीत की प्रक्रिया और इसे अंतिम निर्णय तक पहुंचाने का काम जारी रहे। इस मामले को अभी सुरक्षा मामलों की कैबिनेट में ले जाने की आवश्यकता नहीं है। एंटनी ने पूछा कि आखिर इसमें क्या गलत था?

3. एंटनी ने कहा कि एक रक्षा मंत्री होने के नाते निर्मला सीतारमण एक नई कंपनी, अनुभव हीन (अनिल अंबानी की) को सही और एचएएल को क्षमता हीन कैसे ठहरा सकती हैं?

4. रक्षा मंत्री होने के नाते निर्मला सीतारमण रक्षा खरीद प्रक्रिया, नीति, व्यवस्था को दरकिनार कैसे कर सकती हैं?
निभाया रक्षा मंत्री का दायित्व : एंटनी
एक रक्षा मंत्री होने के नाते मैने पूरी जिम्मेदारी से अपनी ड्यूटी निभाई है। कहीं कोई अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं किया है। फाइल पर कोई अनावश्यक टिप्पणी नहीं की है। मैं अपने इस दावे पर कायम हूं। रक्षा मंत्रालय को इस बारे में फाइल में दर्ज टिप्पणी के प्रकरण को सामने लाना चाहिए।

सरकार बताए

1. रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण, कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, वित्त मंत्री कई बार मोदी सरकार के समय में हुए लड़ाकू विमानों के सौदे को प्रति विमान यूपीए सरकार के समय में हुए सौदे से सस्ता बता चुके हैं। वित्त मंत्री ने इसे यूपीए सरकार के समय में हुए प्रति विमान सौदे से 20 प्रतिशत तो वायुसेना के एक अधिकारी ने 40 प्रतिशत तक सस्ता बताया है। एंटनी के अनुसार सब गलत बयानी कर रहे हैं। इस लिए सरकार को चाहिए कि वह यूपीए सरकार और मोदी सरकार के समय में हुए प्रति विमान सौदे की अलग-अलग कीमत बताए?

2. यदि मोदी सरकार ने सस्ता लड़ाकू विमान सौदा किया है तो उसने 36 का ही क्यों किया। सरकार ने इससे बड़ी संख्या क्यों नहीं चुनी, क्योंकि वायुसेना को लड़ाकू विमानों की जरूरत है और सरकार ने इसे ध्यान में रखकर 110 लड़ाकू विमानों की प्रक्रिया भी शुरू की है?

क्या कह रही हैं रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण
1.रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के अनुसार यूपीए सरकार के समय में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एचएएल राफेल लड़ाकू विमानों के सौदे से बाहर हो गई थी। क्योंकि प्रोडक्शन टम्र्स पर डास्सो एवियेशन और एचएएल के बीच बात नहीं बन सकी थी। एंटनी के अनुसार यह गलत है। ऐसा नहीं था।

2. मोदी सरकार के समय में हुए सौदे में राफेल विमान भारतीय जरूरतों के हिसाब से यूपीए सरकार के समय में खरीदे जाने वाले प्रति राफेल विमानों से अच्छे और 9 प्रतिशत सस्ते हैं। दो देश की सरकारों के बीच गोपनीयता शर्त के कारण यह मौजूदा सरकार राफेल विमानों की कीमत नहीं बता सकती? पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी सीतारमण के इस तर्क तथ्यों के छिपाने का बहाना मानते हैं।

3. निर्मला सीतारमण ने कहा कि एंटनी ने 2013 में 126 लड़ाकू विमानों के सौदे में अनावश्यक तरीके से हस्तक्षेप किया था।

4. राफेल विमान पर यूपीए सरकार अंतिम निर्णय लेकर सौदे को पूरा रूप नहीं दे पाई थी। इस पर मोदी सरकार ने निर्णय लिया है और सौदे को पूरी किया है। एके एंटनी को इस पर आपत्ति है। उनका कहना है कि रक्षा मंत्री गरिमा के विपरीत तथ्यों को तोड़ मरोड़ रही हैं।

5. एचएएल के पास राफेल लड़ाकू विमानों को बना पाने की गुणवत्ता और क्षमता का अभाव है। निर्मला सीतारमण के इस बयान पर एंटनी का कहना है कि एक रक्षा मंत्री जिम्मेदार पद पर रहते हुए ऐसा कैसे कह सकती हैं। उन्हें बताना चाहिए मेक इन इंडिया के तहत 110 लड़ाकू विमानों के लिए सरकार जो अंतरराष्ट्रीय प्रस्ताव मंगा रही है, उसके लिए देश के पास एचएएल के दूसरी विमान निर्माण के क्षेत्र में अनुभवी कंपनी कौन सी है?
पूर्व वायुसेनाध्यक्ष एचरचीफ मार्शल पीवी नाइक
पूर्व एयरचीफ मार्शल के नेतृत्व में ही यूपीए सरकार के समय में 126 लड़ाकू विमानों के प्रस्ताव के लिए आए अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के सभी छह लड़ाकू विमानों का परीक्षण हुआ था।

