Tuesday , November 13 2018
Loading...
Breaking News

“धर्म’’ का मतलब सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं है बल्कि एक सामाजिक कर्तव्य भी है: स्वयंसेवक  

राष्ट्रीय स्वयंसेवक ने एक प्रोग्राम के दौरान बोला कि “धर्म’’ का मतलब सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं है बल्कि एक सामाजिक कर्तव्य भी है  शासक ‘‘राज धर्म” की बात करते हैं इस प्रोग्राम में उद्योगपति रतन टाटा ने उनके साथ मंच साझा किया

भागवत यहां दिवंगत आरएसएस नेता नाना पालकर की जन्मशती के मौके पर रखे गए एक प्रोग्राम में बोल रहे थे टाटा इस प्रोग्राम में मुख्य मेहमान थे भागवत ने कहा, “धर्म पिता के प्रति बेटे का कर्तव्य है, पिता का बेटे के प्रति कर्तव्य है  जिन्हें सत्ता के लिए चुना जाता है वह ‘राजधर्म’ की बात करते हैंहमें बदले में बिना कुछ चाहे अपना कर्तव्य निभाना चाहिए ”

Loading...

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संतों से की संघ की तुलना, बोले- ‘दोनों एक सिक्‍के के दो पहलू’
आपकी जानकारी के लिए बताते चलें कि इससे पहले राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने संघ की तुलना थेट संतों से की थी उन्‍होंने बोला है कि संत  संघ, दोनों एक ही सिक्‍के के दो पहलू हैं उन्‍होंने बोला कि दोनों का कार्य लगभग एक जैसा ही है मोहन भागवत ने यह बयान महाराष्‍ट्र के रत्‍नागिरी के नानीज में दिया है

loading...

इसके साथ ही संघ प्रमुख मोहन भगवत ने संघ पर टिप्‍पणी करते हुए बोला कि संघ बहुत बड़ी शक्ति है, इसलिए उसकी चार चर्चा देश-विदेश में होती है उन्‍होंने बोला कि जिसके लिए यह शक्ति अनुकूल नहीं है, असल में वही संघ पर टिप्‍पणी करता है इस प्रोग्राम में मोहन भगवत को पांच लाख रुपये  ताम्रपत्र देकर सम्‍मानित किया गया लेकिन उन्होंने ये भेंट वापस कर दी

बता दें कि इसके पहले पिछले दिनों मोहन भागवत की ओर से पूर्व राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी को आरएसएस के प्रोग्राम में बुलाने पर वह सुर्खियों में आए थे आरएसएस के प्रोग्राम में पूर्व राष्ट्रपति  कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता रहे प्रणब मुखर्जी के जाने पर मचे टकराव RSS चीफ ने बयान दिया था उन्‍होंने बोला था कि संघ सभी के लिए आत्मीयता को आदर्श मानता है इसलिए उसे पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को अपने प्रोग्राम में बुलाने में कोई हिचक नहीं हुई भागवत ने कहा, ‘जब वह (मुखर्जी) एक पार्टी में थे, तो वह उनसे (कांग्रेस से) संबंधित थे, लेकिन जब वह राष्ट्र के राष्ट्रपति बन गए तो वह पूरे राष्ट्र के हो गए ’

मालूम हो कि RSS के प्रोग्राम में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आसान शब्दों में हिंदुस्तान की बहुलतावादी संस्कृति का बखान किया था उन्होंने आरएसएस काडर को बताया कि देश की आत्मा बहुलवाद  पंथनिरपेक्षवाद में बसती है पूर्व राष्ट्रपति ने प्रतिस्पर्धी हितों में संतुलन बनाने के लिए वार्ता का मार्ग अपनाने की आवश्यकता बताई उन्होंने साफतौर पर बोला कि घृणा से राष्ट्रवाद निर्बल होता है  असहिष्णुता से देश की पहचान क्षीण पड़ जाएगी उन्होंने कहा, “सार्वजनिक संवाद में भिन्न मतों को स्वीकार किया जाना चाहिए ”

Loading...
loading...