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धारा-377 पर फैसला कोर्ट के विवेक पर छोड़ने के लिए केंद्र की आलोचना की

सुप्रीम कोर्ट के जज डीवाई चंद्रचूड़ ने धारा-377 जैसे संवेदनशील मामले में फैसला कोर्ट के विवेक पर छोड़ने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना की है। उन्होंने शनिवार को कहा कि आए दिन राजनेता अपनी जिम्मेदारी छोड़कर कोर्ट को यह शक्ति दे रहे हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ उस पांच सदस्यीय सांविधानिक पीठ का हिस्सा थे, जिसने धारा-377 के एक हिस्से को निरस्त करते हुए दो वयस्कों के बीच रजामंदी से समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था।

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के 19वें वार्षिक बोध राज साहनी मेमोरियल व्याख्यान में जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि क्यों राजनेता अपनी शक्ति जजों को सौंप देते हैं। सुप्रीम कोर्ट में ऐसा रोजाना हो रहा है। धारा-377 जैसे मामले में केंद्र ने जवाब दिया कि हम फैसला कोर्ट के विवेक पर छोड़ते हैं। यह ‘विवेक’ मुझे जवाब नहीं देने के लिए मजबूर कर रहा था।

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इसलिए मैंने अगले दिन अपने फैसले में जवाब दिया। धारा-377 पर फैसला औपनिवेशिक काल के कानून और संवैधानिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले कानून के बीच लड़ाई को दर्शाता है। हमें फैसले में दोनों को सुसंगत करना था। हमने व्यक्तिगत गरिमा, किसी व्यक्ति की पसंद और स्वतंत्रता देने की कोशिश की।

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सुप्रीम कोर्ट ने दुनियाभर की अदालतों के फैसलों का हवाला दिया

सुप्रीम कोर्ट ने एलजीबीटी समुदाय के लोगों के लिए समानता और न्याय का मार्ग प्रशस्त करने वाली विभिन्न देशों की अदालतों के फैसलों का हवाला दिया। इस मामले में 166 पन्नों का फैसला लिखने वाले मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायाधीश खानविलकर ने इसी तरह का आदेश पारित करने वाली अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका व फिलीपींस की अदालतों और यूरोपीय मानवाधिकार अदालत के फैसलों का जिक्र किया।

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए न्यायालय ने लिखा है कि एलजीबीटी समुदाय को अपने निजी जीवन को लेकर बराबर का सम्मान पाने का हक है। उनके निजी यौन झुकाव को अपराध घोषित कर राज्य उनके अस्तित्व पर सवाल नहीं उठा सकता और न ही उनके भविष्य को नियंत्रित कर सकता है।

पीठ ने फैसले में कहा कि दक्षिण अफ्रीका की सांविधानिक अदालत ने समलैंगिकों के साथ भेदभाव की तुलना रंगभेद से की थी। पीठ ने डेलविन व्रेंड मामले में कनाडा के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी गौर किया। कोर्ट ने कहा था कि सबसे महत्वपूर्ण नतीजा मनोवैज्ञानिक नुकसान का है, जो भेदभाव के डर की स्थिति से शुरू होता है।

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