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सावधान तेजी से बढ़ रहे साइबर लुटेरे

प्रेम शर्मा
जितनी बड़ी मात्रा में देश डिजिटल वित्त-व्यवहार की ओर बढ़ रहा है उतनी ही तेजी से पिछले दो सालों में साइबर लुटेरों की लूट की जो वारदाते सामने आई है वह चैकाने वाली है। यानि विश्व में बेरोजगारी और जल्दी ही पूंजीपति बनने की तम्मना ने युवाओं के इस काले धंधे की ओर धकेल दिया है। जितनी तेजी से लेनदेन तकनीक हुआ उतनी ही मात्रा में साइबर हमलों के खतरे भी बढ़ रहे हैं। अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था हैकरों से संत्रस्त है। हैकिंग के क्षेत्र में चीन सबसे आगे है। अमेरिका स्वयं गूगल, याहू जैसे पोर्टलों के माध्यम से विश्व के प्रमुख नेताओं, नागरिकों, अधिकारियों एवं रक्षा कर्मियों की सूचनाएं एकत्र करने का प्रयास करता है। पाकिस्तान हैकिंग के क्षेत्र में समुद्री-दस्युओं जैसा है और इसके अलावा सैकड़ों अन्य हैकिंग एजेंसियां प्रति वर्ष बैंकों, व्यक्तियों एवं राष्ट्रीय संस्थानों से अरबों डॉलर चुराती हैं तथा राष्ट्रीय गुप्त सूचनाएं एकत्र करती हैं। सैन फ्रांसिस्को की साइबर सिक्योरिटी कंपनी रिस्कआइक्यू ने इंटरनेट पर हैकिंग की वारदातों के बारे में एक रिपोर्ट जारी की है। इसके मुताबिक हैकर्स हर मिनट दुनिया की अर्थव्यवस्था से 10 लाख डॉलर से भी अधिक राशि चुराते हैं। तकरीबन दो हजार लोग हर मिनट साइबर अपराधों के शिकार बनते हैं। पिछले साल साइबर अपराधियों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को 600 अरब डॉलर की चपत लगाई थी। शोधकर्ताओं ने पाया कि हैकर्स विभिन्न कारणों से हैकिंग की वारदात को अंजाम देते हैं। इसमें आर्थिक लाभ, राजनीतिक फायदा और जासूसी शामिल है। कंप्यूटरों में वायरस वाले सॉफ्टवेयर भेजकर, धोखाधड़ी से क्रेडिट और डेबिट कार्ड की जानकारी निकालकर और संस्था के नेटवर्क में सेंध मारकर जासूसी करने वाला कंपोनेंट डालकर हैकर्स साइबर अपराधों को अंजाम देते हैं।रिपोर्ट के मुताबिक अगर किसी कंपनी ने अपनी साइबर सिक्योरिटी को पुख्ता करने के लिए बड़ी राशि खर्च की है, तब भी वह खतरे के निशान पर हो सकती है। हैकर्स कंपनियों के सिस्टम में सेंध लगाकर ग्राहकों की निजी व गोपनीय जानकारी चुरा सकते हैं। हर दो मिनट में तीन संस्थाएं हैकिंग की शिकार बनती हैं और हरेक को लगभग 15,221 डॉलर का नुकसान होता है। अब बाॅत करे भारत के झारखण्ड के साइबर लूटेरों पर कार्रवाई के बारे में तो जून 2015 से लगातार करमाटांड़ व नारायणपुर पुलिस की छापेमारी जारी है। अन्य राज्यों की पुलिस अब तक 60 साइबर ठगों को गिरफ्तार कर चुकी है। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर भी जामताड़ा व अन्य जिलों की पुलिस द्वारा करीब 100 से अधिक साइबर ठगी के आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है। करमाटांड़ थाना क्षेत्र में कुल 150 गांव हैं। पुलिस के आंकड़ों की मानें तो 100 गांवों के युवा साइबर अपराध से जुड़ गये हैं। इस काम में 15 से 25 साल के करीब 80 प्रतिशत युवा जुड़े हुए हैं। 1000 से अधिक युवाओं का सिंडिकेट भी चल रहा है। किसी भी व्यक्ति से एटीएम नंबर व पिन जानने के बाद उनके खाते से रुपये उड़ाने में इन्हें महज तीन मिनट का ही समय लगता है। इन्हें परिजनों का समर्थन भी प्राप्त है।एक केंद्रीय मंत्री से साइबर ठगों ने करीब 1.80 लाख रुपये ठग लिये. जांच करने आये पार्लियामेंट स्ट्रीट नयी दिल्ली थाने के इंस्पेक्टर राजेश ने करमाटांड़ से दो आरोपियों को पकड़ा था। केरल के सांसद से की गयी 1.60 लाख की ठगी. मामला संसद भवन दिल्ली थाने में दर्ज कराया गया था। उस कांड में भी यहां से धनंजय व पप्पू मंडल की गिरफ्तारी हुई थी। एक बड़े चर्चित सिने स्टार से दो लाख रुपये की ठगी की गयी थी. महाराष्ट्र पुलिस जांच करने पहुंची थी. हाल में गुजरात पुलिस की टीम भी छापेमारी करने पहुंची थी।भारत का झारखंड का एक पिछड़ा जिला जहां लोगों की शिक्षा का स्तर भी बहुत बेहतर नहीं है, वह देशभर के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। आये दिन यहां के साइबर आपराधी कोई ना कोई घटना को अंजाम दे देते हैं। जामताड़ा के करमाटांड़-नारायणपुर इलाके आज साइबर बैंक ठगी के गढ़ बन चुके हैं।