एयर चीफ मार्शल तब एयर मार्शल थे। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में फ्रांस के राफेल और यूरोफाइटर टाइफून को कड़े तकनीकी, फील्ड और यूजर परीक्षण के बाद वायुसेना की जरूरत के अनुरूप बताया था।

एचरचीफ मार्शल का कहना है कि राफेल उच्चकोटि के उन्नत विमान हैं। इसमें भारतीय सुरक्षा और चुनौतियों संबंधी जरूरत के हिसाब से 126 लड़ाकू विमानों की जरूरत बताई थी। वायुसेना की यह जरूरत अब भी पूरी नहीं हुई है। इसका हमें खेद है। इसका वायुसेना की क्षमता पर असर पड़ता है।

वायुसेना या सैन्यबल अपनी जरूरत बताते हैं। सरकार के निर्णय के अनुसार परीक्षण करते हैं और सरकार को अपनी रिपोर्ट देते हैं। रक्षा साजो-सामान का दाम तय करने और इस तरह के किसी काम में उनकी कोई भूमिका नहीं होती।

वायुसेना में एक साथ, एक समय में दो स्वाड्रॉन लड़ाकू विमान ही शामिल किए जा सकते हैं, लेकिन वायुसेना की आवश्यकता 42 स्वाक्ड्रान की क्षमता पाने के लिए सौ से अधिक लड़ाकू विमानों की बनी हुई है। चीन और पाकिस्तान की सीमा पर मिल रही चुनौतियों के मद्देनजर यह अति आवश्यक है।
निर्मला सीतारमण बोल रही हैं झूठ : यशवंत सिन्हा
1. पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा कि इस प्रकरण में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण कई स्तर पर गुमराह कर रही है। लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान वह जिस गोपनीयता समझौते का हवाला दे रही थीं, वह 2015-16 में निष्क्रिय हो गया था। मोदी सरकार(एनडीए) ने इसे 2015-16 में नये सिरे से किया। वह इसका जिक्र नहीं करती।

2. फ्रांस के राष्ट्रपति का स्पष्टीकरण आने के बाद भी निर्मला सीतारणण ने उसे पूरा नहीं बताया। वहां भी गुमराह कर रही हैं।

3. देश में यह परंपरा है कि यदि कुछ टॉप सीक्रेट हो तो केन्द्र सरकार देश के उच्चस्तर के कुछ नेताओं को बुलाकर उसके बारे में जानकारी देती है। तथ्य दिखा देते हैं।

एके एंटनी सही बोल रहे हैं : यशवंत सिन्हा

यशवंत सिन्हा ने कहा कि एंटनी ने जो हमारी चिंता के बारे में कहा है, वह सही है। हमें कहीं से पता चला था कि लाइफ साइकिल कास्ट पर सरकार विचार कर रही है। लाइफ साइकिल कास्ट नई चीज थी, अचंभित कर रही थी। इसलिए हमने एंटनी को एक से अधिक बार उसे जानने, समझने के लिए पत्र लिखा था। उन्होंने हर बार जवाब दिया था। हम उनके जवाब से संतुष्ट थे। तब तक 2014 का लोकसभा चुनाव का समय आ चुका था।

यशवंत सिन्हा ने कहा कि एंटनी का 2013 में फाइल पर टिप्पणी का तर्क सही है। वित्तमंत्रालय का लाइफ साइकिल कास्ट को लेकर सवाल था। हमने भी जिज्ञासा जाहिर की थी। ऐसे में एक रक्षा मंत्री जब तक वित्त मंत्रालय के साथ यह समस्या नहीं सुलझ जाती है, उसे कैसे सुरक्षा मामलों की मंत्रिपरिषद में ले जा सकता है।

सिन्हा के अनुसार रक्षा मंत्री बिना इस सौदे की प्रक्रिया पूरी हुए, वित्त मंत्रालय की चिंताओं का समाधान हुए सुरक्षा मामलों की मंत्रि परिषद में नहीं ले जा सकते थे। इसलिए यहां एंटनी का कहना सही है कि वह अपनी ड्यूटी निभा रहे थे। यह एंटनी का कहना सही है कि उन्होंने एंसी टिप्पणी करके रक्षा सौदे में कोई अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं किया है।

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