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अब समलैंगिकता अपराध नहीं

शीतला सिंह
सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने अंग्रेजों द्वारा बनायी गयी भारतीय दण्ड विधि की धारा-377 को असंवैधानिक ठहरा दिया है, जिसके बाद दो बालिगों द्वारा सहमति से बनाया गया अप्राकृतिक या समलैंगिक यौन सम्बन्ध, जो पहले अपराध था, अपराध नहीं रह गया है। न्यायालय का मानना है कि भारतीय संविधान में बालिग व्यक्तियों को जो मूल अधिकार दिये गये हैं, उनमें उन्हें अपनी पसन्द की शादी करके या बिना किये साथ रहने और शारीरिक सम्बन्ध बनाने के अधिकार तो हैं ही, अतरू समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अब तक समलैंगिकता ऐसा अपराध थी, जिसके लिए तीन वर्ष तक की सजा दी जा सकती थी। समलैंगिकों द्वारा इसके खिलाफ जो आन्दोलन चलाया जा रहा था, उसके समर्थन में बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल थीं, जो खुद को पुरुषों के बजाय अपनी पसन्द की महिलाओं के साथ विवाह करने के लिए स्वतंत्र बतातीं और कहती थीं कि उन्हें इसका अधिकार है। इस प्रकार उन्होंने विवाह की उस परिकल्पना को ही नकार दिया था, जिसमें विपरीत लिंगी व्यक्ति से लैंगिक सम्बन्ध को मुख्य और निर्णायक माना जाता है। साफ है कि समलैंगिकों में पुरुष व महिलाएं दोनों शामिल हैं। बहरहाल, दिलचस्प यह कि जिन अंग्रेज शासकों ने कभी समलैंगिकता को अपराध बनाने की परिकल्पना की थी, अब उनके इंग्लैंड में भी वह अपराध की श्रेणी से परे हो चुकी है। अमेरिका व ब्राजील आदि कई अन्य देशों में भी इसे अपराध नहीं ही माना जाता। समझा यह जाता है कि यह दो बालिग व्यक्तियों की इस स्वतंत्रता पर आधारित है कि वे चाहें तो अपने ही लिंग के व्यक्ति से सम्बन्ध निर्धारित कर उसके साथ रह और विवाह कर सकते हैं। इस सिलसिले में जानने की एक जरूरी बात यह भी है कि जिन देशों ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाया है, उनमें अधिकांश ईसाई धर्मावलम्बी हैं। इसके विपरीत मुस्लिम देशों में इसे अभी भी प्राणदण्डयोग्य अपराध की श्रेणी में ही रखा गया है। अलबत्ता, कुछ देशों में इस कानून पर अमल नहीं होता, लेकिन कानून की किताबों में वह यथापूर्व विद्यमान है। जाहिर है कि इस प्रश्न पर सोच एक न होकर भिन्न-भिन्न है। जो देश इसे अपनी प्राचीन धार्मिक मान्यताओं या धर्मग्रन्थों से जोड़कर देखते हैं, उन्होंने अपनी व्यवस्था में इसके लिए कठोर दण्ड की व्यवस्थाएं कर रखी हैं।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस सम्बन्धी कानूनी धारा को अतार्किक व अदंडनीय बताये जाने के बाद भी इसके लिए दण्ड के समर्थकों का कहना है कि समलैंगिकता प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के विपरीत है। दंड के ये समर्थक कामुक आकर्षण को विपरीत लिंग से जोड़कर ही देखते हैं और नहीं मानते कि दो पुरुषों या दो स्त्रियों के बीच भी ऐसा कोई आकर्षण हो सकता है। ऐसे आकर्षण या उस पर आधारित सहमति को भी वे अप्राकृतिक ही बताते हैं। हां, सर्वोच्च न्यायालय ने उनके इस तर्क को नहीं माना कि विवाहों का मुख्य उद्देश्य सृष्टि की भावी व्यवस्था के संचालन में सहयोग करना है। काम को निरर्थक वह भी नहीं मानता, लेकिन संविधान के अनुच्छेद-14 में उल्लिखित समानता के अधिकारों के मद्देनजर उसके पांच न्यायाधीशों की सर्वसम्मति व्याख्या यही है कि धारा 377 असंवैधानिक है, क्योंकि वह अनुच्छेद-14 के खिलाफ है। गौरतलब है कि इन पांचों जजों में स्त्री-पुरुष के अलावा दूसरे