Friday , September 21 2018
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एफएसएसएआई का मानना है कि शाकाहारी हैं दूध में मिलाए जाने वाले ये तत्व

दूध में मिलाए जा रहे सुक्ष्म पोषक तत्व विटामिन ए और विटामिन डी पूरी तरह से वेजिटेरियन हैं। साथ ही एफएसएसएआई का कहना है कि विटामिन सिंथेटिक हो या प्राकृतिक शरीर सभी तरह के विटामिन को ग्रहण करने की क्षमता रखता है। वहीं, जल्द दी देश की सभी कॉपरेटिव और निजी डेरियां विटामिन ए और डी मिला दूध बेचना शुरू कर देंगी।

बुधवार को दूध में सुक्ष्म पोषक तत्व मिलाने को लेकर राष्ट्रीय परामर्श कार्यक्रम में बोलते हुए भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) पवन कुमार अग्रवाल का कहना है कि कुछ लोग अफवाह फैला रहे हैं कि दूध में मिलाए जाने वाले विटामिन मांसाहारी हैं। उन्हें इसे बिल्कुल गलत बताते हुए कहा कि ये दोनों की विटामिन पूरी तरह से शाकाहारी हैं और इसे लेकर घबराने की कोई जरूरत नहीं है।

उन्होंने कहा कि दूध में विटामिन डी2 यानी अर्गोकैल्सीफैरोल मिलाया जाएगा, जो पूरी तरह से शाकाहारी है। विटामिन ए की कमी से रतौधीं या नाइट ब्लाइंडनेस की समस्या होती है, वहीं विटामिन डी की कमी से हड्डियां कमजोर होती हैं।

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उन्होंने कहा कि देश की 66 करोड़ आबादी सुक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से जूझ रही हैं और इनमें बच्चों और महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है। इसलिए भारत सरकार ने नीति आयोग, और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय दोनों को ही दूध में सुक्ष्म पोषक तत्व मिलाने को लेकर प्रचार कर रहे हैं।

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वहीं राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने टाटा ट्रस्ट और वर्ल्ड बैंक के साथ मिल कर दूध में पोषक तत्व मिलाने को लेकर साझेदारी की है। देश में इन दिनों रोजाना तकरीबन 78 लाख लीटर दूध में सुक्ष्म पोषक तत्व मिलाए जा रहे हैं, जिनमें 24 कॉपरेटिव और 15 प्राइवेट डेयरियां हैं।

अग्रवाल के मुताबिक हमारे शरीर के लिए ताजे प्राकृतिक दूध से बेहतरीन कुछ नहीं है, लेकिन हर किसी को यह नसीब नहीं हो पाता। प्रोसेस के दौरान दूध में मौजूद सभी सुक्ष्म पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, जिसके चलते लोगों में कुपोषण की समस्या बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि विटामिन ए और डी दोनों ही वसा में घुलनशील विटामिन हैं।

उन्होंने कहा कि प्रचार किया जा रहा है कि प्राकृतिक के मुकाबले सिंथेटिक विटामिंस शरीर के लिए नुकसानदेह हैं, जो कि पूर्णतया गलत है। अग्रवाल का कहना है कि मानव शरीर सभी तरह के विटामिंस को ग्रहण करने की क्षमता रखता है और यह वैज्ञानिक अध्ययनों में इस बात की पुष्टि हुई है कि शरीर पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है।

सीईओ अग्रवाल ने बताया कि दुनिया में दूध में सुक्ष्म पोषक तत्व मिलाने की शुरूआत सबसे पहले डेनमार्क में 1918 में हुई थी, जिसके बाद 1923 में पूरे यूरोप में यह फैल गया। उन्होंने बताया कि भारत में 1950 में हिमाचल के कांगड़ा में फूड फोर्टिफिकेशन की शुरूआत हुई जब पूरे राज्य में गोइटर या घेंघा रोग फैल गया, जिसके बाद नमक में आयोडीन मिलाने की पहल हुई।

वहीं 1997 में केन्द्र सरकार ने नमक में आयोडीन मिलाना जरूरी कर दिया। अग्रवाल ने जोर देते हुए कहा कि दूध में सुक्ष्म पोषक तत्व मिलाने को अगले 100 सालों के लिए नहीं टाला जा सकता, जैसा कि आयोडीन के मामले में हुआ।

वहीं अग्रवाल ने बताया कि प्रचार किया जा रहा है कि दूध में सुक्ष्म पोषक तत्व मिलाने के बाद दूध की कीमतें बढ़ जाएंगी, जो सरासर गलत है। उन्होंने बताया कि दूध में फोर्टिफिकेशन के बाद मात्र 3 से 4 पैसा प्रति लीटर की लागत बढ़ी है, जिसे कंपनियां खुद ही वहन कर रही हैं।

अग्रवाल का कहना है कि वैज्ञानिक पैनल ने विटामिन की मात्रा तय की है, जो हमारी रोजाना के आरडीए यानी रिकमेंडिड डायटरी एलाउंस के कम रखा गया है। दूध में विटामिन ए की मात्रा 770 माइक्रोग्राम प्रति लीटर और विटामिन डी की मात्रा 550 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तय की गई है।

मदर डेयरी के प्रबंध निदेशक संजीव खन्ना ने बताया कि टोकन मिल्क यानी डीएमएस में 1984 में ही विटामिन ए मिलाने की शुरूआत कर दी गई थी, वहीं फुल क्रीम को छोड़ कर टोंड और डबल टोंड दूध में सुक्ष्म पोषक तत्व मिलाए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि रोजाना 30 लाख लीटटर मदर डेयरी के दूध में सुक्ष्म पोषक तत्व मिलाए जा रहे हैं।

टाटा ट्रस्ट के सीनियर एडवाइजर विवेक अरोड़ा ने कहा कि देश की एक तिहाई आबादी पोषक तत्वों की कमी से जूझ रही है। 6 साल से कम आयु वाले 57 फीसदी बच्चों को विटामिन ए यानी नाइट ब्लाइंडनेस की समस्या है, वहीं 69 प्रतिशत बच्चे और महिलाएं प्रजनन की अवस्था में एनिमिया से परेशान हैं। जबकि देश की 70 फीसदी आबादी में विटामिन डी की कमी है। उन्होंने बताया कि दूध हमारी रोजमर्रा की जरूरत है, अतः सुक्ष्म पोषक तत्व मिलाने के लिए इससे अच्छा कुछ नहीं है।

गौतलब है कि कुछ दिन पहले ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संगठन स्वदेशी जागरण मंच ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिख कर फूड फोर्टिफिकेशन पर रोक लगाने की मांग की थी। मंच का कहना था कि फोर्टिफिकेशन में मिलाए जाने वाले जरूरी पोषक तत्व को पशुओं से तैयार किए जाएंगे, जो धार्मिक मान्यताओं और शाकाहारियों के खिलाफ है।

स्वदेशी जागरण मंच का कहना है कि फोर्टिफिकेशन को लेकर टाटा ट्रस्ट, ग्लोबल अलायंस फॉर इंप्रूव्ड न्यूट्रिशियन (गेन), बिल एंड मिंलिडा गेट्स फाउंडेशन, क्लिंटन हेल्थ इनिशिएटिव, फूड फोर्टिफिकेशन इनिशिएटिव एंड न्यूट्रिशनल इंटरनेशनल और इंटरनेशनल लाइफ सांइसेज इंस्टीट्यूट जैसे संस्थानों और कंपनियों के अपने निजी हित शामिल हैं।

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