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सही संख्या जानने के लिए दोबारा सर्वे करा सकती है सरकार

केंद्र सरकार ने 18 राज्यों के 150 से ज्यादा जिलों में हाथ से मैला ढोने वालों की संख्या का पता लगाने के लिए सर्वे कराने का फैसला किया है। सरकार के पहले सर्वे में 53 हजार लोगों ने सामने आकर खुद को मैला ढोने वाला बताया था।

राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त व विकास निगम ने नोडल एजेंसी के तौर पर सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के लिए पहला सर्वे किया था, जिसमें 20 हजार से ज्यादा लोगों का संज्ञान लिया था। प्रथम चरण में 170 जिलों को चिन्हित किया गया था, वहीं दूसरे चरण में 156 जिलों में यह सर्वे किया जाएगा। निगम के सूत्रों का कहना है कि दूसरे चरण में उन राज्यों के नए जिलों को भी शामिल किया गया है, जो प्रथम चरण में शामिल थे। इसके अलावा नए चरण में हिमाचल प्रदेश और उड़ीसा जैसे नए राज्यों को भी शामिल करने की योजना है।

प्रथम चरण में जिन राज्यों को शामिल किया गया था, उनमें उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, केरल, पश्चिमी बंगाल, तेलंगाना, असम, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू, बिहार और जम्मू-कश्मीर शामिल थे। हालांकि इनमें से कुछ राज्यों को दूसरे चरण में भी सामिल किया गया था। सूत्रों का कहना है कि दूसरे चरण को पूरा होने में पांच से छह माह का वक्त लग सकता है। लेकिन यह कब से शुरू होगा इसके बारे में अंतिम फैसला होना अभी बाकी है।

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हाथ से मैला ढोने वालों के पुनर्वास अधिनियम, 2013 के तहत नाले-नालियों और सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिए रोजगार या ऐसे कामों के लिए लोगों की सेवाएं लेने पर प्रतिबंध है। इन शौचालयों से मैला ढोने वाले कर्मियों की पहचान कर उनके वैकल्पिक व्यवसाय के साथ उन्हें पुनर्वासित किया जाएगा। सरकार ने मैला ढोने वाले कर्मियों को एकमुश्त 40 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि देने का वायदा किया है। सरकार ने 1359 मैला ढोने वाले कर्मियों की पहचान करके यह राशि सीधे उनके बैंक खातों में डालने की प्रक्रिया शुरु कर दी है।

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सफाई कर्मचारी आंदोलन के संस्थापक और मैगसेसे पुरस्कार विजेता बेजवाड़ा विल्सन कहते हैं कि 1993 में देश में मैला ढोने की प्रथा खत्म करने को लेकर पहला कानून आया था, लेकिन दो राष्ट्रीय कानून तथा कई अदालतों के आदेश के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यहां तक कि मैला ढोने और सीवर श्रमिकों के पुनर्वास और क्षतिपूर्ति की नीतियां भी ज्यादा सफल नहीं हुई हैं।

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