X
    Categories: लेख

बिहार की जरूरत है विशेष दर्जा

राघव शरण पांडेय
सदस्य, बिहार विधानसभा एवं पूर्व पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस सचिव,
भारत और चीन पूरी दुनिया के बरक्स बेहतर गति से प्रगति कर रहे हैं और इन देशों के पास बहुसंख्या में युवा हैं. क्रय शक्ति क्षमता के लिहाज से क्रमशः चीन, अमरीका और भारत आज दुनिया की तीन सबसे प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं हैं. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार, ‘भारत की अर्थव्यवस्था एक ऐसा हाथी है, जो दौड़ना शुरू कर चुकी है.’ लेकिन, भारत की जनसंख्या के 10 प्रतिशत हिस्सेदार, तीसरे बड़े राज्य बिहार की कहानी अलग है. ईसा पूर्व की छठीं सदी से लेकर 1000 ईस्वी के कालखंड में, खासकर मौर्य एवं गुप्त राजवंश के दौरान, बिहार सत्ता, शिक्षा और संस्कृति का केंद्र था. अब सवाल यह है कि जब भारत अपने गौरव को फिर हासिल कर रहा है, तो ऐसी सूरत में बिहार कहां खड़ा मिलेगा? आज बिहार, भारत के अन्य राज्यों में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय वाला राज्य है. बिहार की प्रति व्यक्ति आय 35,590 रुपये (2016-17) है, जो 1,03,870 रुपयेध् व्यक्ति की राष्ट्रीय औसत का तीसरा हिस्सा है. सन् 1960 में सबसे गरीब बिहार की तुलना में सबसे अमीर राज्य की प्रति व्यक्ति आय दोगुनी थी, जो अब पांच गुनी हो गयी है. आईडीएफसी के एक अध्ययन के अनुसार, भारत के तीन सबसे अमीर राज्यों की प्रति व्यक्ति आय, तीन सबसे गरीब राज्यों की तुलना में 1960 के 150 प्रतिशत से बढ़कर 300 प्रतिशत ज्यादा हो गयी है. यह तेजी 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद बढ़ी है. इसके विपरीत, 1975 से 2015 के दौरान चीन में क्षेत्रीय असमानता आधी हो गयी है. वर्ष 2009 के बाद, नीतीश कुमार के नेतृत्व में, बिहार ने 11 प्रतिशत की सर्वाधिक विकास दर देखी है. बिहार का जनसंख्या घनत्व 1100 व्यक्ति, वर्ग किमी से अधिक है, जो देश की औसत से लगभग तीन गुना अधिक है. जनसंख्या में 25 वर्ष से कम आयु वर्ग की हिस्सेदारी 58 प्रतिशत है और जनसंख्या वृद्धि दर भी सर्वाधिक है. इससे स्पष्ट है कि यहां मानव संसाधन विकास के प्रयासों की अधिक आवश्यकता है. बिहार की स्थिति अफ्रीका के माली और चाड जैसे क्षेत्रों की तरह बनी हुई है, जो वैश्विक स्तर पर कहीं नहीं ठहरती. आंकड़ों के अनुसार, अगर वैश्विक आबादी 100 है, तो कम-से-कम 90 लोगों का जीवनस्तर बिहार के एक औसत व्यक्ति से बेहतर है. वहीं 60-70 लोगों का जीवनस्तर एक औसत भारतीय से बेहतर है. इससे यह पता चलता है कि भारत की स्थिति खराब है और बिहार की बेहद खराब.
