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अगस्त माह में तीन महारथी विदा

एल.एस. हरदेनिया
वर्ष 2018 का अगस्त माह देश के लिए त्रासद माह के रूप में याद किया जाएगा। अगस्त में हमने अपने देश के तीन महारथियों को खोया है। ये तीन हैं- अटलबिहारी वाजपेयी, सोमनाथ चटर्जी और एम करूणानिधि। भौगोलिक दृष्टि से ये तीनों अलग-अलग क्षेत्रों के थे। वाजपेयी उत्तर भारत (हिन्दी भाषी क्षेत्र), चटर्जी बंगाल एवं करूणानिधि दक्षिण भारत से। देश की जनता की दृष्टि में इन तीनों में अटलबिहारी वाजपेयी का कद सबसे ऊँचा था। वे देश के पहले गैर-कांग्रेसी नेता थे जो पांच वर्षों के पूरे कार्यकाल तक प्रधानमंत्री के पद पर रहे। वे दस बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे। वैसे तो वे अनेक गुणों के धनी थे परंतु उनकी सबसे बड़ी विषेषता थी उनका ओजस्वी वक्ता होना। वक्ता के रूप में उनकी तुलना ब्रिटेन के विंस्टन चर्चिल से की जा सकती है जिन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी से द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन और दुनिया के समस्त लोकतंत्रात्मक देशों की फास्जिम के विरूद्ध जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वाजपेयी जी यद्यपि महान वक्ता थे परंतु उनके शब्दों में कटुता नहीं रहती थी। व्यंग्य और हास्य के तो वे धनी थे। वे जीवन भर अपनी पार्टी के अनुशासित सदस्य रहे। जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के सभी प्रमुख नेताओं की छवि एक कट्टर व्यक्ति की है। लालकृष्ण आडवानी और नरेन्द्र मोदी इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। परंतु वाजपेयी पांच दशक से ज्यादा जनसंघ एवं भाजपा के शीर्ष नेता रहने के बावजूद एक उदारवादी नेता के रूप में अपनी छवि बनाए रखने में सफल रहे। उन्होंने भाजपा के जनप्रतिनिधियों के लिए एक आचार संहिता बनाई थी जिसका उन्होंने जीवन भर पालन किया। प्रधानमंत्री के रूप में उनकी अनेक ऐतिहासिक सफलताएं हैं परंतु भारत-पाकिस्तान बस सेवा प्रारंभ करना उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण सफलताओं में से एक थी। इस बस सेवा के कारण दोनों देशों के सामान्य नागरिकों के लिए दूसरे देश की यात्रा करना सरल हो गया। इसका मैंने स्वयं अनुभव किया जब मैंने पाकिस्तान से भारत की यात्रा इस बस में की। अपनी इस यात्रा के दौरान मैंने यह भी महसूस किया कि वे वहां भी अत्यधिक लोकप्रिय थे। वहां के नागरिकों की मान्यता थी कि वाजपेयी दोनों देषों के संबंध मधुर करने में पूरी तरह सक्षम थे। मेरी राय में वाजपेयी का स्थान इतिहास में दुनिया के महानतम नेताओं में हो जाता यदि वे आगरा में भारत-पाक समझौते पर अटल रहते। उस समय यह बताया गया था कि वाजपेयी-मुशर्रफ के बीच एक दीर्घकालीन समझौता हो गया है परंतु आडवाणी सहित भाजपा के कट्टर नेताओं ने उसे लागू नहीं होने दिया। गुजरात के सन् 2002 के कत्लेआम के बाद वाजपेयी वहां गए थे और उन्होंने नरेन्द्र मोदी को राजधर्म का पालने करने का निर्देश दिया था। उस दौरान यह बात भी प्रकाश में आई थी कि वाजपेयी ने गुजरात में राष्ट्रपति शासन लागू करने का निर्णय ले लिया था परंतु आडवाणी सहित पार्टी के कट्टर नेताओं के दबाव के कारण इस पर अमल नहीं हो सका। इतिहास में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं जो सत्ता में बैठे व्यक्तियों को अमर बना देती हैं। यदि पाकिस्तान से समझौता हो जाता और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री की बर्खास्तगी हो जाती तो वाजपेयी आसमान से भी ऊँचे कद के नेता हो जाते। परंतु ऐसा नहीं हो सका। इसके बावजूद उन्होंने भारत के इतिहास में एक अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है। वाजपेयी के पत्रकारों से दोस्ताना संबंध थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रधानमंत्री वाजपेयी की आलोचना करते हुए पत्रकारों की कलम भय के कारण कांपती नहीं थी जैसा प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना करते समय होता है।