धर्मावलम्बी भी शामिल हैं और सबके सब ने उक्त धारा को बालिगों के समानता के अधिकारों से परे माना है। कह सकते हैं कि इस प्रकार लम्बी अवधि से चला आ रहा एक न्यायिक विवाद, जो अभी तक भारत की न्यायपालिका मेें जीवित था, समाप्त हो गया है। भले ही इसके विरोधियों का कहना है कि समलैंगिकता की छूट देकर हम समाज में ऐसे अप्राकृतिक सम्बन्धों को बढ़ावा देंगे जिनकी नैतिक परिभाषा आसान नहीं होगी। लेकिन न्यायालय का दृढ़तापूर्वक यह मानना है कि समता के अधिकार की सृष्टि भावी समाज की आवश्यकताओं के लिए की गयी है, किन्हीं प्राचीन मानदण्डों की रक्षा के लिए नहीं। विडम्बना यह कि जो लोग अपने को धर्मपरायण मानते हैं, उन्हें कतई यह पसन्द नहीं आता कि वे ऐसी प्रवृत्तियों को मानवोचित बतायें, जो पहले कदाचार की श्रेणी में आती रही हों। लेकिन उनके दुर्भाग्य से सर्वोच्च न्यायालय का सदाचार किसी धार्मिक ग्रन्थ पर आधारित नहीं है। वह तो बच्चों के जन्म को भी स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर आधारित मानता है। इसके लिए विवाह नाम की संस्था की अनिवार्यता को भी वह स्वीकार नहीं करता और मानव की स्वाभाविक जननप्रक्रिया का ही अंग मानता है। न्यायालय का मत है कि यदि हम बिना शादी के सम्बन्धों को मान्यता देते हैं तो किसी को समलैंगिक सम्बन्धों को रोकने के लिए प्रतिबन्धात्मक उपाय करने के समर्थक भी नहीं हैं। इस सवाल पर जायें कि समलैंगिक सम्बन्धों का अन्तिम उद्देश्य क्या होगा, तो इसके समर्थक कहते हैं कि जो भी हो, हमें अपनी जिन्दगी जीने के लिए स्वेच्छाओं का अधिकार मिलना चाहिए। इस सिलसिले में कानूनी मान्यता यह है कि किसी को भी ऐसी स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती, जिससे दूसरे को नुकसान पहुंचे या जो शारीरिक और मानसिक क्षति उपजाने वाली हो। सवाल है कि समलैंगिकता से ऐसी कोई क्षति होती है क्या? हमारे देश में समलैंगिकता समर्थक आन्दोलन को विदेशी विचार बताया जाता है, जो सच्चाई भी है। लेकिन अब स्त्री और पुरुषों की एक बड़ी संख्या श्लव इज जेंडरलेस्य के नारे पर खुले आम इसका समर्थन करती हंै। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद इन समर्थकों का समुदाय उसके बाहर एकत्र हुआ, जिसका उद्देश्य अपनी प्रसन्नता व्यक्त करना था। उसने विभिन्न तरीकों से अपनी इसी भावना का प्रकटीकरण किया कि फैसले से उसे आन्तरिक प्रसन्नता हुई है। प्रसंगवश, जिस कानून द्वारा समलैंगिकता को अपराध बताया गया था, अंग्रेजों ने उसे 1864 में बनाया था और आजादी के बाद उनके द्वारा बनाये गये दीवानी, फ ौजदारी व माल के कानून ही थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ स्वीकार कर लिये गये थे। अब इस सम्बन्धी मान्यता यह है कि किसी कानून में परिवर्तन के अधिकार संसद को हैं, जो लोकेच्छा के आधार पर गठित होती है। लोकतंत्र में हम अपने विचारों व भावनाओं को किसी पर लादते नहीं, बल्कि उनके अन्तर्निहित तत्वों के परीक्षण के लिए जनादेश के माध्यम से लोकेच्छा की खोज करते हैं। समलैंगिकता के विरोधी लाख कहें कि उसे अपनाने से समाज को क्या मिलने वाला है, जब उससे नयी पीढ़ी का जन्म तक नहीं हो सकता, उसके समर्थकों का कहना है कि लोकतंत्र का उद्देश्य लोकेच्छाओं का सम्मान है, किसी ऐसी व्यवस्था को बनाना या उसकी रक्षा करना नहीं, जो नयी पीढ़ी को अस्वीकार्य हो। इसीलिए संविधान में मानवाधिकारों को एक अध्याय के रूप में स्थान मिला हुआ है और विभिन्न कोणों से व्याख्या के साथ ही उन्हें और मजबूत किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समलैंगिकता की स्वीकृति के बाद यह संदेश अवश्य जायेगा कि हमारा संविधान मुख्य रूप से उन मान्यताओं का विरोधी है, जिनके तहत कुछ लोग सारी चीजों को धर्म से जोड़कर देखते हैं और इसके लिए दंडप्रक्रिया का सहारा लेना चाहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय पहले भी फैसला दे चुका है कि देश के लोगों के पास निजता का जो अधिकार है, राज्य उसका उल्लंघन नहीं कर सकता। यानी राज्य को किसी व्यक्ति की निजता में झांकने का अधिकार नहीं है। उसके नये निर्णय से यह भी साफ है कि जिन भावनाओं को वह स्वीकार नहीं करता, उनको पुरस्कृत करने के लिए कोई कानून बनाने के लिए सरकारी या गैरसरकारी प्रयास भी नहीं ही किये जा रहे।
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आज का राशि फल
मेष:- कोई महत्वपूर्ण वस्तु के खोने की चिंता बढ़ेगी। कोई नया लक्ष्य अपनी सार्थकता हेतु आपको उद्वेलित करेगा। पारिवारिक अथवा निजी जरुरतों में व्यय का योग है। जीवन साथी का भावनात्मक सहयोग मिलेगा।
बृषभ:- महत्वपूर्ण कायरें में अवरोध से मन परेशान होगा। निराशा छोड़ समस्याओं के विकल्प पर मन केंद्रित करें। सामाजिकता के निर्वहन संबंधी व्यस्तता रहेगी। महत्वपूर्ण कायरे में आलस्य का त्याग करें।
मिथुन:- कोई महत्वपूर्ण कार्य सार्थक होने का योग है। निकट संबंधों में भावनात्मक सहयोग प्राप्त होगा। किसी नयी दिशा में सकारात्मक सोच अवश्य रंग लायेगी। मन नयी-नयी कल्पनाओं की सैर करेगा।
कर्क:- महत्वपूर्ण कायरें की सकुशल पूर्ति हेतु मन चिंतित होगा। हंसमुख व मजाकिया स्वभाव से आसपास वातावरण में प्रसन्नता बिखेरेंगे। कुछ नई प्रतिभाएं आप में परिलक्षित होंगी। आलस्य न करें। सिंह:- नये लक्ष्यों में क्रियाशीलता से प्रगति के आसार बढ़ेंगे। कार्यक्षेत्र में संबंधों का भरपूर लाभ उठाएंगे। किसी निकट संबंध के प्रति विशेष अपनेपन की अनुभूति करेंगे। घर में मेहमान का आगमन संभव।
कन्या:- कभी धूप कभी छांव यही जीवन है। अतरू उससे न घबराएं। नकारात्मक चिंताओं को त्याग आशावादी बने। प्रियजनों से प्यार, उपहार व सम्मान मिलने का योग है। घर में खुशहाली रहेगी। तुला:- इस सप्ताह नये लक्ष्यों के प्रति क्रियाशीलता से प्रगति के आसार बढ़ेंगे। अपने स्वास्थ का ख्याल रखें। सगे-संबंधों में कटुता न आने दें। रोजगार में अनवरत् व्यस्तता से मन खिन्न होगा।
वृश्चिक:- प्रतिभाओं से पूर्ण होने के बावजूद निराश मन लाभ से वंचित करेगा। अच्छी योजनाएं महत्पूर्ण दायित्व की पूर्ति में सहायक होंगी। रचनात्मक कायरे में रुचि बढ़ेगी। घर में मेहमान का आगमन संभव।
धनु:- निकट संबंधों में मधुर वाणी का प्रयोग करें। किसी सुखद यात्रा की योजना बनेगी। उत्साहपूर्ण सुखद समय का एहसास होगा। विद्यार्थियों के लिए ग्रहों की अनुकूलता लाभप्रद होगी।
मकर:- काल्पनिक जीवन से परे यर्थात् के धरातल पर सकारात्मक लक्ष्य का निर्धारण करें। जीवन में लक्ष्यहीनता व निराशा दोनों ही घातक हैं। अच्छा होगा कि अपने मन को सकारात्मक दिशा दें।
कुंभ:- किसी महत्वपूर्ण निर्णय को लेकर मन चिंतित होगा। संवेदनशीलता व सरलता आपके स्वभाव की विशेषता व कमजोरी दोनों है। अतरू संतुलित रहने का प्रयास करें। शिक्षा मे सफलता मिलने का योग है।
मीन:- रोजगार में कुछ अवरोधों के बावजूद सफलता अवश्य मिलेगी। आर्थिक पक्ष के प्रति मन चिंतित होगा। आय-व्यय में संतुलन बनाकर चले। घर में किसी मेहमान के आगमन से घर में प्रसन्नता संभव।

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