संतुलित क्षेत्रीय विकास करने के लिए नीतियों में बड़े बदलाव की जरूरत है. वर्ष 1952 में, एक बड़ा हस्तक्षेप औद्योगीकरण के रूप में सस्ते प्राकृतिक संसाधनों वाले अविभाजित बिहार व भारत के कई हिस्सों में शुरू हुआ. लेकिन बिहार को इसका लाभ नहीं मिला. वर्ष 2000 में झारखंड बनने के बाद हालात और भी बदतर हुए हैं. बिहार ने औद्योगीकरण के साधन खो दिये. अब राज्य के पास रोजगार और आर्थिक विकास के लिए संसाधन सीमित हैं. अपने बजटीय संसाधनों को पूरा करने के लिए केंद्र पर बिहार की निर्भरता अधिक है. खराब बुनियादी ढांचे के वजह से बिहार के लिए बाहरी निजी निवेश पाना बहुत मुश्किल है. यह देश और विदेश से निवेशकों को लुभाने के लिए अलग से कोई कार्यक्रम नहीं चला सकता. आर्थिक उदारीकरण ने भी क्षेत्रीय स्तर पर गैर-बराबरी बढ़ायी है. माल और सेवा कर (जीएसटी) जैसी बड़ी नीति ने भी पिछले साल निश्चित रूप से सरकार के समग्र राजस्व को बढ़ाने का मौका दिया था और अंतरराज्यीय व्यापार के लिए बाधाएं भी कम हुई थी. लेकिन राज्यों ने राजकोषीय स्वायत्तता को निवेशकों को लुभाने में खो दिया. निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए नीतीश कुमार ने बिहार को विशेष श्रेणी का दर्जा देने की मांग की. इससे औद्योकीकरण को बढ़ावा देने हेतु निजी निवेश के लिए कर तथा अन्य प्रोत्साहन मिलेगा. इससे राज्य को ऋणमुक्त होने में भी मदद मिलेगी. वर्ष 2017-18 का बिहार का राजकोषीय घाटा जीडीपी के बरक्स 7.5 प्रतिशत पर पहुंच गया है, जो तीन प्रतिशत की स्वीकार्य सीमा से ज्यादा है. तकनीकी रूप से बिहार विशेष श्रेणी का राज्य होने की पात्रता नहीं रखता, लेकिन इसके अंतर्गत आनेवाले राज्यों से यह बदतर स्थिति में है. नियमानुसार, राज्य का भौगोलिक रूप से वंचित और विरल आबादी वाला होना आवश्यक है. पहाड़ी क्षेत्रों में राज्यों को इन शर्तों के तहत अर्हता प्राप्त है, जबकि बिहार के पास यह योग्यता नहीं है.
केंद्र सरकार विशेष श्रेणी का राज्य होने की पात्रता के मानदंडों में संशोधन करने से हिचक रही है. इसके पीछे यह वजह मानी जा रही है कि बिहार को शामिल करने से कई अन्य राज्यों से भी मांग उठ सकती है. कानून-व्यवस्था में सुधार और व्यापार सुगमता के लिए बिहार शासन में व्यापक बेहतरी की आवश्यकता है. लेकिन, विशेष श्रेणी के राज्यों की अवधारणा पर दोबारा गौर नहीं करने की मजबूरियों के बावजूद, केंद्र को पिछड़े राज्यों में निजी निवेश को लुभाने के लिए करों में रियायत देने और एक प्रभावी पैकेज देने के लिए एक नीतिगत ढांचा बनाने की जरूरत है . यही वे जरूरी कदम हैं, जिसे चीन ने अपने मध्य और पश्चिम के पिछड़े प्रांतों के लिए लागू किया था और अब भारत को भी करना चाहिए.