जहां वाजपेयी एक अद्भुत सांसद के रूप में याद किए जाएंगे वहीं सोमनाथ चटर्जी लोकसभा की गरिमा की रक्षा करने वाले एक महान सिपहसालार के रूप में याद किए जाएंगे। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद सोमनाथ चटर्जी को लोकसभा अध्यक्ष बनाने का फैसला किया। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक फैसला था। लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने के बाद उन्होंने पद की गरिमा में चार चांद लगाए। हमारे संविधान के अनुसार संसद का स्थान कार्यपालिका और न्यायपालिका से ऊँचा और सर्वोपरि है। चटर्जी ने अपने अनेक निर्णयों से लोकसभा की कार्यप्रणाली में सुधार किया। उन्होंने ऐसे अनेक निर्णय लिए जिनसे संसद की प्रतिष्ठा बढ़ी। अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने लोकसभा की कार्यवाही का अत्यंत संजीदगी से संचालन किया। लोकसभा के सदस्य उन्हें हेडमास्टर कहते थे। चटर्जी का लालन-पालन हिन्दू महासभा के एक नेता के घर में हुआ था। उनके पिता एनसी चटर्जी, हिन्दू महासभा के संस्थापकों में से थे। इसके बावजूद उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा अपनाई। यह अपने आप में एक असाधारण बात थी। वे जीवनभर एक प्रतिबद्ध कम्युनिस्ट रहे। परंतु उनके लोकसभाध्यक्ष के कार्यकाल के दौर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने उनके साथ जैसा व्यवहार किया वह उनके अनुसार उनके जीवन का सबसे दुरूखद समय था। मार्क्सवादी पार्टी ने उन्हें पार्टी से सिर्फ इसलिए निष्कासित कर दिया क्योंकि उन्होंने स्पीकर के पद की गरिमा की रक्षा की। सैद्धांतिक दृष्टि से स्पीकर अपनी पार्टी से संबंध तोड़ लेता है। इस कारण उस पर पार्टी का अनुशासन लागू नहीं होता। जब सीपीएम ने उन्हें पार्टी के अनुशासन के दायरे में लाने का प्रयास किया तो उन्होंने उसे मानने से इंकार कर दिया। इस पर उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने कभी पार्टी की सदस्यता ग्रहण नहीं की। काश सीपीएम ने सोमनाथजी को वैसी ही अंतिम बिदाई दी होती जैसी भारतीय जनता पार्टी ने वाजपेयी जी को दी। एम करूणानिधि दक्षिण भारत के दिग्गज नेता थे। अन्य बातों के अतिरिक्त वे नास्तिक थे। उनकी मान्यता थी कि धर्म समाज को बांटता है। उनकी पार्टी और अन्ना डीएमके ने यह सिद्ध कर दिया था कि तमिलनाडु की एक अलग पहिचान है। दोनों पार्टियों ने मिलकर उत्तर भारत की किसी भी पार्टी को तमिलनाडु में सत्ता हथियाने नहीं दी। उनकी राय थी कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने से देश टूट जाएगा। वे एक कुशल शासक थे। परंतु वे और जयललिता दोनों ही सच्चे मायनों में डेमोक्रेट नहीं थे। दोनों में तानाशाही प्रवृत्तियां थीं। करूणानिधि ने डीएमके पार्टी को एक परिवार की संपत्ति की तरह चलाया। हम भले ही इसे सही न मानें परंतु इसके बावजूद वे राज्य में असाधारण रूप से लोकप्रिय थे।
इन तीनों महान आत्माओं को सोशलिस्ट सेक्युलर भारत की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि।

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