Friday , April 19 2019
Loading...

जानें कैसे 14 साल की उम्र में पवन कुमार बन गए थे संत

जैन मुनि तरुण सागर का शनिवार तड़के निधन हो गया है। वह 51 साल के थे। 20 दिन पहले उन्हें पीलिया हुआ था, जिसके कारण वह बहुत कमजोर हो गए थे। सेहत में सुधार ना होने की वजह से उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया था। उनका असली नाम पवन कुमार जैन था। मध्यप्रदेश के दमोह जिले के गुहजी गांव में उनका जन्म 26 जून 1967 को हुआ था। उनकी माता का नाम शांतिबाई जैन और पिता का नाम प्रताप चंद्र जैन था। कहा जाता है कि उन्होंने 14 साल की उम्र में 8 मार्च 1981 को घर छोड़ दिया था। उनकी शिक्षा दीक्षा छत्तीससगढ़ में हुई।

अपने क्रांतिकारी प्रवचनों की वजह से तरुण सागर को क्रांतिकारी संत का तमगा मिला हुआ था। उन्हें मध्यप्रदेश शासन ने 6 फरवरी 2002 को और गुजरात सरकार ने 2 मार्च 2003 को राजकीय अतिथि का दर्जा दिया था। जैन मुनि ने कड़वे प्रवचन नाम से एक बुक सीरिज शुरू की थी। जिसके लिए वह काफी चर्चित रहते थे। उन्होंने कहा था कि यदि कोई शख्स तुम्हारी वजह से दुखी होता है तो समझ लो यह तुम्हरे लिए सबसे बड़ा पाप है। ऐसे काम कोर जिससे लोग तुम्हारे जाने के बाद दुखी होकर आंसू बहाएं, तभी तुम्हें पुण्य मिलेगा।

जैन मुनि बिना वस्त्रों के घूमा करते थे। वह सांसारिकता के बीच रहकर भी लोगों को अध्यात्म के दर्शन कराते थे। रोजमर्रा के जीवन में आने वाले घुमावदार पड़ावों और उनकी चुनौतियों से जूझने के बेहद आसान तरीके जो उनके पास था उन्हें लोगों को मुहैया करवाता थे। उनके शब्दों और वाणी में एक आग थी। इस आग की वैचारिक अभिव्यक्ति का दायरा उन्हें जैन समाज के दायरे से बाहर निकालकर उनकी दुनिया को व्यापक बना देता था।

आज दोपहर 3 बजे दिल्ली मेरठ हाइवे पर स्थित तरुणसागरम तीर्थ में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। यात्रा सुबह 7 बजे राधेपुरी दिल्ली से प्रारंभ होकर 28 किलोमीटर दूर तरुणसागरम पर पहुंचेगी।

loading...