0000
नए विशेष दर्जा राज्यों की कोई संभावना नहीं
डॉ. हनुमंत यादव
गत सप्ताह जर्मनी प्रवास के दौरान कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने बर्लिन में प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए कहा कि आंध्रप्रदेश को विशेष दर्जा राज्य की वहां के लोगों की मांग जायज है क्योंकि उसके गठन के समय भारत सरकार द्वारा इसका वादा किया गया था। उन्होंने मोदी सरकार पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि यदि आंध्रप्रदेश में भाजपा की राज्य सरकार होती तो मोदी सरकार तत्काल विशेष दर्जा दे देती। उन्होंने कहा कि वे आंध्रप्रदेश के लोगों को विश्वास दिलाते हैं कि 2019 में केन्द्र में उनकी सरकार बनते ही वे शीघ्र आंध्रप्रदेश को विशेष दर्जा दे देंगे। प्रवासी भारतीयों के लिए राहुल गांधी के उद्बोधन का कार्यक्रम समुद्र पार निवासी भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा द्वारा किया गया था। संसद के बजट सत्र प्रारंभ होने के बाद से राहुल गांधी ने तेलगु देशम पार्टी के संासदों से भेंटकर उन्हें विश्वास दिलाया था कि आंध्रप्रदेश को विशेष दर्जा राज्य की न्यायोचित मांग का समर्थन करते हैं। वैसे तो तेलगु देशम पार्टी पिछले दो साल से आंध्रप्रदेश को विशेष दर्जा दिए जाने की मांग कर रही थी, किंतु पिछले सात महीनों से उनकी मांग आन्दोलन की शक्ल लेकर उग्र होती गई। संसद के बजट और मानूसन सत्र में तेलगु देशम सांसदों द्वारा हर दिन हंगामा किए जाने के कारण संसद का कामकाज बुरी तरह बाधित हुआ है। चन्द्रबाबू नायडू ने भाजपा सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाकर हुए एनडीए से न केवल संबंध विच्छेद कर लिया बल्कि संसद के मानसून सत्र में अविश्वास प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया। विशेष राज्य दर्जा की मांग करने वाला आंध्रप्रदेश पहला और अकेला राज्य नहीं है, बल्कि अन्य चार राज्य बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और झारखंड भी विशेष दर्जा की मांग कर रहे हैं। इनमें बिहार राज्य की मांग सबसे पुरानी है। आंध्रप्रदेश के समान ही छत्तीसगढ़ राज्य भी अपने गठन के बाद योजना आयोग और राष्ट्रीय विकास परिषद की पहली बैठक 2001 से ही छत्तीसगढ़ को विशेष दर्जा दिए जाने की मांग कर चुके हैं। वर्ष 2000 में जिन तीन नए राज्यों का गठन हुआ था उनमें केवल उत्तराखंड राज्य को ही विशेष दर्जा मिल सका। राज्यों द्वारा विशेष राज्य दर्जा पाने के लिए लालायित रहने का प्रमुख कारण राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा तय की गई भारी भरकम वित्तीय अनुदान एवं अन्य सुविधाएं हैं। विशेष दर्जा राज्य को योजना आयोग के माध्यम से पंचवर्षीय विकास योजनाओं के लिए केन्द्र से वित्तीय सहायता 90 प्रतिशत अनुदान के रूप तथा 10 प्रतिशत ब्याज रहित कर्ज के रूप में उपलब्ध करवाई जाएगी। इसके अलावा विशेष दर्जा राज्यों में स्थापित होने वाले उद्योगों को उत्पाद शुल्क, तटकर शुल्क तथा आयकर में रियायत मिलती है। किंतु विशेष दर्जा राज्य के लिए राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा कड़ी शर्तें निर्धारित किए जाने के कारण विशेष दर्जा प्राप्त करना आसान नहीं था। विशेष दर्जा राज्य के अंतर्गत वित्तीय सहायता पाने के लिए राज्य में दुरूह पर्वतीय क्षेत्र, पड़ोसी देशों से लगी सीमा पर संवेदनशील स्थिति, जनसंख्या का निम्न घनत्व, आर्थिक पिछड़ापन, कमजोर अधोसंरचना तथा बिना केन्द्रीय वित्तीय सहायता के विकास की नगण्य संभावनाएं, ये अहर्ताएं निर्धारित की गई थी ।
