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गुरु की प्रेरणा से इन इस्तियों ने पाया सफलता का मुकाम

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय, बलिहारी है गुरु आपने, गोविंद दियो बताय। कबीरदास जी का यह दोहा गुरु की महत्ता बताने का मात्र एक उदाहरण है। आज समाज के प्रतिष्ठित पदों पर आसीन व्यक्तियों ने यह मुकाम पाने के लिए काफी संघर्ष किया था। उन्हें असफलता के अंधेरे के बीच से उम्मीद की किरण और आगे बढ़ने की राह दिखाने वाले अवश्य ही उनके गुरु ही रहे होंगे। ऐसे लोग आज भी अपने गुरु का आभार जताना नहीं भूलते। आज शिक्षक दिवस पर हम ऐसे ही कुछ प्रतिष्ठित लोगों के अनुभव साझा कर रहे हैं, जो सफलता के मुकाम तक पहुंचने का श्रेय गुरु को ही देते हैं।…

पिता ने दी संघर्ष की शिक्षा
हम सभी भाई-बहनों के लिए मेरे पिता जनार्दन प्रसाद बलूनी सबसे पहले गुरु थे। कम पढ़ा-लिखा होने के बावजूद वह पढ़ाई का महत्व समझते थे। यही कारण है कि पौड़ी के दूरस्थ बागी गांव से वह हमें रुड़की लेकर आए। फौज में रहने के कारण वह अनुशासित जीवन जीते थे। उन्होंने हमें भी अनुशासन और कड़ी मेहनत का पाठ पढ़ाया। वह हमेशा संघर्ष जारी रखने और हार न मानने की शिक्षा देते थे। 1992 में जब मैंने सीपीएमटी क्वालिफाई किया और एमबीबीएस करने आगरा गया, तो उन्होंने कहा कि तुम्हें समाज के लिए काम करना है। वह आज भी हम सब भाई-बहनों के मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहे हैं।

नौकरी छोड़ो, अपना काम करो
पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने एमआर के तौर पर काम करना शुरू कर दिया। पढ़ा-लिखा होने के बावजूद मजबूरी में मुझे यह काम करना पड़ रहा था। तब दूरसंचार विभाग के वित्त अधिकारी दिगंबर प्रसाद रुड़ोला ने मुझे अपना उद्योग लगाने के लिए प्रेरित किया। वह लगातार मुझे हौसला देते। एक बार उन्होंने मुझे अपने पास बैठाया और कहा तुम किस चीज से डर रहे हो। उद्योग लगाने के बाद काम नहीं चलेगा तो वापस नौकरी कर लेना। डरते-डरते मैंने देहरादून में अपना उद्योग लगाने की शुरुआत की। लगातार मेहनत और संघर्ष के बाद धीरे-धीरे कारोबार आगे बढ़ना लगा। मुझे लगता है मेरे जीवन में उनसे मिली शिक्षा का सबसे अहम योगदान रहा।

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स्काई इज लिमिट फॉर यू 
मेरी पढ़ाई नैनीताल की सेंट मैरीज कान्वेंट एकेडमी से हुई। मैं बचपन से ही बेहद नटखट थी। अक्सर शरारतें करती थी। इसके चलते कई बार मुझे डांट भी पड़ती थी। करीब आठ साल की उम्र में एक बार मैं शरारत करते पकड़ी गई। शिक्षक ने मुझे डांट दिया, जिससे मैं उदास हो गई। तब मुझे बेहद पसंद करने वाली आयरिश सिस्टर जोजफीन ने मुझे काफी देर तक समझाया। उन्होंने मुझसे कहा कि प्रीता तुम चाहो तो सब कुछ हासिल कर सकती हो। तुम्हारे लिए आकाश की ऊंचाईयां भी कम हैं। बस अपने अंदर झांको और सही दिशा में आगे बढ़ो। उनके इन शब्दों ने मेरा नजरिया बदल दिया। बाद में दिल्ली और इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान उनके शब्द हमेशा मुझे संबल देते रहे। नौकरी के दौरान भी उनकी शिक्षा ने मुझे हमेशा आगे बढ़ने को प्रेरित किया।

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गुरु की प्रेरणा से ही आज मैं इस जगह पर हूं

