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नॉन पंजाबी वोटर्स के हाथों में होगी मेयर की चॉबी, डाबला फिर मैदान में

रोहतक। नगर निगम चुनाव एक सप्ताह में घोषित हो जाएंगे। ऐसे में मेयर की टिकट के लिए अभी से नेताओं ने जातिगत गुणा-भाग करना शुरू कर दिया है। जातिगत आंकड़ों को देखा जाए तो तीन विधानसभा क्षेत्र से बने निगम में आसपास के गांवों से आए लोकल मतदाताओं की संख्या काफी बढ़ गई है। ऐेसे में भाजपा व कांग्रेस नॉन पंजाबी प्रत्याशी मेयर पद के लिए उतार सकती हैं। क्योंकि चुनाव में रोहतक विधानसभा में दोनों दल पंजाबी प्रत्याशी उतारते रहे हैं ।
बहु अकबरपुर से लेकर खरावड़, जलेबी चौक से लेकर गोहाना रोड पर टोल बैरियर, बोहर से लेकर सुनारिया, जींद बाईपास से लेकर आउटर बाईपास तक नगर निगम का एरिया फैसला हुआ है, जिसके 22 वार्ड के अंदर नया व पुराने शहर के अलावा आसपास के नौ गांव आते हैं, जिनमें बोहर, अस्थल बोहर, बलियाना, खेड़ी साध, पहरावर, कन्हेली, सुनारिया कलां व खुर्द के अलावा कुताना बस्ती तक शामिल हैं। जातिगत आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो पुराने शहर में जहां एससी-बीसी, बनिया, ब्राह्मण समाज की वोट के साथ पंजाबी समुदाय का बोलबाला है, जबकि गांधी कैंप, सुभाष नगर, झंग कॉलोनी, मानसरोवर कॉलोनी, डीएलएफ से लेकर शिवाजी कॉलोनी के आसपास के एरिया में तक पंजाबी समुदाय का दबदबा है। जबकि निगम के कलानौर हलके वाले वार्डों में एससी-एसटी के साथ पिछड़ा वर्ग की वोट ज्यादा हैं।

लोकल मतदाताओं की लगातार बढ़ रही संख्या
निगम एरिया में नौ गांवों के अलावा, सेक्टरों से लेकर माडल टाउन, शीला बाईपास से लेकर बोहर तक दोनों तरफ, शीला बाईपास से दिल्ली मोड़ तक दोनों तरफ आसपास के गांवों से आकर बसे लोगों की संख्या ज्यादा है। ऐसे में निगम के मेयर के चुनाव में पुराने शहर और आउटर शहर के बीच चुनावी जंग रोचक रहने की संभावना है।

नॉन पंजाबी ज्यादा होंगे मेयर के दावेदार
निगम एरिया में 70 प्रतिशत हिस्सा रोहतक विधानसभा का है। रिकॉर्ड को देखा जाए तो अब तक रोहतक विधानसभा से पंजाबी समुदाय का प्रत्याशी ही विधायक रहा है। चाहे भाजपा हो या कांग्रेस। केवल बनिया समुदाय से सेठ श्रीकिशन दास दो से तीन बार जीत हासिल करने में कामयाब रहे थे। भाजपा सरकार अब मेयर का पब्लिक से सीधा चुनाव करवाने जा रही है, जो रोहतक विधानसभा से ज्यादा एरिया का प्रतिनिधित्व करेगा। ऐसे में दोनों दलों द्वारा नॉन पंजाबी को मेयर के चुनाव में मैदान में उतारने की संभावना है।

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एक सप्ताह में घोषित हो जाएंगे चुनाव, ज्यादातर पार्षद अंदर खाते बेचैन
निगम प्रशासन में चर्चा है कि एक सप्ताह के अंदर निगम चुनाव घोषित हो सकते हैं। 12 या 13 सितंबर को प्रदेश चुनाव आयोग की ओर से तिथियां घोषित की जा सकती हैं। क्योंकि सरकार की ओर से नवरात्रों में चुनाव कराने का इशारा दिया जा चुका है। निगम के ज्यादातर निवर्तमान पार्षदों का कहना है कि वे मेयर की दौड़ में खुद को मान रहे हैं। हालांकि कई महसूस भी कर रहे हैं कि मेयर का चुनाव अब उनके दायरे से बाहर चला गया है, क्योंकि तीन विधानसभाओं से संबंधित होने के कारण राजनीति दलों की मेयर के चुनाव में ज्यादा भूमिका रहेगी।

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एक चेक हस्ताक्षर करने की पावर नहीं, रेनू डाबला फिर से मेयर की दौड़ में
पांच साल मेयर रही। निगम एक्ट के तहत वित्तीय व प्रशासनिक पावर आयुक्त के पास हैं। मेयर तो एक चेक पर हस्ताक्षर नहीं कर सकती। न ही किसी कर्मचारी का तबादला कर सकती हैं। ऐसे में सरकार को सीधा चुनाव कराने के साथ निगम एक्ट में संशोधन कर मेयर को और अधिकार देने चाहिए। पार्टी कहेगी तो वे फिर से मेयर का चुनाव लड़ सकती हैं।
-रेनू डाबला, निवर्तमान मेयर नगर निगम

मेयर की दौड़ में, समर्थकों की टटोल रहा नब्ज
निगम मेयर का पब्लिक सीधा चयन करेगी। इसलिए वार्ड चार से बाहर समर्थकों की नब्ज टटोलना शुरू कर दिया है। वीरवार को हाउसिंग बोर्ड, चिन्योट कॉलोनी, एकता कॉलोनी से लेकर कायस्थान मोहल्ले में समर्थकों के साथ मीटिंग की। अब देखते हैं कि सरकार मेयर को कितने अधिकार व शक्तियां देती है। इसके बाद निर्णय लिया जाएगा।
-नरोतामल भटनागर, निर्दलीय पूर्व पार्षद

मेयर की दौड़ में नहीं, वार्ड की सेवा करके ही संतुष्ट
हर कोई खुद को मेयर की दौड़ में बता रहा है, लेकिन अब यह पद पार्षदों के बूते से बाहर हो गया है। तीन विधानसभा क्षेत्रों से जुड़ा होने के कारण राजनीतिक दलों की ज्यादा भूमिका रहेगी मेयर की जीत में। मैं तो अपने वार्ड 21 के लोगों की ही सेवा करके संतुष्ट हूं। वार्ड से पार्षद का चुनाव लडूंगा।
-अनिल कुमार, निवर्तमान पार्षद कांग्रेस

अंग्रेजों के जमाने से रोहतक में शहर की सरकार, पहली बार सीधा होगा मेयर का चुनाव
शहर की सरकार के इतिहास पर नजर डालें तो अंग्रेजों के समय में सबसे पहले 1936 में रघुबीर शरण भटनागर को सचिव लगाया गया था। उस समय कार्यालय बाबरा मोहल्ले में निवर्तमान पार्षद अजय जैन टाटू के मकान के पास होता था। बाद में कार्यालय पालिका बाजार में बना दिया गया। साथ ही 1985 में न केवल नगर पालिका को नगर परिषद का दर्जा दे दिया गया, बल्कि तत्कालीन प्रधान सुंदरलाल सेठी ने अंबेडकर चौक के पास नगर परिषद भवन की आधारशिला रखी। 2010 में नगर परिषद की जगह निगम बनाया गया। 2013 में निगम की पहली निर्वाचित सरकार ने कार्यालय बोहर के बाहर बनाना तय किया, लेकिन 2014 में भाजपा सरकार ने उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया।

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