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सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में दुनिया भर की अदालतों का हवाला दिया

उच्चतम न्यायालय ने आईपीसी की धारा 377 के एक हिस्से को निरस्त करते हुए दुनिया भर में एलजीबीटी समुदाय के लोगों के लिए समानता और न्याय का मार्ग प्रशस्त करने वाली वहां की अदालतों के फैसलों का हवाला दिया। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध घोषित करने वाली आईपीसी की धारा 377 के एक हिस्से को बृहस्पतिवार को एकमत से निरस्त कर दिया।

पीठ ने कहा कि समलैंगिक वयस्कों के बीच सहमति से यौन संबंधों को प्रतिबंधित करने वाला धारा 377 का हिस्सा संविधान के तहत नागरिकों को प्राप्त ‘समानता का अधिकार और गरिमा के साथ जीवन के अधिकार’ का उल्लंघन करता है। 166 पृष्ठों का मुख्य आदेश लिखने वाले प्रधान न्यायाधीश मिश्रा और न्यायाधीश खानविलकर ने इसी तरह का आदेश पारित करने वाली अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और फिलिपीन गणराज्य की संवैधानिक अदालतों और यूरोपीय मानवाधिकार अदालत के फैसलों का उल्लेख किया।

अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए न्यायालय ने अपने फैसले में लिखा है कि एलजीबीटी को अपने निजी जीवन को लेकर सम्मान पाने का हक है और उनके निजी यौन झुकाव को अपराध घोषित कर राज्य उनके अस्तित्व पर सवाल नहीं उठा सकता तथा उनके भविष्य को नियंत्रित नहीं कर सकता है।

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दोनों न्यायाधीशों ने लिखा है कि रॉबर्ट बनाम अमेरिका मामले में अमेरिका की शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के साथ यौन संबंध बनाने और उसे जारी रखने को राज्य के बेमतलब के हस्तक्षेप से संरक्षण प्राप्त है।

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