1969 में राष्ट्रीय विकास परिषद की सलाह पर केन्द्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर, असम और नगालैंड इन तीन राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा दिया था उसके बाद 35 वर्षों में उत्तर एवं उत्तर-पूर्व स्थित 8 अन्य पर्वतीय राज्यों को भी निर्धारित अहर्ता पूरी करने के कारण विशेष राज्य दर्जा दिया जा चुका है। डॉ. मनमोहन सिंह की यूपीए के केन्द्र में सत्तारूढ़ होने के बाद से ही अनेक पिछड़े राज्यों खासकर बिहार द्वारा विशेष दर्जा राज्य की लगातार मांग की जाती रही। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा केन्द्र सरकार और योजना आयोग से विशेष दर्जा राज्य के मानदंडों का पुनर्निधारण कर बिहार राज्य को विशेष दर्जा की लगातार मांग को देखकर केन्द्र सरकार द्वारा वर्ष 2013 में वित्त मंत्रालय के तत्कालीन प्रमुख सलाहकार डॉ. रघुराम राजन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। राजन समिति से विशेष दर्जा राज्य के मानदंडों की समीक्षा करके उन्हें पुनर्निर्धारण करने तथा नए मानदंडों के आधार पर राज्यों का वर्गीकरण करके राज्यों के नाम सुझाने के लिए कहा गया। राजन समिति ने सितंबर 2013 में सरकार को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में विशेष दर्जा राज्य व्यवस्था समाप्त करने की अनुशंसा की। समिति ने सामाजिक आर्थिक विकास स्थिति के मापन हेतु मानदंड आधार पर राज्यों को पिछड़े राज्य, कम विकसित राज्य एवं अधिक विकसित राज्य इन तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया। राजन समिति ने ओडिशा, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, उत्तरप्रदेश और राजस्थान इन 10 राज्यों को पिछड़े राज्य के रूप में चिन्हित करते हुए उदार केन्द्रीय सहायता का हकदार बताया। राजन समिति ने आंध्रप्रदेश को विकसित राज्यों के वर्ग में रखा था। भारतीय संविधान के लागू होने एवं योजना आयोग की स्थापना के बाद भारत के संघीय ढांचे के अंतर्गत केन्द्रीय सरकार से राज्य सरकारों को धन का हस्तांतरण दो माध्यमों से होता था, पहला राज्य की पंचवर्षीय योजनाओं के वित्तपोषण हेतु योजना आयोग तथा राज्यों के गैर-योजना एवं रखरखाव खर्चों के लिए अंतरण केन्द्रीय वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर होता था। इस प्रकार सरकार के बजट में योजनांतर्गत और गैर-योजनागत दो वर्ग होते थे। वर्तमान में राज्यों की योजनाओं का धनराशि उपलब्ध करवाने वाले योजना आयोग एवं राष्ट्रीय विकास परिषद दोनों ही अस्तित्व में नहीं हैं। 