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दलितों का मिर्चपुर सही था

विकास कुमार
मल्टीमीडिया जर्नलिस्ट आजतक डिजिटल
आठ साल बाद ही सही, लेकिन हरियाणा के मिर्चपुर कांड में कोर्ट का फैसला आ चुका है. बीते शुक्रवार को दिल्ली हाइकोर्ट ने इस मामले में एससी-एसटी एक्ट के तहत सभी 20 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनायी. आठ साल बाद जब फैसला आया, तो कई पत्रकार पूछते पाये गये कि ये मिर्चपुर कांड था क्या? हुआ क्या था और कैसे हुआ था? जल्दी-जल्दी में गूगल किया गया और मिर्चपुर कांड के बारे में जानकारियों की झड़ी लग गयी. गूगल बता रहा था कि 2010 में हरियाणा के मिर्चपुर कांड में दलितों पर हमले किये गये थे, दो दर्जन से अधिक दलितों के घर जला दिये गये थे.
लेकिन, मेरे लिए यह एक जानकारी भर नहीं थी. मिर्चपुर का नाम आते ही याद आया वह बड़ा सा फाॅर्म हाउस, जिसमें कई दलित परिवार अपना गांव छोड़कर रह रहे थे. मक्खियों और मच्छरों के बीच बड़े हो रहे वे बच्चे, जिन्हें उनके मां-बाप ने जान पर खेलकर बचा लिया था. वे जवान आदमी, जो काम की तलाश में जाते तो थे, लेकिन जिन्हें आसपास के गांवों-शहरों में काम नहीं मिलता था. वे बूढ़े-बुढ़िया जिनकी पानीदार आंखों को उस दिन की कहानी दर्ज थी, जब गांव के जाटों ने उनके टोले को घेरकर आग के हवाले कर दिया था. अप्रैल 2010 में हुआ था मिर्चपुर. बतौर पत्रकार मैं 2014 में मिर्चपुर गया था. उस फाॅर्म हाउस में भी, जहां मिर्चपुर के दलित परिवार शरण लिए हुए थे और उस गांव में भी, जहां यह घटना हुई थी. तब मन में एक ही सवाल था कि चार साल बाद क्या कुछ बचा होगा, जिसे देखा-समझा जा सकता है? लेकिन हिसार के पश्चिमी छोर पर स्थित विशाल फॉर्म हाउस में जब हम पहुंचे, तो लगा कि घटना आज भी लोगों के मन में जस-की-तस दर्ज है. वहां हमारी मुलाकात उन दलित परिवारों से हुई, जिन्होंने घटना के बाद मिर्चपुर छोड़ दिया था. दलितों के अस्सी परिवार आज भी इसी फाॅर्म हाउस में रह रहे हैं. जब हम सूबे सिंह से मिले थे, तभी मिर्चपुर कांड का मतलब समझ पाये थे. आपको भी सूबे सिंह से मिलवाता हूं, शायद आप मिर्चपुर का असली मतलब समझ पायें. साल 2010 में 21 अप्रैल का वह दिन. सुबह-सुबह मिर्चपुर गांव में स्थित वाल्मीकि बस्ती को गांव के जाटों ने घेर लिया था. सूबे सिंह उस रात अपने घर की छत पर सोये हुए थे. सुबह जब उन्होंने इस घेरेबंदी को देखा, तो छत से नीचे उतरने की बजाय सीढ़ी की कुंडी बंद करके छत पर ही एकांत में दुबक गये. बाहर हजारों की संख्या में मौजूद जाटों की भीड़ आक्रामक होती जा रही थी. बूढ़े सूबे सिंह दुबक कर छत के एक कोने में अपने भगवान को याद कर रहे थे. साढ़े दस बजते-बजते इस उन्मादी भीड़ ने घरों के ऊपर मिट्टी का तेल और डीजल छिड़ककर उनमें आग लगाना शुरू कर दिया. आग में घिरा एक घर सूबे सिंह का भी था. जब लपटें ऊपर उठने लगीं, तब सूबे सिंह जान बचाने के लिए चिल्लाने लगे. उनकी आवाज सुनकर उन्मादी भीड़ के कुछ लोग छत से उन्हें घसीटते हुए नीचे ले आये और उनके ऊपर भी मिट्टी के तेल से भरा कनस्तर उड़ेल दिया. यह सब गांव के सामने हो रहा था. सूबे सिंह की जान खतरे में देखकर कुछ वाल्मीकि युवकों ने उन्हें बचाया.बस्ती के बाकी दूसरे घर भी जलने लगे थे. इन्हीं में एक घर बजुर्ग ताराचंद का था, जो अपनी 18 साल की विकलांग बेटी सुमन के साथ घर पर ही छूट गये थे. भीड़ ने उन्हें जलाकर मार दिया था. घटना के चार साल बाद जब पीड़ित दलित परिवार यह वृत्तांत हमें सुना रहे थे, तो हम मिर्चपुर का मतलब ठीक-ठीक समझ पाये थे. अभी और समझना बाकी था. फाॅर्म हाउस से हम उस गांव में पहुंचे, जहां जातीय हिंसा का यह चक्र चला था. जब हम वहां पहुंचे, तो लगा कि हम किसी अति सुरक्षा वाली जगह पर आ गये हैं. सामने एक मैदान में सीआरपीएफ के जवानों का कैंप था. वाल्मीकि टोले के पास बंकर बने हुए थे, जिसमें सीआरपीएफ के जवान खड़े थे. शासन अपनी नाक बचाने के लिए दलित परिवारों को सुरक्षा दे रही थी, ताकि सब ठीक होने की वे गवाही दें. जब हम बस्ती में घूम रहे थे, तब नाली साफ करता एक जाट बुजुर्ग देश-समाज का कचरा करने के लिए पत्रकारों को गाली दे रहा था. जले हुए घरों के अवशेष चार साल बाद भी ज्यों-के-त्यों थे. अब बारी थी जाटों के मिर्चपुर को देखने-समझने की. गांव की सरपंच कमलेश कुमारी जाट परिवार से थीं. बड़े से घर के आगे एक छोटा-सा दालान था. वहां कुछ लड़के बैठे हुए थे. जब हमने सरपंच जी के बारे में पूछा, तो एक आदमी ने कहा- हां पत्रकार साहब, कहो के बात है?हमने कहा कि आप ही कमलेश कुमारी हैं? तो बगल वाले लड़के ने बीच में काटते हुए कहा- ये उनके पति हैं, आप बात कहो?थोड़ी हो-हुज्जत के बाद कमलेश कुमारी आयीं, लेकिन बोलीं कुछ नहीं. बोले उनके पति जो एक दिन पहले ही जेल से छूटकर आये थे. बोले वे लड़के भी, जो वहां बैठे थे.उनके मुताबिक यह कोई घटना ही नहीं थी. मीडिया वालों ने बना दी, क्योंकि दलितों का पक्ष लेने में मीडिया को मजा आता है. उनके मुताबिक दलितों ने अपने घर में खुद ही आग लगायी थी और कोई पलायन नहीं हुआ था. तब भी जाटों के लिए मिर्चपुर इतना-सा ही था और उम्मीद है आज भी इतना ही होगा. मिर्चपुर से लौटते हुए दोनों पक्षों को रखने की मजबूरी थी. कभी-कभी लगता था कि अगर जाटों की बात सही हुई तो? लेकिन, अब मोहर लग गयी है कि दलितों का मिर्चपुर सही था, जाटों का गलत.

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