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संघ के नरम रुख के बाद सरकार ने नहीं रखी कोर्ट में अपनी राय

साल 2015 के आखिरी महीने में संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान भाजपा सांसदों के तीखे विरोध के कारण समलैंगिता के समर्थन में कांग्रेसी सांसद शशि थरूर का निजी विधेयक अस्वीकार हो गया था। संसदीय इतिहास में यह पहला मौका था जब निजी विधेयक पर लोकसभा में मतदान की नौबत आई।

तब भाजपा मुखर रूप से समलैंगिता को आपराधिक श्रेणी में रखने की हिमायती थी। मगर इस घटना के कुछ ही महीने बाद साल 2016 में संघ की ओर से समलैंगिकता पर दिखाई गई नरमी के बाद परिस्थिति बदलती चली गई। बदलाव यहां तक आया कि इस मामले में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी राय रखने के बदले इसे शीर्ष अदालत के विवेक पर छोड़ दिया।

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दरअसल बदलाव की बयार तब बढ़ी जब संघ ने समलैंगिता पर अपना रुख अचानक नरम कर लिया। संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने वर्ष 2016 में यह कह कर सबको चौंका दिया कि समलैंगिकता को अपराध के दायरे में नहीं रखा जाना चाहिए। उनका कहना था कि समलैंगिकता को अपराध के दायरे में रखना उचित नहीं है। संघ निजी जिंदगी में दखल देने में दिलचस्पी नहीं रखता। मैं मानता हूं कि अगर इससे अन्य लोगों का जीवन प्रभावित नहीं होता है तो समलैंगिता के लिए सजा नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि तब भी होसबोले ने इसे अनैतिक और मानसिक बीमारी बताया था।

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संघ के रुख के बाद अचानक सरकार और भाजपा के रुख में भी नरमी दिखाई दी। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने उसी साल समाज में आ रहे बदलावों का हवाला देते हुए समलैंगिता पर नए सिरे से सोचने की वकालत की। इसकेबाद सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपना नजरिया रखने से इंकार करते हुए पूरे मामले को शीर्ष अदालत के विवेक पर छोड़ दिया।

गौरतलब है कि इससे पूर्व दशकों तक संघ परिवार और भाजपा का रुख समलैंगिकता के खिलाफ बेहद मुखर रहा था। ये सभी इसे अप्राकृतिक और संस्कृति के खिलाफ बताते हुए इसे अपराध की श्रेणी में रखने की पुरजोर वकालत करते आ रहे थे। करीब पांच वर्ष पूर्व जब सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिता को अपराध के दायरे से हटाने संबंधी दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटा था तब भी भाजपा ने इसका समर्थन किया था।

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