31 मार्च, 2017 को 12वीं पंचवर्षीय अवधि समाप्त होते ही भारत में पंचवर्षीय युग की समाप्ति हो चुकी है। अब सरकारों के बजट में योजना एवं गैरयोजना व्यय का वर्गीकरण समाप्त कर दिया गया है। अब राज्यों को केन्द्र से धनराशि अंतरण केवल केन्द्रीय वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर हुआ करेगा। यही कारण है कि योजना आयोग के भंग होने पर 14वें वित्त आयोग ने केन्द्रीय कोष से राज्यों का हिस्सा 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत कर दिया है। यद्यपि केन्द्र सरकार ने विशेष दर्जा राज्य को समाप्त करने की रघुराम राजन समिति की सिफारिशों पर कोई निर्णय नहीं लिया है, किन्तु भारत सरकार की ओर से वित्तमंत्री अरुण जेटली आंध्रप्रदेश की विशेष दर्जा की मांग के संदर्भ में सार्वजनिक रूप से किसी भी राज्य को विशेष दर्जा दिए जाने की संभावना से इंकार कर चुके हैं। इस प्रकार वर्तमान परिस्थितियों में अब किसी भी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त होने की संभावनाएं समाप्त हो चुकी है।
00000
आम आदमी पार्टी के अंजाम के सबक
कृष्ण प्रताप सिंह
देश की उन सभी राजनीतिक पार्टियों को, जो अनुकूल राजनीतिक प्रवाहों या लहरों पर निर्भर करती हैं, नीतिगत सफलताओं के इंतजार में वक्त गंवाने या बूढ़ी होने के बजाय शीघ्रातिशीघ्र उन्नयन के लिए अपने नेता के व्यक्तिगत करिश्मे में अंधविश्वास की शीघ्र फलदायी व सुभीतों भरी छोटी राह पकड़ लेतीं और निहित स्वार्थों के चक्कर में गैरराजनीतिक या कि अराजक होती भी नहीं लजातीं, आम आदमी पार्टी के इन दिनों के हालात से सबक लेने चाहिए। देश की सबसे पुरानी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस और तेजी से उसकी जगह लेने की आतुरता में उसका ही रूप धारण करती जा रही भारतीय जनता पार्टी को खासतौर से। कांगे्रस को इसलिए कि नेताओं के करिश्मे पर निर्भरता की उसकी महात्मा गांधी के दौर से चली आ रही आदत ने नीतियों के लिहाज से उसे ऐसा अपाहिज बना डाला है कि अपने भीषण दुर्दिन में भी वह उससे परे जाकर पुनर्जीवन की तलाश नहीं कर पा रही। इसी के चलते पिछले चार से ज्यादा सालों के नरेन्द्र मोदी के सत्ताकाल में उससे राहुल गांधी की छापामार टिप्पणियों की मार्फत उन्हें घेरने की कुछ कोशिशों को छोड़ नीति आधारित विपक्ष की भूमिका में उतरना संभव नहीं हुआ है। उलटे वह कई बार उनकी सरकार पर श्नीतियों की चोरी्य के इल्जाम चस्पां करने में भी नहीं हिचकती। भाजपा को इसलिए कि अटलबिहारी वाजपेयी के काल में पहली बार मुंह लगे देश की सत्ता के स्वाद ने अब उसे ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां सत्तालोभ में उसने नरेन्द्र मोदी के रूप में नेताओं के करिश्मे पर निर्भरता का कांगे्रसी रास्ता ही चुन लिया है। अब तो वह इसके लिए अपने उस कैडर की बलि चढ़ाने में भी नहीं हिचक रही, जो विगत में उस पर नीतियों की, वे कितनी भी ओछी क्यों न रही हों, अनुगत होने का दबाव बनाये रखता था। यह और बात है कि उसे अभी भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जकड़बन्दी से आजादी नहीं मिल पाई है और आगे मिल जायेगी, ऐसी उम्मीद भी नहीं ही दिख रही। देश के राजनीतिक इतिहास में बहुत पीछे अन्नादुराई और एमजी रामचंद्रन के दौर तक न भी जायें, तो दक्षिण में एम. करुणानिधि के द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम, जयललिता के अन्नाद्रमुक, एच डी देवगौड़ा के जनतादल सेकुलर, एनटी रामाराव के तेलगुदेशम व के. चन्द्रशेखर राव की तेलंगाना राष्ट्र समिति से लेकर उत्तर-पूर्वी भारत में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी, कांशीराम व मायावती की बहुजन समाज पार्टी, लालू का राष्ट्रीय जनता दल, नीतीश का जनता दल यूनाइटेड और नवीन पटनायक का बीजू जनता दल आदि