इलाके के गांवों के किशोर व युवा धड़ाधड़ साइबर अपराध के दलदल में धंसते चले जा रहे हैं। इस कारण क्षेत्र के अर्थशास्त्र से लेकर समाजशास्त्र तक बदल रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि तकनीकी क्रांति ने लोगों की जिंदगी आसान बना दी है। लेकिन जानकारी के अभाव में यही तकनीक लोगों को बड़ा नुकसान भी पहुंचा रही है। अब जबकि मोदी सरकार ने छोटे व्यापारी और आम जनता के लिए ‘मेरा मोबाइल मेरा बटुआ’ नाम से योजना शुरू तो कर दी। लेकिन इस योजना पर भी साइबर लुटेरों ने नजर गड़ा दी है। 500 और 1000 रुपये के नोट बंद होने की घोषणा होने के बाद आनलाइन और कैशलेस पेमेंट में बढ़ोतरी के साथ ही साइबर ठगी की घटनाएं बढ़ गई है।अब लोग इस बात को लेकर परेशान हैं कि उनकी जमा पूंजी कैसे सुरक्षित रहे। नोटबंदी के बाद से साइबर क्राइम से जुड़ी शिकायतें थाने पहुंच रही है। लेकिन पुलिस इक्का दुक्का ही मामले दर्ज कर रही है। जबकि बाकी पीड़ित थाने से लौटाएं जा रहे हैं। जिन केसों दर्ज किया जा रहा है।उनका भी खुलासा नहीं हो पा रहे हैं। साइबर ठग कभी आधार लिंक के बहाने तो कभी एटीएम एक्पायर के बहाने लोगों को फोनकर डेबिट कार्ड से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां ले रहे हैं और उनके खातों से पैसे उड़ा ले रहे हैं। पिछले एक माह से तो रोजाना लगभग एक शिकायत साइबर क्राइम की सामने आ रही है। जैसे साइबर लुटेरों ने चाय विक्रेता को कॉल कर उसके एटीएम कार्ड की जानकारी पूछकर उसके एकाउंट से 59 हजार रुपये की आन लाइन शॉपिंग कर ली। बिना मेहनत की हो रही अवैध कमाई से साइबर अपराधियों का लाइफस्टाइल ही बदल गया है। पैदल चलने वाले लोग अचानक महंगी चमचमाती गाड़ियों में घूमने लगे हैं।ये लोग दैनिक जीवन में पानी की तरह पैसे खर्च करते हैं। इससे जहां नयी पीढ़ी गुमराह हो रही है, वहीं परिवार व समाज के लोग भी इनका समर्थन करने लगे हैं। समाज में यह मैसेज जा रहा है कि बच्चों को बेहतर पढ़ाई कराने से अच्छा है साइबर अपराधी बनाना। जितना धन आम लोग जिंदगी भर में नहीं कमा पाते साइबर ठग कुछ महीनों में ही कमा ले रहे हैं। स्थिति यह है कि कतिपय युवाओं को जब मन होता है तो बंगाल आदि से नर्तकी लाकर अड्डे पर नचाते हैं और नोटों की गड्डी उड़ाते हैं. एक बार तो एक सिने अभिनेत्री के कार्यक्रम के लिए बात फाइनल कर ली गयी थी। इसके लिए 20 लाख रुपये बतौर एडवांस तक दे दिया गया था। प्रशासन को जानकारी हुई तो अनुमति नहीं दी गयी। इसके बाद उन लोगों का 20 लाख रुपये वापस भी नहीं हुए। इसका उन लोगों को कोई मलाल नहीं है। अब प्रश्न यह उठता है कि जितनी तेजी से लेनदेन को डिजीटल किया जा रहा है उतनी तेजी से क्या शिक्षा और इन्टरनेट का विकास हो पाया। भारत तो गाॅवों का देश है। ऐसे में गाॅव तक बिजली पहुंची। यही नही जितनी तेजी से साइबर क्राइम बढ़ उतनी तेजी से भारतीय पुलिस का ेसाइबर तकनीक का ज्ञान दिया गया। क्या देश में बढ़ते साइबर क्राइम की रोकथाम के हिसाब से थाने खोले गए या फिर पूरे देश में सिर्फ नाम मात्र के की संख्या के आधार पर साइबर क्राइम की रोकथाम होगी ? अब ऐसे में विपक्ष की कंगाली तो समझ आती है। आतंकी-धन के जब स्रोत बंद हुए, तो विपक्ष की राजनीति को मिलनेवाले कालेधन पर अलग से अंकुश लगा। एक ओर देश पर आतंकी हमला करनेवाले अवसन्न हैं, तो दूसरी ओर स्वदेश-जन-रक्षक नीतियों का ऐलान करनेवाले कुछ विपक्षी दल भी धरती कंपा देनेवाली घोषणाओं द्वारा अपना चुनावी-शोक व्यक्त करने मौन है। लेकिन, इस वक्त विमुद्रीकरण अर्थात् आतंकी धन और समानांतर अर्थव्यवस्था के खिलाफ युद्ध को सबसे बड़ा खतरा साइबर हमलों से है। यदि इ-बटुआ है, तो इ-जेबकतरे भी हैं. यदि इ-भुगतान है और इ-बैंक व्यवहार है, तो इ-चोर और इ-डकैत भी हैं। यदि इ-रक्षा व्यवस्था का डिजिटल दुर्ग है, तो इ-आतंकी हमलावर भी हैं। साइबर विश्व शिव के तीसरे नेत्र की तरह है- कल्याणकारी भी और प्रलयंकारी भी। इसके लिए भारत को साइबर-साधु और साइबर-योद्धा तैयार करने होंगे। इसके साथ ही आम आदमी को अपनी गाढ़ी कमाई को लूटने से बचाने के लिए कदम दर कदम सजग, सर्तक रहना होगा।

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