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एशियन गेम्स में जीता मेडल, अब दोबारा चाय बेचने को मजबूर हुआ यह खिलाडी

इंडोनेशिया के जकार्ता और पालेमबांग में संपन्न हुए एशियाई खेलों में भारत ने इतिहास रच दिया। 15 गोल्ड, 24 सिल्वर और 30 ब्रॉन्ड मेडल के साथ यह एशियन गेम्स के इतिहास में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था।

जहां एक ओर देश का नाम रौशन करने वाले खिलाड़ियों को संबंधित राज्य सरकार नाम-सम्मान के साथ भारी भरकम इनामी राशि से उत्साहवर्धन कर रही तो कुछ एथलीट ऐसे भी हैं जो अब तक गुमनामी में जिंदगी बसर करने को मजबूर हैं।

दिल को झकझोर देने वाली यह कहानी है दिल्ली के हरीश कुमार की। मजनू का टीला में चाय की एक दुकान चलाने वाले ने अपने हौसलों की उड़ान से एशियन गेम्स में पदक जीत देश का नाम तो बढ़ाया, लेकिन अब दोबारा उनकी जिंदगी उसी चाय की दुकान पर कट रही है।

हरीश ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाली सेपकटकरा टीम का हिस्सा थे। 23 साल का यह होनहार खिलाड़ी अपनी टीम (हरीश, संदीप, धीरज, ललित) के साथ इंडोनेशिया से मेडल जीतकर शुक्रवार सुबह स्वदेश लौटा। दिल्ली के इन खिलाड़ियों का स्वागत करने सरकार की ओर से कोई नहीं पहुंचा था।

इतना ही नहीं इन्हें एयरपोर्ट से लाने के लिए बस तक का इंतजाम नहीं था, लोगों ने चंदाकर बस का इंतजाम किया। बस स्टार्ट होते ही बंद हो गई , फिर खिलाड़ियों ने ही इसे धक्का मारकर स्टार्ट किया था।

घर लौटकर भी कुछ घंटे जश्न का माहौल रहा। शाम होते-होते नजारा बदल गया। हरीश रोज की तरह अपनी उस चाय की दुकान पर ग्राहकों की जी-हुजूरी करने में जुट गया। जिससे उनके घर का गुजारा होता है।

कैसे हुई शुरुआत?

हरीश बताते हैं कि बचपन में दोस्तों के साथ टायर को कैंची से काटकर खेला करते थे। इस खेल में पैरों को ज्यादा से ज्यादा ऊपर उठाना होता था। एक दिन हम पर कोच हेमराज की नजर पड़ी। उन्होंने बुलाकर सेपक टकरा के बारे में बताया और फिर सिलसिला चल निकला।

हरीश की एशियन गेम्स में मेडल जीतने की कहानी इतनी आसान नहीं जितनी दिखाई देती है। घर की स्थिती खराब है। परिवार बड़ा और कमाई कम। पिता जी ऑटो चलाते हैं। ऐसे में एक दिन पिता जी ने भी कह दिया कि खेल छोड़कर दुकान में हाथ बंटाओ।

हरीश को इस असमंजस से कोच हेमराज और बड़े भाई नवीन ने निकाला। नवीन खुद भी सेपक टकरा खेलते थे। उन्होंने परिवार को मनाया। हरीश की दोनों बहनें ब्लाइंड हैं। कोच हेमराज ने हरीश को स्टेडियम आने-जाने का किराया देना शुरू किया। अपनी मेहनत के दम पर हरीश पहले स्टेट, फिर नेशनल खेलने लगे। साई और फेडरेशन से भी अहम मदद मिली।

हरीश ने बताया कि पिछले कई सालों से उनका रूटीन तय है। वे सुबह भाई के साथ या कभी-कभी अकेले ही चाय की दुकान चलाते हैं। उनकी प्रैक्टिस दोपहर 2 बजे से शाम 6 बजे तक स्टेडियम जाकर प्रैक्टिस करते हैं। सुबह जब हरीश चाय की दुकान पर होते हैं, तब पिताजी किराए का ऑटो चलाते हैं, ताकि थोड़ा ज्यादा कमाया जा सके।

क्या होता है सेपक टकरा ?

सेपक टकरा, मलय और थाई भाषा के दो शब्द हैं। सेपक, मलय का शब्द है, जिसका अर्थ किक लगाना है। टकरा का मतलब हल्की गेंद है। यह भारत के नॉर्थ ईस्ट में लोकप्रिय है। जो वॉलीबॉल, फुटबॉल और जिम्नास्टिक का मिश्रण है। इस खेल को इंडोर हाल में 20 गुणा 44 के आकार की जगह में सिंथेटिक फाइबर की गेंद से इस खेल को खेला जाता है।

इस खेल में गेंद को वॉलीबॉल की तरह नेट के दूसरे पार भेजना होता है, लेकिन इसके लिए खिलाड़ी सिर्फ पैर, घुटने, सीने और सिर का ही इस्तेमाल कर सकता है। हाथ से गेंद को नहीं छुआ जा सकता। यह खेल दो प्रकार से खेला जाता है।

पहला टीम इवेंट होता है, जिसमें 15 खिलाड़ी होते हैं, दूसरा रेगू इवेंट होता है, इसमें 5 खिलाड़ी इस खेल में शामिल होते हैं। एशियाई खलों में भारत 2006 से इस खेल में भाग ले रहा है, लेकिन पहली बार कोई पदक हाथ आया है।

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