नेताओं के व्यक्तिगत करिश्मों पर आधारित ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां नजीर हैं कि वे शुरू में वैकल्पिक राजनीति या सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों की थोड़ी-बहुत उम्मीदें भले ही जगाती हैं, इनकी राह पर बहुत दूर नहीं जा पातीं। कुछ ही दूर की यात्रा के बाद उनके विचलन आरंभ होते हैं तो बिना देरी किये वहां तक जा पहुंचते हैं, जहां उन्हें आसमान से गिरने के बाद अटकने के लिए खजूर का पेड़ भी नहीं मिलता। क्योंकि इस बीच ये पार्टियां अपने जातीय या सामाजिक आधार के मौकापरस्त उच्च-मध्यवर्गों की महत्वाकांक्षाओं व स्वार्थों की, जिनमें से ज्यादातर निहित होते हैं, कठपुतली तो बन ही चुकी होती हैं, वंशवाद को अपना अंतिम शरण्य सिद्ध करने को अभिशप्त भी हो चुकती हैं। अभी लोगों को आप के स्थापनाकाल या उससे थोड़ा पूर्व की वे स्थितियां भूली नहीं होंगी, जब उसके नेता अरविन्द केजरीवाल लोकपाल की नियुक्ति की मांग को लेकर आन्दोलनों के क्रम में भ्रष्टाचार के खिलाफ अराजनीतिक लड़ाई का स्वांग करते हुए महायोद्धा बने घूम रहे थे। अन्ना हजारे की असहमति के बावजूद वे अराजनीतिक से राजनीतिक हुए तो उनके करिश्मे ने, और तो और, खुद को समाजवादी और वामपंथी कहने वाले कई दलों के नेताओं कैडरों में भी खलबली मचा दी थी। भाजपा भी इससे कुछ कम विचलित नहीं ही थी। समाजवादी व साम्यवादी कैडरों का एक हिस्सा तो यह भी सोचने लगा था कि लम्बे वक्त के प्राणप्रण से किये गये संघर्ष में भी जो जनविश्वास वे हासिल नहीं कर पाये, उसे आम आदमी पार्टी ने एक झटके में पा लिया। वाकई, श्कुछ अलगश् राजनीति का श्आपश् का झांसा था ही ऐसा आकर्षक कि सामान्य लोगों के लिए उसके प्रति खिंचाव की उपेक्षा करना मुमकिन नहीं हो रहा था। लेकिन इस जनविश्वास की आड़ में कई तरह के मतलबी, महत्वाकांक्षी व स्वार्थी तत्वों का प्रवाह आप की ओर मुड़ा तो वह उसे ठीक से पहचान नहीं सकी और स्वाभाविक ही आगे चलकर उनके ट्रैप में फंसने से नहीं बच सकी। चूंकि उसका कोई तर्कसंगत नीतिगत या लोकतांत्रिक ढांचा था ही नहीं और था भी, तो उसकी आड़ में सब कुछ अरविन्द केजरीवाल के आभामंडल के इर्द-गिर्द ही घूमता था, इसलिए जल्दी ही उसके वे सारे विचलन आम होने लगे, जो मध्यवर्ग की पार्टियों में प्रायरू दिखते हैं। जो श्योद्धाश् परिवर्तन का आलम लिए उसके पास आए थे, वे जल्दी ही संसद की सीटों व दूसरे लाभ के पदों के लिए लड़ने-झगड़ने या उनके बंदरबांट में उलझे दिखने लगे। इस चक्कर में खरीद व बिक्री की तोहमतें भी दूर नहीं ही रखी जा सकीं। फिर तो दिल्ली में थोड़े जनकल्याण के दिखावे के बाद शान व शौकत, बड़े बंगले और गाड़ियों आदि को लेकर अन्यों जैसे तर्कों के बीच पार्टी के आंतरिक लोकपाल योगेन्द्र यादव और ओम्बुड्समैन जैसी हैसियत रखने वाले प्रशांत भूषण भी असह्य हो गये। समय के साथ पार्टी की पंजाब ईकाई में बगावत के बीच इन असहनियों की सूची में शाजिया इल्मी, प्रो. आनंद कुमार, विनोद बिन्नी, कपिल मिश्रा, अंजली दमानिया, मयंक गांधी व एमएस धीर के नाम भी जुड़े। गत अप्रैल में ही दिल्ली संवाद आयोग के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे चुके आशीष खेतान ये पंक्तियां लिखने तक पूरी तरह वकालत करने के लिए अगस्त क्रांतिश् करते हुए पार्टी से बाहर जा चुके