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बौद्ध मंदिर में पुनर्जन्म के लिए होती है प्रार्थना

जापान में सैतामा प्रांत के ओगानो के जिजोजी बौद्ध मंदिर में ऐसे बच्चों की याद में स्मारक बनाया गया है, जो जन्म से पहले ही दुनिया से चल बसे या गर्भपात के कारण दुनिया में नहीं आ सके। मंदिर परिसर में ऐसी 15 हजार प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं और ये बढ़ती ही जा रही हैं। इन्हें जिजो स्टैच्यू कहा जाता है। इन प्रतिमाओं को स्थापित करने का मकसद मां का अपने अजन्मे बच्चे को श्रद्धांजलि देना और इस प्रतिमा में अपने बच्चे की झलक पाना है, ताकि व्यक्त न किए जा सकने वाले दुख से वह उबर सके।
जापान में अजन्मे बच्चे की मौत पर अनुष्ठान भी किया जाता है। इसे मिजुको कुयो कहा जाता है। मिजुको का मतलब है मृत भ्रूण या मृत शिशु है। जबकि कुयो से आशय स्मारक बनाने से है। बौद्ध परंपरा में माना जाता है कि बच्चों को बुरी आत्माओं से बचाने के लिए धार्मिक अनुष्ठान करना चाहिए। ये अजन्मे मृत बच्चे की आत्मा को शांति देता है।

इस मंदिर के हजारों अनुयायी यहां सोमवार को जुटकर उस मृत बच्चे के लिए प्रार्थना करते हैं, जो दुनिया में नहीं आ सका। अनुयायियों का मानना है कि इस प्रार्थना से बच्चा दुनिया में दोबारा बौद्ध समुदाय में जन्म लेगा। जिजो बौद्ध धर्म से जुड़ा शब्द है। जापान में इसका मतलब धरती का मकबरा है। सबसे पहले जिजो प्रतिमा बनाने की शुरुआत पूर्वी एशिया से हुई।

ताइवान में 48साल पहले हुई थी इसी तरह की परंपरा की शुरूआत

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अजन्मे बच्चे की याद में जापान के जिजोजी मंदिर में स्टैच्यू लगाते हैं, ताकि पीड़िता दुख से उबर सके, मंदिर में अब तक15 हजार प्रतिमाएं लग चुकी हैं  ताइवान में भी अजन्मे बच्चे की मौत पर उसे याद करने के लिए स्मारक बनाने की परंपरा है। मिजुको कुयो की परंपरा 1970 में शुरू हुई थी। यह 1980 तक बेहद लोकप्रिय हो गई। कोरिया में भी कई जगह ऐसे अनुष्ठान हुए। अब ये अमेरिका में भी पहुंच गई है। वहां कई जगह गर्भपात या मिसकैरेज की शिकार महिलाओं ने ये अनुष्ठान किया हैं।

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