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जरूरत पूर्ण जाति जनगणना की

उपेन्द्र प्रसाद
ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के बाद मोदी सरकार अब आगामी दस वर्षीय जनगणना में ओबीसी के आंकड़े जुटाने की बात कर रही है। यह जनगणना 2021 में होनी है और उसके पहले 2019 में लोकसभा के आमचुनाव होंगे, जो यह तय करेंगे कि मोदी सरकार आगे रह पाती है या नहीं। इसलिए ओबीसी के आंकड़े जुटाने की बात करना ओबीसी उत्थान के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी की चुनाव जीतने की लालसा को दिखाता है। चुनाव जीतना सभी राजनैतिक पार्टियों और उम्मीदवारों का ध्येय होता है। जीत की लालसा रखना गलत नहीं और जीत सुनिश्चित करने के लिए लोगों की वाजिब मांगों को मानना भी गलत नहीं। इसलिए यदि भारतीय जनता पार्टी चुनाव जीतने के लिए ही सही, यदि ओबीसी के आंकड़े आगामी जनगणना में जुटाने की बात कर रही है, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि इस तरह के आंकड़े जुटाने की मांग बरसों पुरानी है। यह मांग केन्द्र सरकार द्वारा गठित राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग ने भी उठाई थी, क्योंकि उसे पिछड़ी जातियों के ओबीसी में शामिल करने और उनमें से जो विकसित हो गए हैं, उन्हें ओबीसी से बाहर करने का जिम्मा सुप्रीम कोर्ट ने दिया था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस दायित्व को पूरा करने के लिए उसके पास ओबीसी के आंकड़े ही नहीं, बल्कि उनके आंकड़े भी होने चाहिए थे, जो अपने को ओबीसी में शामिल करने की मांग कर सकते हैं। यही कारण है कि नरसिम्हाराव सरकार के कार्यकाल में अपने गठन के बाद ही राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने जाति जनगणना की मांग की थी, ताकि उसके पास ओबीसी और अनारक्षित वर्गों की जनसंख्या और उनके आर्थिक व शैक्षणिक पिछड़ापन के आंकड़े उपलब्ध हों। अपना दायित्व पूरा करने के लिए उसके पास ओबीसी व अनारक्षित वर्गों की जातियों के सरकार में प्रतिनिधित्व की जानकारी चाहिए थी। इन जानकारियों के बिना वह ओबीसी की विकसित जातियों को बाहर करने और तथाकथित अगड़ी जातियों में से स्वघोषित पिछड़ों को ओबीसी में शामिल करने की सिफारिश कर ही नहीं सकती थी।
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की मांग के मुताबिक देवेगौड़ा सरकार ने 2001 में जाति जनगणना कराने का निर्णय भी लिया था, लेकिन 1999 में वाजपेयी सरकार ने जाति जनगणना कराने का निर्णय वापस ले लिया और कहा कि इससे जातिवाद बढ़ेगा। वह बिल्कुल ही गलत निर्णय था, क्योंकि जाति संबंधित आंकड़े न रहने के कारण राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग जिस उद्देश्य से गठित हुआ था, वह उद्देश्य ही पराजित हो रहा था। बहरहाल 2001 में जाति जनगणना नहीं हुई और 2011 में इसे कराने के लिए मनमोहन सरकार पर दबाव पड़ा। मनमोहन सिंह ने खुद लोकसभा में जाति जनगणना कराने का संकल्प किया और उसके लिए लोकसभा ने मनमोहन सरकार की प्रशंसा में प्रस्ताव भी पारित कर दिया। लेकिन कांग्रेस के ही चिदंबरम और