हैं तो पत्रकार से नेता बने आशुतोष निजी कारणों से इस्तीफे के बाद बाट जोह रहे हैं कि कब अरविन्द केजरीवाल का उन्हें प्यार करना बंद हो और कब वे कुमार विश्वास की दी आजादी की वह मुबारकबाद स्वीकार कर सकें, जिसमें उन्होंने कहा है कि अब इतिहास शिशुपाल की गालियां गिन रहा है। यहां गौर करने की सबसे बड़ी बात यह है कि पार्टी छोड़ने वाली ये सभी शख्सियतें अरविन्द केजरीवाल की करीबी रही हैं और एक वक्त उन्हें केजरीवाल में कोई खोट नहीं दिखाई देता था। पार्टी के गठन के वक्त से ही वे उनके करिश्मे पर तकिया रखने की गलती नहीं करतीं, उनकी महत्वाकांक्षाओं को बेलगाम होकर उच्चतम बिन्दु तक नहीं जाने देतीं और पार्टी में नीतियों व लोकतांत्रिक ढांचे के निर्माण पर देतीं तो आज केजरीवाल की अलोकतांत्रिक या कि तानाशाही प्रवृत्तियों से यों ठगी हुई महसूस नहीं करतीं। जाहिर है कि आज आप और अरविन्द केजरीवाल बेहिस टकरावों, अराजकता और माफीनामे की राजनीति के पर्याय बन गये हैं तो इसकी कुछ जिम्मेदारी उनके श्संघर्षश् के इन साथियों को भी लेनी ही चाहिए। लेकिन केजरीवाल की सबसे कवित्वमय आलोचना करने वाले कुमार विश्वास अभी भी जानें किस चालाकी में न खुद श्आजादश् हो रहे हैं और न केजरीवाल ही उन्हें आजादी दे रहे हैं, जबकि केजरीवाल का खेमा उन पर भाजपा से सांठ-गांठ तक के आरोप लगाता रहा है। आज कुमार विश्वास केजरीवाल से पूछ रहे हैं कि जो शिलालेख बनता उसको अखबार बनाकर क्या पाया, तो भूल जा रहे हैं कि श्आप्य के शिलालेख को अखबार बनाने में उन जैसों का भी कम से कम इतना योगदान तो है ही कि उन्होंने खुद को ऐसे लोगों में शामिल कर लिया, जिनकी बाबत कहा जाता है कि चलते हैं थोड़ी दूर हर इक तेज रौ के साथ, पहचानते नहीं हैं अभी राहबर को ये। क्या यह स्वयं उनके रहबरी के दावे पर सवाल नहीं है? दूसरे पहलू पर जायें तो केजरीवाल ने भले ही आम आदमी पार्टी के राष्ट्रव्यापी विस्तार की अपने सहयोगियों की सलाहों की अनसुनी कर दी है (कई प्रेक्षक पार्टी में बिखराव का एक कारण उनकी इस अनसुनी को भी बताते हैं), लेकिन उनकी महत्वाकांक्षाएं अभी भी गुल खिलाने को बेकरार हैं। दिल्ली में अपनी अगुआई में भाजपा का रथ रोकने का मन्सूबा पूरा करने के लिए वे उन राहुल गांधी से भी बात करने को बेकरार हैं, राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव में जिनकी कांगे्रस पार्टी के उम्मीदवार को सिर्फ इसलिए अपने वोट नहीं दिलवाये कि राहुल ने उनकी ऐंठ को खास तरजीह नहीं दी थी। उनकी मुश्किल यह कि अब, जब वे चाहते हैं कि किसी भी तरह कांग्रेस दिल्ली में श्आपश् के साथ मिलकर चुनाव लड़ने को तैयार हो जाए, राहुल उन्हें भाव देने को तैयार नहीं और दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष अजय माकन से बात करने को कह रहे हैं। कहते तो यहां तक हैं कि राहुल उनसे फोन पर बात करने को भी राजी नहीं हैं, जबकि एक समय वे कहते थे कि आम आदमी पार्टी से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
