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भारत बंद पर सत्ता पक्ष के हाथ इतने खाली क्यों हैं?

साढे चार साल के मोदी सरकार के कामकाज पर प्रहार करते हुए मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सहयोगी दलों के साथ मिलकर भारत बंद का आह्वान किया, लेकिन इस बंद पर सत्ता पक्ष के हाथ इतने खाली क्यों हैं? भारत बंद की हकीकत: विपक्षी एकता पर सवाल नाम से भाजपा ने एक विज्ञप्ति जारी की है। यह विज्ञप्ति ही अपने आप में एक सवाल है।

पूरे दो पेज की विज्ञप्ति में भाजपा ने ऐसा कोई सवाल नहीं उठाया है, जिसके बल पर भारत बंद जैसे आह्वान को कठघरे में खड़ा किया जा सके? भाजपा की इस विज्ञप्ति में शरद पवार के राहुल गांधी से पहले बोलने, 21 दलों के भारत बंद के समर्थन की बजाय 16 दलों का ही समर्थन होने जैसे बिंदु भर शामिल हैं।

भारत बंद में विश्वास नहीं करते
कांग्रेस महासचिव अशोक गहलोत ने कहा कांग्रेस पार्टी ने कभी भारत बंद नहीं करवाया और कभी इस पर विश्वास नहीं करती थी, लेकिन इस बार देश में जो हालात बने, हमें करना पड़ा। अशोक गहलोत ने कहा कि मोदी जी ने असत्य बोलकर, झूठे आंकड़े देकर ऐसा माहौल बना दिया था कि जब वह देश के प्रधानमंत्री बनेंगे तो आकाश से तारे तोड़ लाएंगे। अच्छे दिन आएंगे, काला धन आएगा, रोजगार देंगे, पेट्रोल-डीजल के दाम घटेंगे, मंहगाई कम होगी….क्या-क्या नहीं बोलते थे। अशोक गहलोत ने इसके जरिए दलील दी कि क्यों भारत बंद का आह्वान करना पड़ा?

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आप तो विपक्ष की चिंता कर रहे हैं?

अशोक गहलोत का यह सवाल ज्यादा कीमती है। वह भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी पर सवाल उठा रहे हैं। गहलोत का कहना है कि भाजपा अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में महागठबंधन पर चिंता कर रही है। उसकी चिंता यह है कि महागठबंधन होगा कि नहीं? चलेगा या नहीं? इस पर भाजपा चिंता क्यों कर रही है। चिंता कर रही है तो जवाब भी दे दे?

गहलोत ने कहा कि आज तक जो सरकार सत्ता में रही है, वह अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में देश की सामाजिक, आर्थिक स्थिति, देश के हालात, मंहगाई, जनता की परेशानी, कानून व्यवस्था के मुद्दे पर चर्चा करती है। गहलोत ने कहा कि यह मैं पहली बार देख रहा हूं कि  जनता वाली पार्टी बीजेपी को इसकी चिंता ही नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष सवाल उठा रहे हैं कि प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं और भाजपा है कि अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बैठकर विपक्ष की चिंता कर रही है?

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भारत बंद के बाद आए दो मंत्री

विपक्ष के भारत बंद के आह्वान और इसके असर दिखाने के बाद केंद्र सरकार के कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद और पेट्रोलियम रसायन एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान मीडिया के सामने आए। प्रेसवार्ता की। रविशंकर प्रसाद ने इसमें जहानाबाद में बच्ची की भारत बंद के दौरान मौत के विषय को उठाया। उन्होंने भारत बंद को राजनीतिक हिंसा से जोड़ा।

वहीं धर्मेन्द्र प्रधान ने तेल की कीमतों के बढ़ने के कारण गिनाए और इन्हें काबू में कर पाने से हाथ खड़े कर दिए। एक तरह से केंद्र सरकार न तो भारत बंद की नैतिकता पर सवाल उठा सकी, न ही इस तरह के बंद के आह्वान को गलत ठहरा सकी और न ही इसके पीछे के राजनीतिक उद्देश्य का गुब्बारा फोड़ सकी। शाम होते-होते भाजपा के हाथ एक मुद्दा जरूर लगा। नेशनल हेराल्ड केस का।  दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी द्वारा 2011-12 के उनके कर निर्धारण से जुड़ी फाइल को दोबारा खोलने को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दिया। इसी पर भाजपा के प्रवक्ता सांबित पात्रा ने प्रेस वार्ता की जिसका बाद रणदीप सुरजेवाला ने राजनीतिक जवाब दे दिया।

एक दिन के भारत बंद का मतलब?

एक दिन का भारत बंद जब ट्रेड यूनियन करती हैं तो देश के अर्थशास्त्री 2015 के बाद से इससे 18-25 हजार करोड़ रुपये के नुकसान का आकलन करते आए हैं। ट्रेड यूनियन के इस बंद में बैंक, परिवहन(रेल, भूतल, हवाई), पर्यटन, उद्योग आदि प्रभावित होते हैं।

21 दलों के सहयोग से 10 सितंबर को आयोजित बंद में व्यापारिक प्रतिष्ठान से लेकर काफी कुछ बंद रहा है। नुकसान का आकलन इससे कम नहीं रहा होगा। हालांकि कांग्रेस पार्टी ने भारत बंद को तार्किक नहीं ठहराया है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि वह प्रधानमंत्री मोदी को देश की जनता का गुस्सा दिखाना चाहते थे। वहीं अभी इस मामले में सरकार और भाजपा के हाथ खाली हैं।
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