कपिल सिब्बल जैसे नेताओं के भारी विरोध और खुद सरकार की झिझक के कारण 2011 की 10 वर्षीय जनगणना में जाति जनगणना नहीं कराई गई। लेकिन दबाव में आकर सरकार ने अलग से जाति जनगणना कराने की घोषणा कर दी। इस बार जाति जनगणना को गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की पहचान करने वाले प्रोजेक्ट से नत्थी कर दिया और उस प्रोजेक्ट पर करीब 50 अरब रुपये भी खर्च कर दिए, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि जाति जनगणना हुई भी या नहीं। वह जनगणना मनमोहन सिंह सरकार में शुरू हुई और मोदी सरकार के कार्यकाल में समाप्त हुई। जाहिर है, उसके आंकड़े जाहिर करने का दायित्व मोदी सरकार पर ही है। पर वे आंकड़े सामने नहीं आ रहे हैं। जनगणना के बारे में दिलचस्पी लेने वाले लोगों का कहना है कि जाति जनगणना के मामले में मनमोहन सिंह सरकार ने धोखा किया और जनगणना हुई ही नहीं और सरकार के पास केाई आंकड़े हैं ही नहीं। फिलहाल मोदी सरकार न तो आंकड़ा बता रही है और न ही यह कह रही है कि जाति के आंकड़े उसके पास है ही नहीं। बात-बात पर पिछली कांग्रेस सरकार पर दोष मढ़घ्ने वाली सरकार यह भी नहीं कह रही है कि पिछली यूपीए सरकार ने जाति जनगणना कराई ही नहीं या कराई भी तो आधी-अधूरी कराई। मोदी सरकार कर यह रवैया इसलिए है, क्योंकि इस सरकार में शामिल लोग भी जाति जनगणना के खिलाफ ही हैं। कांग्रेस का अभिजात्य वर्ग हो या भाजपा का आभिजात्य वर्ग- दोनों में से कोई भी जाति जनगणना कराना ही नहीं चाहता। और मोदी सरकार ने ओबीसी के आंकड़े इकऋा करने की जो बात की है, वह ओबीसी के वोट पाकर दुबारा सत्ता में आने के लिए ही है। यही कारण है कि ओबीसी का आंकड़ा जुटाने जैसी अस्पष्ट बात की जा रही है, जिसका असली मतलब समझना आसान नहीं है। इसका कारण यह है कि ओबीसी के आंकड़े अलग से जुटाने की जरूरत ही नहीं है। जाति जनगणना हो जाए, तो आंकड़े अपने आप आ जाएंगे और यदि जाति जनगणना नहीं कराई गई, तो ओबीसी के नाम से जुटाया गया आंकड़ा विवादास्पद ही होगा। डर है कि इस तरह के आंकड़े जुटाते समय लोगों से यह पूछा जाएगा कि वह ओबीसी है या नहीं। और सच यह भी है कि हमारे देश के सभी लोगों को अपनी जाति की तो जानकारी है, लेकिन देश के सभी ओबीसी लोग यह नहीं जानते कि वे ओबीसी हैं। इसका कारण उनमें शिक्षा और जागरूकता की कमी है। इसके अलावा अनेक जातियां ऐसी हैं, तो प्रदेशों में तो ओबीसी हैं, पर केन्द्रीय सूची में ओबीसी में नहीं हैं। उत्तर प्रदेश, दिल्ली व कुछ अन्य प्रदेशों के जाट इसके उदाहरण हैं। वैसे इसके और भी उदाहरण हैं। इसलिए ये लोग कहीं अपने को ओबीसी लिखवा देंगे और कहीं अनारक्षित श्रेणी और इस तरह जो ओबीसी का आंकड़ा आएगा वह आधा-अधूरा ही रहेगा। इसके अतिरिक्त जो जातियां अभी ओबीसी में नहीं हैं और ओबीसी में शामिल होने की मांग कर रही हैं। उनकी मांग पर विचार करने के लिए उनकी जनसंख्या और पिछड़ेपन या विकास का आंकड़ा चाहिए। और यह तभी आएगा, जब पूर्ण जाति जनगणना हो। इसके बिना जुटाया गया ओबीसी आंकड़ा किसी काम का नहीं होगा।

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