हां, जहां तक आप से सीखने की बात है, जैसा कि इस टिप्पणी के शुरू में कह आये हैं, उसका आगाज और अंजाम दोनों न सिर्फ कांगे्रस बल्कि भाजपा के लिए भी सबकों से भरे हैं। कांग्रेस के लिए उनका सबसे बड़ा सबक यह है कि उसका पुनर्जीवन राहुल के करिश्मे की प्रतीक्षा में नहीं, नीतियों के पुनर्निर्धारण व अमल में है, जबकि भाजपा के लिए यह कि नीतिविहीनता के उसके वर्तमान हालात में नरेन्द्र मोदी का खत्म होने को आ रहा करिश्मा कभी भी उसके सपनों के महल की सारी ईंटें भरभराकर गिरा देगा। ये दोनों पार्टियां ये सबक लेने में जितनी ईमानदारी बरतेंगी, देश की राजनीति उतनी ही ज्यादा उजली होगी।
0000
आज का राशि फल
मेष:- परिवार एवं दाम्पत्य सुख का भरपूर योग है। कार्यक्षेत्र में प्रगति के योग बनेंगे। विद्यार्थियों के लिए अनुकूल समय होगा। प्रयासरत क्षेत्रों में थोड़ा अड़चनों का आभास होगा। जीवन साथी के साथ मधुरता कायम रखें।
बृषभ:- योजनाओं के फलीभूत होने से मन प्रसन्न होगा। निकट संबंधों में मधुर संवाद से अपनी सुंदर छबि बनायें। विद्यार्थियों के लिए ग्रहों की अनुकूलता लाभप्रद होगी। रोजगार में लाभकारी स्थिति से मन प्रसन्न होगा।
मिथुन:- सामान्य दिनर्चया के साथ बीत रहे जीवन में उत्साह का अभाव रहेगा। परिजनों के सुख-दुख के प्रति मन चिंतित होगा। अपने पराक्रम व जौहर का भरपूर लाभ उठाने का अवसर प्राप्त होगा। आलस्य कतई न करें।
कर्क:- कुछ महत्वपूर्ण अभिलाषाओं की पूर्ति होने के आसार हैं। कल्नाशील व महवाकांक्षी मन को दूसरों की प्रगति से हीनता का शिकार न होने दें। किसी धार्मिक स्थल की यात्रा के आसार बनेंगे। घर में प्रसन्नता रहेगी।
सिंह:- विषम स्थितियों के मध्य परिश्रम से प्रगति की ओर अग्रसर होंगे। किसी नयी दिशा में सकारात्मक सोच अवश्य रंग लायेगी। अच्छी भावनात्मक अभिब्यक्ति से संबंध मधुर होंगे। घर में मेहमान के आगमन से व्यय होगा।
कन्या:- कुछ नये पारिवारिक तनावों से मन में अशान्ति का माहौल बनेगा। पारिवारिक संबंधों से असंतोष की आशंका है। आपका अत्याधिक बोलना या फिर बिन मांगे किसी को राय देना आपके लिए हानिकारक हो सकता है।
तुला:- नियोजित परिश्रम द्वारा कार्य पूर्ण होने के आसार बनेंगे। ऐसा कोई कार्य न करें, जिससे अपयश या लान्छन मिले। नकारात्मक चिंताएं उत्साह में कमी लाएंगी। क्रोध पर काबू रखें और आवेश में कोई निर्णय न लें।
वृश्चिक:- सुंदर भावनात्मक अभिब्यक्ति से संबंधित मधुरता बढ़ेगी। ग्रहों की अनुकूलता से अवरोधित कार्य हल होने के आसार हैं। कार्यक्षेत्र में संबंधों का भरपूर लाभ मिलेगा। मन सुन्दर कल्पनाओं से प्रभावित रहेगा।
धनु:- कुछ चिंताएं मन पर प्रभावी होंगी। शिक्षार्थी शिक्षा में ध्यान दें। महत्वपूर्ण कायरें के प्रति आलस्य न करें। राजनीतिज्ञों को ग्रहों की अनुकूलता का लाभ मिलेगा। विद्यार्थी शिक्षा-प्रतियोगिता में लापरवाही न करें।
मकर:- भौतिक आकांक्षाओं की पूर्ति होने के आसार हैं। मन आर्थिक सुदृढ़ता हेतु चिंतित होगा। किसी भी चीज को अंडर ईस्टमेट न करें। परिवार में कोई सुखद स्थिति प्रसन्नता लाएगी। जीवन साथी का ध्यान रखें।
कुंभ:- महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मन पर प्रभावी होंगी। कुछ नये संबंधों के प्रति निकटता आपके लिए लाभकरी दिखाई दे रही है। राजनीतिज्ञों की सक्रियता काफी तेज होगी। जीवन साथी का भावनात्मक स्नेह प्राप्त होगा।
मीन:- समय के साथ चलें। हाथ से फिसल गया उस पर पश्चाताप करने से कोई फायदा नहीं है। अतरू वक्त के साथ गतिमान जीवन जीने का प्रयास करें। संतान संबंधित दायित्व पूर्ण होंगे। जीवन साथी का सहयोग मिलेगा।

Loading...
News Room :