गुरु का स्थान माता-पिता से भी ऊपर बताया जाता है। इसे हम जीवन के हर मोड़ पर महसूस करते हैं। माता-पिता के अलावा गुरु ही हमें सही और गलत का अहसास कराता है। जिससे हम आगे बढ़ पाते हैं। सिर्फ पढ़ाई के दौरान ही नहीं बल्कि करियर में भी हमारे कई गुरु होते हैं। मगर इनमें किसी एक का स्थान सर्वोपरि होता है। ऐसे ही राजस्थान में शुरुआती पढ़ाई के दौरान हमारे गुरु रहे हैं हरदयाल सिंह यादव। मैं बहुत छोटे क्षेत्र से ताल्लुक रखता हूं, वहीं पर हरदयाल गुरुजी हमें पढ़ाते थे। उसी दौरान उन्होंने कहा था कि हर व्यक्ति को अपने जीवन में बड़ा बनने का प्रयास करना चाहिए। उनकी बातें ऐसी थीं कि उनके बारे में हम रात-दिन सोचते थे। उन्हीं की प्रेरणा से आज मैं इस जगह पर हूं। गुरु की महत्ता को मैने खुद भी गुरु रहते समझा है। एमएससी की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने अपने करियर की शुरुआत भी गुरु के रूप में ही की थी। मैने भी एक डिग्री कॉलेज में बतौर शिक्षक काम किया है।

गुरुजनों की प्रेरणा से पाया ऊंचा मुकाम 
वैसे तो मेरी जिंदगी को संवारने और तस्वीर बदलने में माता-पिता के साथ परिवार के सभी सदस्यों का अहम योगदान रहा, लेकिन जिंदगी में आगे बढ़ने और कुछ कर गुजरने की प्रेरणा दो गुरुओं ने दी। जब मैं सहरसा के गवर्नमेंट हाईस्कूल में था तो प्रधानाचार्य व मेरे आदर्श गुरु गंगा सिंह ने मुझे पढ़ाई के प्रति प्रेरित किया। उन्होंने कहा था कि तुम प्रतिभाशाली हो और प्रतिभा का अधिकतम इस्तेमाल कर जिंदगी में ऊंचाइयां हासिल कर नई मिसाल कायम करो। मेरी जिंदगी संवारने में मेरे कालेज के गुरु प्रो. सी भक्तो ने भी अहम भूमिका निभायी। प्रो. सी भक्तो ने इंटर व बीएससी के दौरान पढ़ाने के साथ ही भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी बनने के लिए प्रेरित किया। इन दोनों गुरुआें ने प्रेरित किया कि मै भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी करूं। दोनों गुरुओं की प्रेरणाओं में मुझे आगे बढ़ने का हौसला दिया। आज जिंदगी में जो कुछ भी हूं, उसमें मेरे इन गुरुओं का योगदान सबसे अधिक है। यह ऋण जीवनपर्यंत नहीं चुकाया जा सकता है।

युवा क्रिकेटरों की पौध तैयार कर रहे मनोज
उत्तराखंड ही नहीं देश के कई राज्यों की टीम में खेल रहे क्रिकेटरों के लिए मनोज रावत किसी द्रोणाचार्य से कम नहीं है। बीसीसीआई लेवल-टू कोच मनोज से क्रिकेट का ककहरा सीखकर अब तक पांच दर्जन से ज्यादा क्रिकेटर अलग-अलग राज्यों की टीम में जगह बना चुके हैं। कभी मनोज के शार्गिद रहे रवि नेगी भी उनके नक्शे कदम पर चलते हुए युवा क्रिकेटरों की पौध तैयार कर रहे हैं। मूलत: अल्मोड़ा निवासी मनोज रावत का जन्म देहरादून में ही हुआ। यहीं पढ़ाई करने के बाद उन्होंने क्रिकेट सीखना शुरू किया। पिता स्व. बीएस रावत खुद भी क्रिकेट के शौकीन थे। उन्होंने मनोज को खेलने के लिए प्रोत्साहित किया। कॉलेज स्तर पर खेलने के दौरान ही उन्होंने गुजरात में एनआईएस क्रिकेट के लिए फॉर्म भरा, जिसमें उनका चयन हो गया। इसके बाद उन्होंने विधिवत रूप से कोचिंग की शुरूआत की। उनकी कोचिंग में कई खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया, जिससे उन्हें हौसला मिला। 2009 में उन्होंने बीसीसीआई लेवल-वन कोचिंग उत्तीर्ण किया। छत्तीसगढ़ से लेवल-टू कोर्स करने के बाद उन्हें विज्जी ट्रॉफी के लिए नॉर्थ जोन का कोच नियुक्त किया गया। इसके बाद उन्हें कई अन्य स्तरों पर कोचिंग की जिम्मेदारी सौंपी गई। मनोज रावत की कोचिंग में अब तक 60 से अधिक खिलाड़ी रणजी ट्रॉफी और अन्य स्तरों की क्रिकेट टीमों में जगह बना चुके हैं।

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